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दुनिया मेरे आगे: आधुनिकता के पैमाने

आधुनिकता पर चर्चा करना इसलिए भी जरूरी है कि इसे विचारों के रूप में नहीं, बल्कि फैशन के रूप में अपनाया जा रहा है। अधिकतर लोगों के लिए आधुनिकता का अर्थ नए फैशन के कपड़े पहनना और घर को विलासिता की वस्तुओं से भरना है।

आधुनिक दिखने और आधुनिक होने में जमीन-आसमान का अंतर है।

सुभाष चंद्र लखेड़ा

इस पृथ्वी पर अपने उद्भव के तुरंत बाद से ही मनुष्य के रहन-सहन के तौर-तरीकों और उसकी सोच में परिवर्तन होते रहे हैं, लेकिन तब से लेकर पचास-साठ वर्ष पहले तक ऐसे परिवर्तनों की गति बहुत धीमी रही। नतीजतन, एक लंबे समय तक मनुष्य उन मानसिक दुविधाओं से मुक्त रहा जो आज नित नई जानकारियों की वजह से पैदा हो रही हैं। पिछले कुछ दशकों में ज्ञान-विज्ञान और प्रौद्योगिकी में हुई आशातीत प्रगति के कारण मनुष्य के रहन-सहन में ही नहीं, बल्कि उसकी सोच में भी व्यापक बदलाव आया है। यह बदलाव इतनी तेजी से हो रहा है कि सदियों से चली आ रही सामाजिक मान्यताओं, परंपराओं, रीति-रिवाजों और मानवीय मूल्यों को आधुनिकता के नाम पर बिना कोई सोच-विचार किए नकारा जा रहा है। हालांकि कुछ ऐसी जड़ परंपराओं और रीति-रिवाजों को खत्म हो ही जाना चाहिए, जिन्हें मानवीयता और बराबरी आधारित जीवन के विरुद्ध कहा जा सकता है।

बहरहाल, किसी भी प्रगतिशील मनुष्य के लिए यह निहायत जरूरी है कि वह वर्तमान में जीए। तभी उसका सर्वांगीण विकास हो सकता है। दरअसल, हरेक दौर की अपनी अपेक्षाएं और आवश्यकताएं होती हैं। वर्तमान दौर का मनुष्य अपने पूर्वजों का हमराही चाहते हुए भी नहीं रह सकता है। आज उसे जिन समस्याओं से रूबरू होना पड़ता है, उनकी उसके पूर्वजों ने कभी कल्पना तक नहीं की होगी। इसलिए आज के मनुष्य के अंदर इतना लचीलापन अवश्य होना चाहिए कि वह नए विचारों को किसी मानसिक दबाव या कुंठा का शिकार हुए बिना अपना सके।

गौरतलब है कि जनसंचार माध्यमों में हुई प्रगति के कारण आज के मनुष्य के सामने सूचनाओं का अंबार लग गया है। उसके पास अब अपना भला-बुरा सोचने के लिए समय नहीं है। ऐसा लगता है जैसे वह इस पृथ्वी पर सिर्फ कार्य निष्पादन के लिए आया है और एक मनुष्य के रूप में उसकी कोई अन्य उपयोगिता नहीं है। वह सिर्फ एक संसाधन है और उसकी भूमिका और उपयोगिता का निर्णय किसी और को करना है। बढ़ते हुए उपभोक्तवाद ने इस स्थिति को विकट बना दिया है। आज का मनुष्य अपनी वेशभूषा और आहार-सूची तय करने का अधिकार तक खो चुका है। दरअसल, आज सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि आधुनिकता का अर्थ क्या है! कहीं ऐसा तो नहीं है कि आधुनिकता के नाम पर हम उन मूल्यों को त्यागते जा रहे हों, जिनकी वजह से हमें प्रकृति की सर्वोत्तम रचना कहलाने का हक हासिल हुआ।

आधुनिकता पर चर्चा करना इसलिए भी जरूरी है कि इसे विचारों के रूप में नहीं, बल्कि फैशन के रूप में अपनाया जा रहा है। अधिकतर लोगों के लिए आधुनिकता का अर्थ नए फैशन के कपड़े पहनना और घर को विलासिता की वस्तुओं से भरना है। ऐसे लोग आधुनिकता को एक ऐसी वस्तु समझते हैं, जिसे पर्याप्त कीमत देकर कभी भी प्राप्त किया जा सकता है। खेद की बात है कि हमने अपने समाज को आधुनिकता का वही अर्थ समझने दिया, जिसे कुछ स्वार्थी तत्त्व निज लाभ के लिए प्रचारित-प्रसारित करते रहते हैं। यही कारण है कि हमारे अधिकतर प्रौढ़ और युवाओं के लिए इसका अर्थ सिर्फ जींस पहनना, सिगरेट के छल्ले बनाते हुए किसी की जीवनशैली का उपहास करना और अंग्रेजी फिल्मों की अधकचरी समीक्षा करना है। सच तो यह है कि आधुनिकता का संबंध न तो ‘किस मी नॉट’ की चेपी लगी जींस-पैंट पहनना है और न ही मुंह को गोल बना कर कंधे उचका कर अंग्रेजी बोलते हुए शराब पीकर कमरतोड़ नृत्य करना है। इसका अर्थ तो उन विचारों को अपनाने से है जो हमारे सामाजिक जीवन के लिए प्राणवायु की भूमिका निभाते हैं और जो हमें एक प्रगतिशील देश के सजग नागरिक होने की योग्यता प्रदान करते हैं।

गौरतलब है कि आधुनिक दिखने और आधुनिक होने में जमीन-आसमान का अंतर है। बाप-बेटे का साथ बैठ कर शराब पीना, मां-बेटी का किटी पार्टियों में जुआ खेलना और बड़े-बुजुर्गों द्वारा दिए जाने वाले सलाह-मशविरों का मजाक उड़ाना जैसे कार्यों को आधुनिकता से जोड़ना दिमागी दिवालियापन ही है। आजकल हमारे युवा वर्ग का एक तबका भ्रमवश यह समझ बैठा है कि अब तक चली आ रही सामाजिक वर्जनाओं की अनदेखी करना ही आधुनिकता है। इसी धारणा का शिकार बने युवा वाहनों, पार्कों, बाजारों, सिनेमाघरों और दूसरे सार्वजनिक स्थानों पर अपने प्रेम का प्रदर्शन करते नजर आते हैं। दिखावे की आधुनिकता ने हमारे विचारों की बुनियाद को कमजोर करने के साथ-साथ हमारी मौलिक चिंतन-मनन की क्षमताओं को भी कुंद कर दिया है। आधुनिकता का वास्तविक अर्थ न समझ पाने की वजह से आज हमारे देश में कई तरह की सामाजिक बुराइयां और विकृतियां पनपती जा रही हैं।

दरअसल, आधुनिकता का अर्थ है वर्तमान संदर्भ में अपनी और समाज की जरूरतों को पहचानना। वर्तमान में जीते हुए भविष्य को संवारने की शक्ति अर्जित करना और एक ऐसी जीवनशैली को अपनाना जो दिवास्वप्नों और ढोंग-पाखंड से पूरी तरह मुक्त हो। अगर हमारे समाज में बराबरी आधारित बर्ताव सोच के स्तर पर नहीं घुली हो, तो वह आधुनिकता सिर्फ दिखावे की होगी।

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