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दुनिया मेरे आगे: सच पर परदा

सच यह है कि सहमति से हुए सेक्स के बावजूद यौन शोषण की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

स्त्री अस्मिता और सुरक्षा की गारंटी जैसा कोई संकल्प कहीं जगह नहीं हासिल कर पाता है। (सांकेतिक तस्वीर)

योगिता यादव

जब कोई व्यक्ति चोरी करता पकड़ा जाता है, तो क्या आप उसे बाबा भारती और खड़ग सिंह की कहानी ‘हार की जीत’ सुनाते हैं? नहीं न! तब फिर स्त्रियों से संबंधित अपराध होने पर हमारे देश का कोई नेता और उन जैसे लोग श्लोक, मंत्र और पंचतंत्र की कथाएं क्यों सुनाने की सलाह देने लगते हैं? दरअसल, वे जानते हैं कि छोटे से दिमाग को उलझाए रख कर जेंडर या सामाजिक लिंग के एक बड़े प्रश्न को बेदखल किया जा सकता है। क्षेत्रवाद, जातिवाद, धर्म, आधुनिक बनाम पारंपरिक की लड़ाई के बीच जेंडर की अस्मिता और संरक्षा के मुद्दे को बहुत शातिराना तरीके से उलझाया जा सकता है, जिसे इसके खैरख्वाहों ने ही यथासंभव उलझाया है।

भूख एक नैसर्गिक क्रिया है, लेकिन भूख के लिए किसी का अन्न, औषधि या सामान चुराना अपराध है और उसके लिए सजा निर्धारित है। भूख की मजबूरी से आप चोरी को न्यायसंगत नहीं ठहरा सकते। पर यौन शोषण और बलात्कार के मामलों में इन दोनों को भरसक उलझाया जाता है। दोनों ही जघन्य अपराधों को मनुष्य की स्वाभाविक सहवास की आवश्यकता बता कर सही ठहराने की कोशिश की जाती है। फिर चाहे इसके लिए पीड़िता का चरित्रहनन ही क्यों न करना पड़ जाए!

कुछ समय पहले ‘मी टू’ की मुहिम के दौरान जब महिलाएं अपने पुराने कटु अनुभवों को सामने लाकर अपनी साझी अस्मिता के लिए खड़ा होने की कोशिश कर रही थीं, तब भी कुछ महिलाएं इनके विरोध में आर्इं। यह उन लोगों के लिए अनुकूल मौका बन गया, जिन्हें स्त्री के आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों से ज्यादा उसकी यौन स्वतंत्रता की वकालत सूट करती है। जबकि अपनी दुनिया में वे आर्थिक मामलों में धोखाधड़ी, दल-बदल कानून और सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के लिए भी कानून का सहारा लेते हैं।

सच यह है कि सहमति से हुए सेक्स के बावजूद यौन शोषण की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। यह बस वैसा ही है जैसे साझेदारी में शुरू किए गए कारोबार में धोखाधड़ी होने पर कानून किसी को मुकदमा करने का अधिकार देता है। हमारे देश और समाज में आर्थिक मामलों में धोखाधड़ी होने पर तो अपील का अधिकार है, पर शारीरिक संबंधों और प्रेम में हुई धोखाधड़ी पर महिलाएं ‘चटखारे की विषयवस्तु’ बन जाती हैं। कारण साफ है कि अब भी आधी आबादी जेंडर के मुद्दे को वोट बैंक नहीं बना पाई है। कितनी ही बार उसके मन का पलड़ा अपने जेंडर के बजाय अपने पुरुष साथी की विद्वता, महानता, सामाजिक-आर्थिक हैसियत और रसूख की तरफ झुक जाता है। स्त्री अस्मिता और सुरक्षा की गारंटी जैसा कोई संकल्प कहीं जगह नहीं हासिल कर पाता है। अब भी भारतीय राजनीति ‘वीरों’ की पनाहगाह है, स्त्री अस्मिता की नहीं।

करीब सत्रह साल पहले की बात है। उत्तर प्रदेश के लखीमपुर में एक लड़की ने किशोरावस्था में ही वीर रस की कविताओं से मंचों पर तहलका मचा दिया था। चौबीस साल की उम्र में जब उसकी हत्या हुई तो वह गर्भवती थी। पोस्टमार्टम और फिर डीएनए जांच में पता चला कि उसके गर्भ में बच्चा एक स्थानीय बाहुबली नेता का था। फिर उससे जुड़ी कई कहानियों के अलावा नेता की पत्नी के नाम पर कवयित्री को कई तरह के लाभ दिलाने की खबरें तैरने लगीं। दरअसल, उस नेता के साथ उसकी पत्नी भी हत्या में शामिल थी। दोनों को आजीवन कारावास की सजा हुई। उस हत्याकांड ने पूर्वांचल की सियासत में तूफान मचा दिया था। लेकिन जानते हैं, जनता जनार्दन ने क्या किया? तैंतीस से ज्यादा मामलों में दोषी वह बाहुबली नेता सन 2007 में गोरखपुर जेल से ही चुनाव लड़ा और महाराजगंज की लक्ष्मीपुर सीट से बीस हजार वोटों से चुनाव जीता। तो हम, भारत के लोग, जो संविधान पर अटूट आस्था रखते हैं, वे असल में इतने भावुक और इतने विवेकहीन हैं कि मतदान करते समय हमें अपनी मां, बहन और बेटियों का भी खयाल नहीं आता।

हम वही जनता जनार्दन हैं जो बलात्कार के आरोपी और दोषी ठहराए गए बाबाओं की गिरफ्तारी के विरोध में लट्ठ लेकर खड़े हो जाते हैं, समाज सेवा और अध्यात्म के नाम पर। क्या हुआ जो बाबा ने आठ, दस या उससे भी ज्यादा महिलाओं, बच्चियों को अपनी हवस का शिकार बना लिया! न्याय मांगने के लिए दर-दर भटकती बलात्कार पीड़िता के लिए हमारा दिल भले न पसीजे, पर जब कोई नेता बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार हो जाए तो हम उसके लिए जुलूस निकालेंगे और कहेंगे- ‘हमारा विधायक निर्दोष है’। इन जुलूसों में महिलाएं भी होंगी!

अब भी हमारी लोकसभा और राज्य की विधानसभाओं में कई ऐसे नेता हैं जिन पर संगीन आरोप लगे हैं और मुकदमे चल रहे हैं। चुनाव प्रक्रिया से जुड़े एक शोध संस्थान के आंकड़े बताते हैं कि सत्रहवीं लोकसभा के लिए चुन कर आए 542 सांसदों में से 233 के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। अब बताइए कि आप किस तरफ हैं? इन्हें जिता कर दामिनी, निर्भया या दिशा के साथ जो हुआ, उससे उपजी पीड़ा पर मोमबत्तियां जलाने वालों की तरफ या बलात्कार से बचने के लिए लड़कों को श्लोक और मंत्र सुनाने वालों की तरफ?

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