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दुनिया मेरे आगे: हवा में जहर

पुआल या पराली की आग में एसिटोनिट्राइल की सांद्रता, लकड़ी की आग की तुलना में दस गुना अधिक होती है और यह हवा में लंबे समय तक बनी रहती है।

Author Updated: November 15, 2019 3:04 AM
दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में तो पंद्रह हजार रुपए जुर्माना लगाने का भी प्रावधान किया था, मगर इससे स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ा।

पूरे उत्तर भारत में छाई धुंध से दम घुटना अब एक बड़ी समस्या बन चुका है। इसका एक कारण पराली जलाने पर केंद्रित है तो बहुत सारे लोग पटाखों, औद्योगिक धुएं और वाहन प्रदूषण को दोषी बता रहे हैं। सही है कि वायु प्रदूषण में इक्यावन फीसद हिस्सा वाहन प्रदूषण का है, जिनमें डीजल वाहनों का उत्सर्जन ज्यादा नुकसानदायक है। औद्योगिक उत्सर्जन, प्लास्टिक कचरा, पटाखे, लकड़ी या कोयला जलाने से भी हवा प्रदूषित हो रही है, लेकिन वर्तमान धुंध के पीछे पटाखे और पराली जलाना एक कारण तो है।

कोलोराडो विश्वविद्यालय के कोऑपरेटिव इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च इन एनवायरमेंटल साइसेंज के वैज्ञानिकों ने भी माना है कि पराली जैसे बायोमास जलाने से खतरनाक नाइट्रोजन युक्त कार्बनिक रसायन निकलते हैं। ये रसायन, लकड़ी जलाने की तुलना में हवा को ज्यादा जहरीला बनाते हैं। पुआल या पराली की आग में एसिटोनिट्राइल की सांद्रता, लकड़ी की आग की तुलना में दस गुना अधिक होती है और यह हवा में लंबे समय तक बनी रहती है।

किसानों द्वारा खेतों में पराली जलाने के कृत्य को विगत वर्ष राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण यानी एनजीटी ने गंभीरता से लिया था और इस कृत्य को स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मानते हुए पर्यावरण शुल्क वसूलने का आदेश दिया था। दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में तो पंद्रह हजार रुपए जुर्माना लगाने का भी प्रावधान किया था, मगर इससे स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ा। इस साल धुंध और बढ़ गई। स्कूली बच्चों के स्वास्थ्य पर खतरे को देखते हुए छुट्टी भी घोषित कर दी गई थी। जाहिर है कि यह समस्या जुर्माने से हल नहीं हो सकती।

पराली या फसलों के डंठलों को जलाने की समस्या दरअसल खेती-किसानी से पशुओं की छुट्टी का परिणाम है। अब खेती-किसानी की संरचना बदल चुकी है। मशीनों के प्रयोग ने पशुओं को बेदखल कर दिया है। चारे की आवश्यकता समाप्त हो गई है। मशीनों से फसलों की कटाई के बाद डंठलों को खेतों में छोड़ दिया जा रहा है। पराली को खेत से अलग करने के लिए मजदूरों का अभाव है और यह एक खर्चीला काम है। किसानों की हालत पहले से ही खराब है और वे खेतों से पराली अलग करने का खर्चीला काम नहीं कर पा रहे। जला कर मुक्ति पाना ही एक विकल्प है। इसमें कोई दो राय नहीं कि डंठलों को जलाना स्वास्थ्य और जैविक दृष्टि से हानिकारक है। पर्यावरण के साथ-साथ इससे जमीन की उर्वरा शक्ति भी प्रभावित होती है। खेती-किसानी में सहायक छोटे-छोटे जीव मारे जाते हैं। उन जीवों पर निर्भर रहने वाली चिड़ियां मारी जाती हैं।

यह समस्या अकारण और एकाएक नहीं पैदा हुई है और न इसके लिए सिर्फ किसान दोषी हैं। दरअसल, यह हमारी गलत कृषि नीतियों का परिणाम है जो पर्यावरण का ध्यान रखे बिना, मुनाफे के गणित पर तैयार की गई हैं। हमने मशीनों और जानवरों के बीच के सामंजस्य को भंग कर दिया है। हमारे कृषिकरण में मनुष्य और मशीनों के साथ-साथ पशुओं की भूमिका भी तय होनी चाहिए थी। मशीनों के इस्तेमाल के साथ-साथ खेतों में उसके द्वारा छोड़े गए अवशेषों के निस्तारण पर विचार किया जाना चाहिए था।

हमें इस तथ्य को याद करना चाहिए कि एक दशक पूर्व तक पुआल जलाने की नौबत नहीं आती थी। किसान पुआल की पूंज लगा कर हिफाजत करते थे। पुआल की बिक्री होती थी। यही स्थिति गेहूं के भूसे की भी थी। खेती-किसानी की पूरी संरचना पशुओं पर निर्भर होने के कारण पुआल की खपत इतनी थी कि किसान पुआल को चारे के रूप में इस्तेमाल करने के बाद जो बचता था, उसे बेच कर कुछ कमा लेते थे। कागज बनाने में भी पुआल या भूसे का इस्तेमाल होता था और गांव-गांव में भूसा खरीदने वाले ट्रक दिखाई देते थे। सच यह है कि फसल अवशेषों के व्यावसायिक उपयोग को नकार कर आधुनिक मशीनों से खेती-किसानी की जो तरकीब निकाली गई, उसने इस समस्या को जन्म दिया है।

हमने पराली के उपयोग का विकल्प तैयार नहीं किया है। अगर रोटावेटर जैसी मशीनों को हर ग्राम सभा में उपलब्ध करा कर पराली को बारीक कतर कर जमीन में मिलाने की सुविधा उपलब्ध कराई गई होती तो प्रशिक्षित किसान पराली को सड़ा कर जैविक खाद बना सकते थे। हमें कागज और कार्ड बोर्ड बनाने में पराली और भूसे का उपयोग बढ़ाना चाहिए और पराली की खरीद की योजना लानी चाहिए।

चूंकि अवशेष डंठलों से भी लाभ कमाया जा सकता है, यह ध्यान में आने के बाद किसान जलाने का विकल्प छोड़ देंगे। कंबाइन की कार्य प्रणाली में भी बदलाव किया जाना चाहिए, जिससे धान निकालने के बाद उसी मशीन से डंठलों को भी खेतों से निकालने का काम हो। डंठलों से खाद निर्माण के लिए योजनाएं चला कर उनकी उपयोगिता बढ़ाई जा सकती थी। देखा जाए तो यह मसला न तो प्रतिबंधों से हल हो सकता है और न सख्त कानून से, पराली को उपयोगी बना कर और किसानों के बीच जागरूकता फैला कर ही इस समस्या से निपटा जा सकता है।

सुभाष चंद्र कुशवाहा

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