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दुनिया मेरे आगे: रिश्तों की डोर

दुनिया को तो हम मुट्ठी में कर लेने का दावा कर रहे हैं, लेकिन परिवार समेत सामाजिक संबंध और रिश्तों की डोर निरंतर कमजोर होकर टूट रही है।

Author नई दिल्ली | August 14, 2019 2:48 AM
सांकेतिक तस्वीर।

अनीता यादव

इन दिनों डिजिटल क्रांति के दूत मोबाइल को लेकर देश-दुनिया में एक खलबली-सी मची हुई है। यह खलबली मोबाइल से जुड़े नकारात्मक प्रभावों को लेकर है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, इसके बावजूद आज वह समाज से धीरे-धीरे कट रहा है। मोबाइल के जरिए वह सोशल मीडिया के फेसबुक, ट्विटर, वाट्सऐप, इंस्टाग्राम सरीखे माध्यमों पर लगभग हर वक्त सक्रिय रहता है। आधुनिक जीवन शैली ने पहले हमें पड़ोस से काट कर अलग कर दिया तो वर्तमान में मोबाइल परिवार से भी दूर करता जा रहा है, जो समाज की सबसे छोटी इकाई है।

दुनिया को तो हम मुट्ठी में कर लेने का दावा कर रहे हैं, लेकिन परिवार समेत सामाजिक संबंध और रिश्तों की डोर निरंतर कमजोर होकर टूट रही है। मित्रता और रिश्ते केवल सोशल मीडिया पर निभाए जा रहे हैं। वास्तविक जीवन में न कोई किसी के घर जाना चाहता है, न बुलाना चाहता है। समाज से दूर होता व्यक्ति तनाव, खीझ, अकारण डर की भावना सहित हीनता की भावना का भी शिकार हो रहा है। इसके बावजूद मोबाइल की गुलामी हमें प्रिय और सर्वस्वीकार्य भी लगती है। रात में नींद से उठ-उठ कर अपनी पोस्ट पर पसंदगी और टिप्पणियां गिनना मानसिक बीमारी नहीं तो क्या है? हर वक्त नोटिफिकेशन की ध्वनि न केवल कार्य-शैली को प्रभावित करती है, बल्कि मोबाइल में झांकने को भी बाध्य करती है।

आधुनिक जीवन में फैलता यह ऐसा व्यवधान है जो रोज न केवल मानसिक, बल्कि शारीरिक बीमारियों को भी न्योता दे रहा है। आधुनिक जीवन-शैली पर चल रहे शोध के अनुसार मोबाइल हमारे मन और शरीर, बल्कि उम्र को भी प्रभावित कर रहा है। पिछले दिनों आस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड स्थित सनशाइन कोस्ट यूनिवर्सिटी ने एक शोध में पाया कि ज्यादा समय मोबाइल देखते रहने से सिर की हड्डी में वृद्धि देखी गई है। देखने में यह बिल्कुल सींग के आकार की ही लगती है, जो घंटों मोबाइल पर झुके रहने के कारण बननी शुरू होती है।

इस खबर को मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक पर खूब जगह मिली। ईयर फोन लगाकर रेलवे क्रॉसिंग और सड़क पार करना तो हमारे यहां आम बात है, इससे हो रही दुर्घटनाओं में मरने वालों का आंकड़ा हर अगले साल नए रिकॉर्ड बना रहा है। इसी तरह, गाड़ी चलाते हुए मोबाइल में वीडियो देखने, फोन या गाने सुनने से भी हम बाज नहीं आते। हम समझना नहीं चाहते कि हमारे मस्तिष्क की बुनावट कुछ इस तरह से है कि एक समय पर एक ही कार्य में मस्तिष्क को केंद्रित कर सकते हैं। मस्तिष्क एक साथ कई काम करने के लिए नहीं बना। कुछ अपवाद जरूर हो सकते हैं।

किसी मित्र या रिश्तेदार मरीज को अस्पताल में मिलने जाने पर हम मरीज से कितनी बातें करते हैं? सेल्फी लेने और उसे सोशल मीडिया पर डालने में ही समय बिता कर लौट आते हैं। यह ‘सेल्फी मेनिया’ कई बार नैतिक सीमाओं का अतिक्रमण कर जाता है जब लोग मृतक की मुखाग्नि या दाह संस्कार की तस्वीर भी साझा करने से बाज नहीं आते। हम जीवन के किन क्षणों को सार्वजनिक करें, इसकी सीमा तय करना जरूरी है।

मोबाइल के रूप में मुट्ठी में समाई ‘वर्चुअल’ यानी आभासी दुनिया क्या हमारी वास्तविक दुनिया को धीरे-धीरे लील नहीं रही? आज हम तकनीक को इस्तेमाल नहीं कर रहे, बल्कि तकनीक हमें इस्तेमाल कर रही है। कुछ समय पहले तक हम बताने में असमर्थ थे कि हमारे पड़ोस में कौन रहता है, अब यह बताने में असमर्थ हैं कि घर में कौन हमारे साथ है। खाने की मेज से लेकर बिस्तर तक पर भी हम मोबाइल के साथ होते हैं। सोशल मीडिया के ‘स्टेटस’ को आधुनिक युवा का ‘स्वैग’ समझा जाता है। आधुनिक समाज का यह सच क्या विचारणीय नहीं है?

दिखावे की भावना कभी हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं रही। गौतम बुद्ध, महावीर, विवेकानंद सरीखे तमाम चरित्रों से हमने सहज और त्यागमय जीवन को जाना है। सोशल मीडिया का स्वरूप समय की मांग हो सकता है, लेकिन आज यह अति कर रहा है। हम घूमने या पर्यटन के लिए इसलिए नहीं जाते कि प्रकृति से जुड़ कर थोड़ा सुकून या घुमक्कड़ी के माध्यम से दिनचर्या से कट कर वृहद समाज से जुड़ने में आनंद की अनुभूति होगी, बल्कि इसलिए कि कोई खास जगह हमें सोशल मीडिया पर अधिक से अधिक ‘लाइक’ और टिप्पणियां दिला सकती है। ‘डेयरिंग’ करना आधुनिक युवा का ‘स्वैग’ या दंभ है, फिर चलती ट्रेन के आगे सेल्फी लेना हो या नदी, समुद्र की ऊंची लहरों के साथ। यह कैसा ‘स्वैग’ है जो जान के बदले भी सीख नहीं दे पा रहा!

अमेरिकी सरकार ने पिछले दिनों सड़क पर चलते हुए मोबाइल पर बात करने वालों के खिलाफ नियम बनाए हैं और कड़ाई से नियमों के पालन को सुनिश्चित करने की बात की है। क्या भारत में भी ऐसे कानून की दरकार नहीं हैं? कोई भी तकनीक जान की कीमत पर किसी भी सभ्यता में स्वीकार्य नहीं हो सकती। कुछ बंदिशें जीवन को सकारात्मकता की ओर ले जाएं तो बुरा क्या है! मानव जीवन इतना सस्ता नहीं हो सकता कि उसे तकनीक की भेंट चढ़ा दिया जाए।

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