ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे: परदे के नायक

अब अधिकतर फिल्मों से उद्देश्य गायब है। फिल्में खालिस मनोरंजन कर पैसा कमाने के लिए ही बनाई जाने लगी हैं।

Author नई दिल्ली | Published on: August 16, 2019 3:33 AM
इधर कला संस्कृति के पहरुओं ने दर्शकों को नए मनोरंजन के नाम पर मनमानी कहानियों पर बनी फिल्में दिखानी शुरू कीं।

संतोष उत्सुक

पुरानी फिल्मों में कई बार फिल्म का हीरो चोर होता था। हमारे दिग्गज अभिनेताओं और अभिनेत्रियों ने चोरी करने वाले की भूमिका में सशक्त अभिनय किया है। कहानी और चरित्रों की जिंदगी में आते नए उतार-चढ़ाव दिलचस्प राज खोलते थे कि यह चरित्र चोर क्यों बना। उसे भूख ने चोर बनाया या जिंदगी की किसी और परिस्थिति या व्यवस्था ने। पहले वह ईमानदार हुआ करता था। फिर व्यवस्था का शिकार, फिर हीरोइन के निश्छल प्यार व समर्पण के कारण फिल्म के अंत में वह ईमानदारी और मेहनत की जिंदगी का दामन थाम लेता था। कुछ चोर वास्तव में ‘नायक’ होते थे। वे बेईमानी से अमीरों का कमाया धन चुरा कर गरीबों में बांटते थे। फिल्में सामाजिक बुराइयां दिखाती थीं, साथ-साथ उनके हल भी सुझाती थीं। दर्शक भी प्रेरित होते थे।

हमारी फिल्में बदलीं, ‘एंग्रीमैन’ हमारी फिल्मों और समाज का ‘हीरो’ बनता गया। फिल्मों में चोरी, बदमाशी, हेराफेरी के जो नए तरीके मनोरंजन के नाम पर दिखाए जाते, धीरे-धीरे समाज उनका अनुकरण करने लगा। यानी पहले फिल्में समाज का आईना होती थीं, फिर समाज फिल्मों की छाप होने लगा। ‘बुद्धू बक्सा’ ज्यादा व्यावसायिक होता गया और फैलता दर्शक वर्ग और बहुत कुछ सीखने में लग गया। वास्तव में समाज में बिगड़ते राजनीतिक अनुशासन, बढ़ती और गहराती असमानता, प्रशासकीय भेदभाव, बढ़ते स्वार्थ और ताकतवर लोगों के मनमाने रवैये ने दूसरों को भी बदलने के लिए कुप्रेरित किया।

इधर कला संस्कृति के पहरुओं ने दर्शकों को नए मनोरंजन के नाम पर मनमानी कहानियों पर बनी फिल्में दिखानी शुरू कीं। यह कुछ भी दिखाना समाज के सांस्कृतिक विकास या सही बदलाव के लिए बिल्कुल नहीं, बल्कि पैसा कमाने के लिए था। एक वक्त आया जब हेराफेरी, चोरी, बदमाशी, बलात्कार करने वाले सामाजिक चरित्र ने अच्छे हीरो की सुनियोजित तरीके से हत्या कर दी। परिस्थितिवश इन चरित्रों का समाज में अवतरण हो गया और अब उसी ‘हीरो’ बने विलेन का जमाना चल रहा है। बिना मेहनत किए पैसा ठगने या लूटने का चलन समाज में काबिज होता जा रहा है।

अब अधिकतर फिल्मों से उद्देश्य गायब है। फिल्में खालिस मनोरंजन कर पैसा कमाने के लिए ही बनाई जाने लगी हैं। फिल्मों का हीरो चोर नहीं होता, लेकिन चोरी की संस्कृति कम नहीं हुई है, बल्कि समाज में दबंगई फैलते हुए गहराती जा रही है। पिछले कई साल से सुनते-पढ़ते आ रहे हैं कि फलां क्षेत्र के फलां बैंक के एटीएम में बदमाशों ने सेंध लगा कर चोरी की। वास्तव में एटीएम की मशीन काफी सुरक्षित होती है और आमतौर पर इसे तोड़ना आसान नहीं होता। चोर-लुटेरा आ जाए, लेकिन उसे कुछ करना न आता हो तो काफी समय खराब करने के बाद भी नकदी लूटी नहीं जा सकती।

एटीएम मशीन को पहुंचे नुकसान से ग्राहकों को बहुत असुविधा होती है। बैंक वाले भी परेशान होते हैं, बीमा कंपनी का नुकसान होता है। कई बार एटीएम मशीन की मरम्मत का अनुमानित खर्च नई मशीन की कीमत से ज्यादा होता है। पिछले कई सालों की खबरें बताती हैं कि शातिर लुटेरों ने ‘सुरक्षित’ तरीका इस्तेमाल किया। उन्होंने एटीएम मशीन से पैसे निकालने की कोशिश नहीं की, बल्कि पूरी मशीन को ही उखाड़ कर अपने साथ ले गए और इत्मीनान से पैसा निकाला। ऐसे मामलों में पुलिस को भी नई शैली में ज्यादा मेहनत करनी पड़ी। चोरों ने एक नहीं कई बार ऐसा किया।

पिछले दिनों देवभूमि कहे जाने वाले हिमाचल प्रदेश की औद्योगिक नगरी बद्दी में बदमाशों ने एटीएम में संभवत: नकदी भरते समय नजर रखी और जब एटीएम में लाखों रुपए डाल दिए गए तो पहले आजमाए सफल और सुरक्षित तरीके से लुटेरे एटीएम मशीन ही उखाड़ ले गए, ताकि आराम से बैठ कर नोट गिन सकें। राज्य में एटीएम मशीन चुरा ले जाने का शायद यह पहला मामला था। यह अलग बात है कि पुलिस ने चौकसी दिखाते हुए चोरों को दबोच लिया। चोरियों में व्यावसायिक खुलापन, निडरता और दबंगई बढ़ती और फैलती जा रही है।

इसका एक दिलचस्प उदाहरण देश की सुरक्षित राजधानी का है। कुछ लोगों ने ज्यादा गाड़िया चुराने के लिए क्रेन ही रख लीं, ताकि काम आसान हो जाए। उन्हें लगा कि क्रेन से गाड़ी उठाने पर कोई शक नहीं करेगा, क्योंकि ऐसी कार्रवाई तो पुलिस ही करती है। वे लोग गाड़ियां उठा कर दूसरे शहरों में कबाड़ियों को बेच देते थे जो गाड़ियों को काट कर पार्ट निकाल कर आगे बेचते थे।

क्रेन द्वारा कार को घसीट कर ले जाने पर एक जागरूक पुलिसकर्मी को शक हुआ तो चोर पकड़े गए। बाद में चोरों ने बताया कि उन्हें इस तरह गाड़ियां उठाने का आइडिया अपराध कथओं पर आधारित एक धारावाहिक से मिला। पुलिस वालों को भी इस नए चलन ने हैरान किया होगा। सरकार को चाहिए कि पुलिस को ज्यादा प्रशिक्षित कर्मचारी, आधुनिक संचार व्यवस्था और सुरक्षा उपकरणों से लैस करे, ताकि आने वाली चुनौतियों से अविलंब निबटा जा सके। क्या फिल्मों और सीरियलों में अच्छे चरित्रों की वापसी की जरूरत नहीं है?

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 दुनिया मेरे आगे: एकरसता से इतर
2 दुनिया मेरे आगे: रिश्तों की डोर
3 दुनिया मेरे आगे: झगड़े की खुशबू