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दुनिया मेरे आगे: सपनों का परचम

गंभीरता से सोचें तो महिला सशक्तिकरण का असली मतलब महिलाओं को अपने मन से अपनी पहचान के साथ जीने की आजादी मिलना है। केवल महिला दिवस के दिन नहीं, हर रोज।

प्रतीकात्मक तस्वीर

कुलीना कुमारी

हर साल महिला दिवस आकर गुजर जाता है। इस दिन की अहमियत के मद्देनजर चारों ओर महिलाओं की स्थिति पर विचार की प्रक्रिया जोर-शोर से शुरू हो जाती है। लेकिन उसके बाद इस दिवस की अहमियत समझने वालों के साथ-साथ महिलाओं का रोजमर्रा का जीवन क्या होता है, यह हम सब जानते हैं। क्या महिला सशक्तिकरण का मतलब केवल महिला दिवस में सिमटा हुआ है? इस खास दिन अगर महिलाएं कुछ घंटे के लिए घूम लें, किसी कार्यक्रम में शामिल होकर अपनी बात रख लें या वहां मिलने वाला पकवान खा लें तो क्या इतने से संतुष्ट हुआ जा सकता है? मेरे खयाल से साल में एक दिन होने वाला भोज पूरे साल के लिए पेट नहीं भर सकता। इसी तरह, महिला दिवस के नाम पर मात्र एक दिन का उत्साह महिला सशक्तिकरण का पर्याय नहीं माना जा सकता।
महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए जन्म से लेकर उनके परवरिश तक और जीवन-साथी चुनने के अधिकार से लेकर संपत्ति के अधिकार तक में उसे बराबरी का भागीदार बनाने की जरूरत है। यही नहीं, पुरुष द्वारा अपनी पत्नी के प्रति घर-परिवार की जिम्मेदारियों में भी हाथ बंटाने की जरूरत है। इसके बिना महिलाएं अपने सपनों को साकार नहीं कर पाएंगी, क्योंकि सपनों को साकार करने के लिए समय होना जरूरी है और जब तक महिलाएं घर की जिम्मेदारियों में उलझी रहेंगी, चाह कर भी उनके लिए समय निकालना मुश्किल हो जाएगा।

हाल ही में एक महिला सरकारी कर्मचारी ने शान से कहा कि उसकी बेटी डॉक्टर है। मगर जब हमने पूछा कि किस अस्पताल में, तो दुखी मन से उन्होंने बताया कि पति ने काम करने से मना कर दिया, इसीलिए वह घर-बच्चों को ही संभाल रही है, काम कर नहीं पा रही। थोड़े दिन पहले मुझे एक व्यक्ति ने कहा था कि उसकी बेटी चार्टर अकाउंटेंट है, मगर वह भी महज घरेलू बन कर जी रही है। ऐसा क्यों हो रहा है? कहीं इसलिए तो नहीं कि पुरुष को घर का काम करना नहीं आता? अगर वे मिल कर जिम्मेदारी उठाते तो दोनों अपनी पेशेवर जिंदगी भी जी पाते।

पिछले दिनों एक विज्ञापन देखा था, जिसमें बेटी अपनी मां से कह रही है कि वह शादी के बाद इसलिए नौकरी छोड़ रही है कि उसके पति को घर का काम करना नहीं आता और तब उसकी मां को एहसास होता है कि ऐसा हो सकता है, क्योंकि उन्होंने भी सिर्फ बेटी को काम करना सिखाया था, बेटे को नहीं। उसके बाद वह मां बेटे को कपड़ा धोना सिखाते हुए कहती है कि हां, अब गलती सुधार रही हूं।

महिला को घर तक बांधे रखने की एक मजबूत वजह है पुरुष द्वारा उस पर काबू रखने की प्रवृत्ति, ताकि वह दुनिया न देखे। अच्छा-बुरा कैसा भी हो, पति का गुण गाते हुए अपना जीवन खत्म कर ले। यह तुच्छ सोच भी एक वजह है जिसके तहत स्त्री की सफलता उसके पुरुष अहं को चोटिल कर सकती है। बाहरी पुरुष और बलात्कार का डर दिखा कर भी स्त्री को घर की चारदिवारी में सिमटने को तैयार कर लिया जाता है। जबकि बलात्कार के ज्यादातर आरोपी स्त्री की पहचान वाले ही पाए जाते हैं। यही वजह है कि घर की दहलीज से बाहर कामकाजी महिलाओं की संख्या अब भी काफी कम है। महिलाओं को रोकने की वजह चाहे कोई भी हो, मगर महिलाएं इन दबावों से कैसे मुक्त हों, इस दिशा में सोचने की जरूरत है।

हाल ही में एक रिश्तेदार की शादी में शामिल होने का मौका मिला था। उसके बारे में पहले पता चला था कि लड़की कामकाजी है। मगर शादी ठीक होने के बाद लड़के ने उस लड़की की नौकरी छुड़वा दी। मैं लड़के को कोसने के बजाय उस लड़की के सोचने-समझने के स्तर पर पर हैरान हुई थी कि जो महिला अपनी आत्मनिर्भरता, आर्थिक सशक्तिकरण तक को शादी से पहले ही कायम नहीं रख सकी या फिर ऐसे दकियानूसी सोच वाले लड़के को मना नहीं कर सकी, उससे किस तरह के महिला सशक्तिकरण की उम्मीद की जा सकती है? यही बात डॉक्टर, सीए या फिर किसी अन्य पेशेवर डिग्री से लैस सभी लड़कियों पर लागू है जिन्होंने योग्य होने के बावजूद खुद को घरेलू सामान बनने दिया, अपनी पहचान बनाए रखने के लिए अड़ी नहीं।

गंभीरता से सोचें तो महिला सशक्तिकरण का असली मतलब महिलाओं को अपने मन से अपनी पहचान के साथ जीने की आजादी मिलना है। केवल महिला दिवस के दिन नहीं, हर रोज। इसके लिए न केवल शुरुआत से ही बेटियों के साथ-साथ बेटों को भी बराबरी के मूल्यों के साथ जीने वाला इंसान बनाना, घरेलू कार्य में निपुण बनाना होगा, बल्कि बेटियों को भी इतना मजबूत बनाने की जरूरत है कि वे अपनी जिंदगी और सपनों की अहमियत को समझ पाएं। तभी वे समाज में मजबूती के साथ खड़ी दिखाई देंगी और उनके सपनों का परचम लहराता दिखाई देगा।

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