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दुनिया मेरे आगे: सद्भाव के रंग

बाजारवाद और विज्ञापनों से प्रभावित न होकर विवेकपूर्ण क्रय-विक्रय करना भी धन का सही प्रबंधन सुनिश्चित करता है। व्यापक दृष्टिकोण का होना हर क्षेत्र में सफल होने के लिए हम सभी के लिए बहुत जरूरी है।

Author March 12, 2019 3:29 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

एकता कानूनगो बक्षी

साल के हर महीने की अपनी एक अलग पहचान और विशेषता होती है। मार्च को हम व्यस्त महीना कह सकते हैं। आदमी तो आदमी, प्रकृति भी इन दिनों अपने को संवारने, व्यवस्थित करने में सक्रिय हो जाती है। पतझड़ के बाद पेड़ों के नव पल्लवन और खिलने, फलने का खूबसूरत समय मार्च के साथ शुरू हो जाता है। जंगलों में भी पलाश अपने रंग बिखेरने लगता है। मौसम के बदले हुए मिजाज दिखाई देते हैं, कभी दिन भर की तीखी धूप और सुबह-शाम की सुकून भरी पुरवाई। यही वक्त है जब विद्यार्थियों की साल भर की मेहनत दांव पर लगी होती है। कुछ विद्यार्थी साल भर के सबक को दोहराने में व्यस्त रहते हैं तो कुछ के हृदय परीक्षा केंद्रों पर तैयारी के बावजूद धड़कते रहते हैं। इसी तरह की सरगर्मी का माहौल इन दिनों सरकारी और निजी कार्यालयों में भी दिखाई देने लगता है। सभी जानते हैं मार्च वित्तीय वर्ष की समाप्ति का माह भी होता है तो सारे खाते या अकाउंटों में ‘डेबिट-क्रेडिट’ करते हुए बंद या ‘क्लोज’ भी करना रहता है। जब हम अकाउंट को क्लोज करते हैं तो उस प्रक्रिया से पूरे साल का लाभ-हानि भी हमारे सामने आ जाता है। यानी एक तरह से मार्च का महीना साल भर में ‘क्या खोया, क्या पाया’ की तस्वीर हमारे जीवन के कैनवास पर चित्रित करने का काम कर जाता है।

देखा जाए तो हमारे जीवन में भी कई खाते हैं, जिनका समय-समय पर अवलोकन करते रहना चाहिए, क्योंकि इनका सही रख-रखाव और संतुलन पूरे जीवन की ‘बैलेंस शीट’ को प्रभावित करता है। मसलन, हमारी सेहत, परिवार, हमारी देनदारियां, हमारे प्रेम और स्नेह का आदान-प्रदान जैसे खातों का संतुलन भी बनाए रखना बहुत आवश्यक है। हालांकि यह काफी चुनौतीपूर्ण भी है। केवल दुनिया नहीं, हमारे जीवन में भी अर्थशास्त्र का बहुत महत्त्व है। हमारी हरेक जरूरत का निदान आखिरकार पैसों यानी धन की व्यवस्थित कार्ययोजना से ही निकल कर आता है। धन या संपत्ति को लेकर पारिवारिक मतभेद, विवाद अक्सर देखने को मिलते हैं। ऐसे में लगता है कि कहीं न कहीं आर्थिक नियोजन के संदर्भ में हमारे दृष्टिकोण पर सबको पुनर्विचार करते रहना चाहिए।
आमतौर पर हम लोग अपनी संपत्ति का निर्माण या बचत मूलभूत जरूरतें पूरी करने के लिए करते हैं। मोटे तौर पर भोजन, आवास, वस्त्र, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षित भविष्य ही हमारी आगे की जरूरतें होती हैं। उसके बाद बाकी धन का निवेश जनकल्याण के कार्यों में या फिर खुद के विकास के लिए करना काफी हद तक ठीक होता है। इसके अतिरिक्त धन का संचय तो लालच ही कहलाएगा।

अगर आपको भूख है दो रोटियों की, पर आप चार और ज्यादा खाएंगे तो अजीर्ण होना स्वाभाविक है। अगर आप वे चार रोटियां किसी जरूरतमंद को दे देते हैं तो मन में संतोष होगा और सुख शांति तो मिलेगी ही, आप अपने आसपास की दुनिया को और खूबसूरत बनाने का प्रयास भी करेंगे। जरूरत के हिसाब से सादगी भरा जीवन जीने से अपूर्व सुकून बना रहता है और हम व्यथित करने वाली अनेक परिस्थितियों से भी बच पाते हैं। पर इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि हम महत्त्वाकांक्षी न रहें। खूब मेहनत करें, जीवन में सीढ़ियां चढ़ते जाएं, लेकिन उसका अंतिम लक्ष्य केवल धन या आधिपत्य प्राप्त करना न रहे, बल्कि उद्देश्य उससे कहीं अधिक बेहतर, सर्व कल्याणकारी हो, जिससे जीवन केवल ‘मैं’ नहीं, बल्कि ‘हम’ के व्यापक क्षितिज को स्पर्श कर सके। सही है कि सभी को शिक्षित करना एक जटिल प्रक्रिया है। मगर जरूरी है कि समझाइश के केंद्र में रूप-पैसे की बात न होते हुए जरूरतों और बेहतर विकल्पों की बात की जाए।

एक हिदायत घर के बड़े-बुजुर्ग अक्सर छोटों को देते सुने जा सकते हैं कि ‘ट्यूब लाइट बंद करो, बिल बहुत आ जाएगा’। यह एक सीमित कथन है। जबकि होना यह चाहिए कि ऊर्जा के नुकसान से व्यापक रूप से क्या असर होता है, उस बारे में विस्तार से बात की जाए। इसके साथ ही चीजों को सहेजना, उनकी कद्र करना, रखरखाव करना, फिर उपयोग करना। इस तरह की शिक्षा जो शायद स्कूलों-कॉलेजों में न मिले, पर सीधे तौर पर हमारे घरों और देश की अर्थव्यस्था पर गहरा असर छोड़ती है। बाजारवाद और विज्ञापनों से प्रभावित न होकर विवेकपूर्ण क्रय-विक्रय करना भी धन का सही प्रबंधन सुनिश्चित करता है।
व्यापक दृष्टिकोण का होना हर क्षेत्र में सफल होने के लिए हम सभी के लिए बहुत जरूरी है। सीमित सोच और तात्कालिक लाभ हमें उस समय तो सशक्त और खुशहाल बना सकता है, लेकिन भविष्य की स्थायी खुशी और संपन्नता की गारंटी नहीं होता। धन, संपत्ति को केवल जरूरत पूर्ति की तरह देखा जाए तो बेहतर होगा। जीवन का असली मजा तो सोच-समझ कर सबको साथ लेकर ‘मार्च’ करने में ही आता है। इस महीने में आने वाला होली का त्योहार इसी का रूपक है। तो अब उमंग, उल्लास, प्रेम, भाईचारे और सद्भाव के इंद्रधनुषी रंग बिखेरना क्यों न कर शुरू कर दिया जाए!

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