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दुनिया मेरे आगे: विकल्प के रास्ते

अखिल भारतीय प्लास्टिक विनिर्माता संघ के अनुसार करोड़ों के प्लास्टिक व्यवसाय में करोड़ों लोग प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से जुड़े हुए हैं।

Author Published on: October 19, 2019 1:56 AM
राष्ट्रीय हरित पंचाट से लेकर देश की कई अदालतें प्लास्टिक पर पाबंदी लगाने के आदेश दे चुकी हैं। (सांकेतिक तस्वीर)

संतोष उत्सुक

यह हमारी पुरानी सांस्कृतिक, परंपरागत समृद्ध कार्यशैली है। बर्फ पड़ने से पहले, उच्चतरीय बैठक में नमकीन के साथ चाय पीकर, संभावित दिक्कतों से निपटने की पूरी तैयारी के बाद खबर छपवाई जाती है। लेकिन जब बर्फ पड़ती है तो सारा प्रबंधन पिघल जाता है। हमारे शरीर के महत्त्वपूर्ण हिस्से, प्लास्टिक पर प्रतिबंध के बारे में विकल्पहीनता व्यंग्यात्मक शैली में हंस रही है। प्लास्टिक की खतरनाक गोद में हम आराम से जी रहे हैं। प्लास्टिक इतना लुभावना, सस्ता, टिकाऊ और बिकाऊ है कि हम इससे आसानी से जुदा नहीं हो पा रहे हैं। अनेक गृहिणियों के पास कई दशक पुराने प्लास्टिक पात्र होंगे, जिन्हें उन्होंने संभाल कर रखा हुआ है। वे शायद उन्हें बहुत प्रिय हैं।

खानपान और जीवन-शैली में हम मांसाहारी हों या शाकाहारी, लेकिन सब प्लास्टिकहारी जरूर हैं। प्रशासन द्वारा प्लास्टिक का प्रयोग बंद होने की मजबूरन पुष्टि करने से प्रयोग बंद नहीं होगा। क्या हम इतिहास में प्रवेश कर प्लास्टिक का आविष्कार करने वाले को सजा दे सकते हैं! 1907 में प्लास्टिक के आविष्कारक लियो हेंड्रिक बैकेलैंड को पता नहीं था कि इंसान प्लास्टिक को मानवता और प्रकृति के लिए इतना खतरनाक बना लेगा। यह ‘सभ्य’ इंसान द्वारा प्लास्टिक उत्पादों से उठाए अनुचित लाभ का उदाहरण है। कुदरत के साथ भी इंसान ने बेहद अनुचित किया।

राष्ट्रीय हरित पंचाट से लेकर देश की कई अदालतें प्लास्टिक पर पाबंदी लगाने के आदेश दे चुकी हैं। कई मामले अदालत में बहस की प्लास्टिक में लिपटे पड़े हैं। लाखों सामाजिक संस्थाएं जुटी हुई हैं, लेकिन कोई प्लास्टिक का विकल्प बताने को राजी नहीं। विकल्प शायद अभी तक उपलब्ध ही नहीं है। कपड़े का थैला, कागज का लिफाफा सीमित विकल्प हैं। कोई नहीं जानता कि रोज प्रयोग होने वाले दूध के करोड़ों पैकेट की नई पैकिंग कैसे होने वाली है! क्या सुबह से रात तक बिकने वाली पानी की करोड़ों बोतलों की जगह कांच या स्टील की बोतलें लेंगी? सैकड़ों कंपनियों के दर्जनों स्वादों में पैक होकर आने वाले जीभ ललचाऊ, स्वास्थ्य खराब करने वाले चिप्स और दूसरे अनगिनत उत्पाद क्या अब खुले मिलेंगे?

अखिल भारतीय प्लास्टिक विनिर्माता संघ के अनुसार करोड़ों के प्लास्टिक व्यवसाय में करोड़ों लोग प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। उससे ज्यादा संख्या में पेट यह उद्योग भरता है। इस व्यवसाय से सरकार को मिलने वाला राजस्व भी एक पक्ष है। बेचारी अधिकतर आम जनता फोन और मनोरंजन में व्यस्त अगले चुनाव तक सरकार का हुक्म बजाने को विवश है। लेकिन उद्योगपतियों के पास भी एकदम से कोई विकल्प नहीं है। सालों का जमा-जमाया व्यवसाय तुरंत बंद कर नए अपरिचित व्यवसाय के धरातल पर काम शुरू करना बच्चों का खेल नहीं है। कोई भी व्यक्ति अपनी पुरानी छोटी से छोटी नौकरी तब छोड़ता है, जब उसे नई नौकरी मिल रही हो और उससे आय भी ज्यादा होने वाली हो।

प्लास्टिक बंद करने से पहले जरूरी है कि इस उद्योग में छोटे से बड़े स्तर तक जितने भी मजदूर, उद्योगपति, व्यवसायी, नौकरीपेशा, दुकानदार और अन्य लोग जुड़े हुए हैं, उनके साथ विस्तार से बातचीत हो, उनकी समस्याओं को ध्यान में रखते हुए उन्हें इस आवश्यक सामाजिक बदलाव के लिए नया व्यवसाय अपनाने को तैयार किया जाए। उन्हें समय दिया जाए, ताकि वे अपने और अपने परिवार के लिए रोजी-रोटी का प्रबंध कर सकें। इस बारे में सरकार उनकी मदद करने के संजीदा प्रयास करे। अभी तक किए गए प्रयास सिर्फ किसी को खुश करने तक सीमित लगते हैं।

मान लीजिए दूध के पैकेट का विकल्प कांच की बोतल हो सकती है और प्लास्टिक पाउच बनाने वाली कंपनियां कांच की बोतल बनाना शुरू सकती हैं तो इसमें मानसिक तैयारी, तकनीक, कामगार, सरकारी सहयोग और समर्थन, मोटी धनराशि और वक्त भी चाहिए। स्मार्ट सिटी चंडीगढ़ जैसी विश्व प्रसिद्ध जगह पर सब्जी मंडी से मटर खरीदते हुए मैंने विक्रेता को पॉलिथीन बैग में न देकर कागज का लिफाफा देने को कहा तो उसने कहा- ‘सर जी पहले पॉलिथीन के बैग का उत्पादन रुकना चाहिए’। मेरे पास बड़ा बैग था, लेकिन उसमें सारे फल और सब्जियां इकट्ठे डालना भी उचित न होता या फिर मैं कई छोटे थैले लेकर जाता।

एक स्थानीय दुकानदार ने बताया कि चालान किए जा रहे हैं, लेकिन जिनकी प्रशासनिक पहुंच है, उन्हें अभी भी ज्यादा परेशानी नहीं है। जो प्लास्टिक उत्पाद देश भर में बन चुके हैं, उन्हें चाहे प्रयोग न करें, लेकिन भविष्य में प्लास्टिक के विकल्प का होना योजना स्तर पर या बातों और सरकारी घोषणाओं में नहीं, बल्कि जूट या कपड़े के थैले की तरह वास्तविक रूप में उपलब्ध होना लाजिमी है। प्लास्टिक के उत्पादन को कम करते हुए आमजन के लिए इसका उपयुक्त विकल्प तैयार कर उसका प्रयोग बढ़ाना ही प्राथमिकता होनी चाहिए। कार्य-संस्कृति की शानदार परंपरा के अनुसार विकल्पहीनता के आसन पर बैठ कर अविलंब परिवर्तन की अपील करना हमारी श्रेष्ठ आदतों में शुमार है, जिसका शोधन और संशोधन अब बदलते वक्त की मांग है।

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