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दुनिया मेरे आगे: मूंगफली का छिलका

जब तक आप ‘सारयुक्त’ (दानासहित ) होते हैं, तब तक आपकी उपयोगिता बनी रहती है, आप शिरोधार्य बने रहते हैं। ‘सारविहीन’ (दानारहित) होने पर आप नकार दिए जाते हैं, घर-परिवार और समाज से मूंगफली के छिलके की तरह।

Author Published on: September 21, 2019 2:17 AM
सांकेतिक तस्वीर।

अनिता वर्मा

मूंगफली का छिलका यों तो किसी की दृष्टि में नहीं आता। निरर्थक-सा पड़ा रहता है सिनेमाघरों, ट्रेन के डिब्बों, सड़क पर, खोमचे वालों के बगल में बेकार-सा! जब नजर पड़ जाए किसी सफाई वाले की तो इकट्ठा कर लगा दिए जाते हैं मूंगफली के छिलकों के ढेर। मैंने भी मूंगफली के दानों का रसास्वादन कर समय व्यतीत करने के बाद फेंक दिया छिलकों को लापरवाही के साथ। अब छिलके से किसी को कोई सरोकार नहीं। अब तो हवा का एक झोंका भी उसे डिगा सकता है, उड़ा सकता है। एकत्र छिलकों के ढेर को तेज हवा की रफ्तार तितर-बितर कर देती है एक क्षण में अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हुए। कोई भी नहीं पूछता उसके हाल। बेकार, निरर्थक और सारहीन जो हो गया है वह हमारी दृष्टि में। कहा भी गया है- ‘सार-सार को गही रहे थोथा देई उड़ाय’। तो हमने इस दर्शन को आत्मसात करते हुए ‘सारतत्त्व’ (दाना) को ग्रहण करते हुए ‘असार’ (छिलका) को उड़ा दिया, फेंक दिया।

यही आज का दर्शन और चिंतन है। भौतिकतावादी चिंतन का यथार्थ, जहां उपयोग में आने के बाद कोई भी प्रयोग की गई वस्तु फेंक दी जाती है कबाड़ में। ‘यूज ऐंड थ्रो’ की संस्कृति फलीभूत और पल्लवित हो रही है। फिर छिलके का कोई महत्त्व और अस्तित्व भी तो नहीं होता! तब कौन उसकी परवाह करे, कौन उसके विषय में चिंतन करे! कोने में पड़ा मूंगफली का छिलका यों ही पड़ा रहता है चुपचाप, चुप्पी साधे, बिना किसी भाव के शांत! वह कर भी क्या सकता है, अपनी बेचारगी पर आंसू बहाने के सिवा! इस प्रतिस्पर्धा के युग की अंधी दौड़ में कौन उसे पूछे!

सब भाग रहे हैं। कोई किसी से कम नहीं। कोई किसी से पीछे नहीं रहना चाहता है। मनभावन, चित्ताकर्षक प्रलोभन उस भीड़ का एकमात्र लक्ष्य बन गया है। कोई किसी से हारना भी नहीं चाहता। घर-परिवार और समाज में अपने आप में सर्वश्रेष्ठ होने का दंभ पाले मदमस्त चाल से थोथे अहं का आवरण ओढ़े भीड़ चली जा रही है। काहे की चिंता कैसी फिक्र..! कौन अपना कौन पराया..! ‘हमें क्या करना’ जैसे सूत्रवाक्य उनके जीवन का आधार बन गए हैं। ऐसे समय में निरर्थक और अनुपयोगी हो गए मूंगफली के छिलके की क्या बिसात!

सरसता में ही जीवन की रागात्मकता अंतर्निहित होती है। जीवन सरस और उमंग से भरपूर हो, तभी जीवन की सार्थकता है, वरना नीरस और सारहीन होकर जीना भी कोई जीना है! सरस से नीरस बनने की पीड़ा का कड़वा यथार्थ कौन बयान करे! मैंने जब समसामयिक संदर्भों पर खुद को केंद्रित करते हुए मूंगफली के छिलके की पीड़ा को अनुभूत करने का असंभव प्रयास किया, तब आज के मानव जीवन की सच्चाई मेरे समक्ष आ खड़ी हुई। कुछ कह या समझ पाते, तभी मुझे लगा कि वह छिलका एक प्रेरक या उपदेशक के रूप में जीवंत हो गया है और मुझसे कह रहा है कि ‘मेरा और मनुष्य जीवन का सत्य एक-सा ही है। जब तक आप ‘सारयुक्त’ (दानासहित ) होते हैं, तब तक आपकी उपयोगिता बनी रहती है, आप शिरोधार्य बने रहते हैं। ‘सारविहीन’ (दानारहित) होने पर आप नकार दिए जाते हैं, घर-परिवार और समाज से मूंगफली के छिलके की तरह।

युगों से मानव जीवन इसी गति से चलता जा रहा है, जहां उसकी सोच और चिंतन में युग के अनुकूल परिवर्तन होता रहता है। परिवेश मानव को तेजी से प्रभावित करता है। जब तक किसी की सार्थकता बनी रहती है, वह शिरोधार्य रहता है। फिर ‘तुम कौन, हम कौन’। इस संसार में संवेदनाएं सुप्त हो रही हैं। किसी को भी वस्तु के रूप में इस्तेमाल कर उसे उठा कर फेंक देना। यह कहां का न्याय है? मूंगफली का छिलका जब तक सरस था, तब तक अलग-अलग रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा। खाद्य पदार्थ, घरेलू खाद्य व्यंजनों, फलाहार, सर्दियों के मेवे के तरह-तरह के नमकीन- सबमें शामिल किया जाता रहा। और तो और, उसके दानों का तेल निकाल कर बचे अवशेष को भी नहीं छोड़ा जाता। वह भी पशुओं के चारे खल-चूरी के काम आ जाता है। पर समस्या तो छिलके की है। वह किस काम का! उसे तो पशु भी नहीं खाते तो उसे कौन सहेज कर रखे!

यही जीवन का कड़वा यथार्थ है, जिसे समझना और स्वीकार करना इतना आसान भी नहीं होता। आखिर मनुष्य इतनी आसानी से कैसे स्वीकार ले कि आज वह अनुपयोगी हो गया है। वह कोई वस्तु भी तो नहीं, जिसके भीतर कोई स्पंदन न हो, चिंतन न हो। यही चिंतन चिंता में बदल कर निराशा और मनुष्य को अवसाद ग्रस्त बना देता है। यही प्रश्न विचारणीय है। विचारों का प्रवाह कभी रुकता नहीं है और विविध विचारों की यही शृंखला अनवरत चलती रहती है। हर मनुष्य के अंतर्मन में यही कारण है मानव मन के दुख का। उसके भीतर का यह दर्द रह-रह कर उसे टीस देता है। जीवन का यह प्रवाह अबाध गति से आगे बढ़ता जाता है, पीछे छूटता जाता है अतीत। और अतीत को भूल कर आगे बढ़ना ही तो जीवन जीने की कला है।

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