ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे: विज्ञान की चेतना

औपचारिक स्कूली शिक्षा का मुख्य उद्देश्य एक बेहतर वांछित समाज का निर्माण करना है।

Author Published on: October 18, 2019 1:55 AM
स्वतंत्र भारत में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के लिए प्रतिबद्धता की बात सत्तर के दशक में शुरू हुई, जिसे ‘अपोलो-11’ यान के चंद्रमा की यात्रा के घटनाक्रम से भी जोड़ा जाता है।

कैलाश चंद्र काण्डपाल

वैज्ञानिक दृष्टिकोण आजकल फिर चर्चा में है। हालांकि यह एक अलग बात है कि क्या इस पर चर्चा की जरूरत है या एक अच्छा जनतांत्रिक और प्रगतिशील देश बनने के लिए इसका होना नितांत जरूरी है। अगर हम विश्व का विश्लेषण करें तो पाएंगे कि इसके वर्तमान स्वरूप में होने में भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। यूरोपीय पुनर्जागरण के बाद इसी दृष्टिकोण से औद्योगिक क्रांति की नींव पड़ी और उसके बाद विश्व इतिहास के नए पन्ने लिखे गए, जिसमें उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद जैसे आख्यान आए और विश्व में नया आर्थिक और सामाजिक स्वरूप उभरा। इसने मात्र विज्ञान और प्रौद्योगिकी में ही योगदान नहीं दिया, बल्कि एक जीवन दर्शन भी दिया जो एक प्रगतिशील समाज के लिए महत्त्वपूर्ण है। यह बात दीगर है कि यह हमारा भविष्य भी निर्धारित करेगा।

स्वतंत्र भारत में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के लिए प्रतिबद्धता की बात सत्तर के दशक में शुरू हुई, जिसे ‘अपोलो-11’ यान के चंद्रमा की यात्रा के घटनाक्रम से भी जोड़ा जाता है। इसी दशक में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के लिए देशव्यापी प्रचार-प्रसार देखा भी गया, जिसमें कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी दशक के उत्तरार्ध में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को संविधान में बयालीसवें संशोधन से मूल कर्तव्यों के रूप में समाहित किया गया और स्कूली शिक्षा के पाठ्यक्रम में भी इसने अपनी प्रमुख जगह बनाई। इसमें इस बात को रेखांकित करना आवश्यक है कि हमारे प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू वैज्ञानिक दृष्टिकोण के प्रबल हिमायती थे। भारत के संविधान में उल्लिखित मूल कर्तव्यों में एक यह साफतौर पर लिखा गया है कि ‘भारत का नागरिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का सुधार करे’। दरअसल, वैज्ञानिक दृष्टिकोण को मूल कर्तव्य के रूप में संविधान में समाहित करने का निर्णय सतही नहीं है, बल्कि यह अपने आप में एक जीवन दर्शन है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण मात्र विज्ञान विषय से संबधित नहीं है, बल्कि यह एक जीवन दर्शन के रूप में समाज को दिशा देता है। यह नागरिकों को इस बात के लिए प्रेरित करता है कि वे जिज्ञासा से प्रेरित रहें, प्रश्न करने की प्रवृत्ति बनाए रखें, तर्कशील और विवेकसम्मत बनें। तर्कशील और विवेकसम्मत समाज ही वास्तव में एक बेहतर जनतांत्रिक समाज की बुनियाद होता है। कई प्रकार से विविधता वाले देश भारत में अगर यह दृष्टिकोण प्रमुखता से अपनी जगह पाता है तो इसकी प्रगति के कई रास्ते खुलते हैं, चाहे वे एक वांछित समाज के हों या एक विकसित राष्ट्र के रूप में उभरने के। राष्ट्र के रूप में हमें यहां यह समझ लेना होगा कि हम जहां और जैसे हैं, इसका एक इतिहास है और इसमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण नहीं रही है। समाज में व्याप्त असमानता, अंधविश्वास आदि इसी बात के प्रमुख उदाहरण हैं कि हमारी चेतना में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अहम स्थान नहीं रखता है। आज भी अंधविश्वास के कई नमूने हमें हर रोज दिखाई पड़ते हैं। अगर हम इन असमताओं और अंधविश्वासों पर तर्क कर विवेकसम्मत तरीके से सोचें तो यह बात स्पष्ट हो जाएगी कि ये भारत के लिए वांछित समाज बनाने और इसकी उन्नति में बाधक हैं।

समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण लाने का दायित्व औपचारिक शिक्षा पर भी है और खासतौर पर स्कूली शिक्षा पर। वर्तमान में सारे प्रयासों के बाद भी स्कूली शिक्षा एक ढर्रे पर सिमटी दिखती है। अंकों की होड़ ने इसमें समझने के बजाय रटने की प्रवृत्ति को ही बढ़ावा दिया है। विषयगत अध्ययन में ‘क्यों’ के सवालों में बच्चे संघर्ष करते दिखाई देते हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण या चिंतन इस बात को रेखांकित करता है कि औपचारिक शिक्षा के तहत विषयगत अध्ययन में जब तक ‘क्यों’ पर विमर्श नहीं किया जाएगा, तब तक यह दृष्टिकोण स्थापित नहीं होगा। वर्तमान स्कूली शिक्षा का ताना-बाना इसी पर बुना हुआ है और इसके लिए निर्धारित पाठ्यचर्या की रूपरेखा इस पर बात करती है। लेकिन समस्या इस पर अमल या काम करने के तरीके में दिखती है। आज भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण का वांछित स्वरूप हमें कक्षा-कक्ष की प्रक्रियाओं में नहीं दिखता है।

औपचारिक स्कूली शिक्षा का मुख्य उद्देश्य एक बेहतर वांछित समाज का निर्माण करना है। भारत के लिए ऐसे वांछित समाज की परिकल्पना भी भारत के संविधान में स्पष्ट की गई है कि भारत के लोग ऐसे समाज के लिए संविधान को अंगीकार करते हैं जिसमें न्याय, स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा हो। वास्तविक रूप में देखा जाए तो इस प्रकार के समाज को पाने के लिए हमें अभी और सायास प्रयत्न करने हैं। यह तभी संभव है जब हम तर्कपूर्ण और विवेकशील बनें और इसकी राह हमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण से मिलती है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण और चिंतन हमें इस बात में मदद करेगा कि हम अपने भीतर निष्पक्ष रूप से सोचने-समझने की प्रवृत्ति विकसित करें। हमें अपने स्कूलों में बच्चों को ऐसे चिंतन में लगाना होगा, ताकि वे खुद को, अपने आसपास होने वाली घटनाओं और उनके अंतर्संबधों को तार्किक रूप से समझ सकें और इस पर अपनी तर्कसम्मत और विवेकपूर्ण राय बना कर आगे बढ़ें, ताकि वे एक जागरूक नागरिक के रूप में उभरें, न कि भेड़चाल का अनुसरण करने वाली भीड़ के रूप में।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 दुनिया मेरे आगे: सिकुड़ती दुनिया
2 दुनिया मेरे आगे: सोने-जागने का संघर्ष
3 दुनिया मेरे आगे: राह का कनेर