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दुनिया मेरे आगे: खुशियों की राह

अपना खयाल रखने का एक तरीका डायरी लेखन भी है। इसके तहत हम छोटे से छोटे काम, जैसे दोस्तों से मिलना, शरीर की देखभाल करना, कुछ नया सीखना, अधिक से अधिक खुशियों के अवसर तय करना जैसे लक्ष्य पूरे महीने भर के लिए निर्धारित कर सकते हैं।

Author Published on: September 26, 2019 6:15 AM
कुछ गलत विचार हमें अपने लक्ष्य से भटकाने का काम भी कर जाते हैं।

एकता कानूनगो बक्षी

मेरी दादी अक्सर एक कहावत का बहुत प्रयोग किया करती थीं। कहती थीं कि ‘जैसा खाएं अन्न, वैसा बने मन’। काफी हद तक उनकी यह कहावत भोजन और उससे होने वाले प्रभाव के मापदंडों पर सही बैठती है। अब देखिए, जब हम गरिष्ठ और मिर्च-मसालेदार भोजन लंबे समय तक करते हैं तो कुछ समय बाद पेट में विकार उत्पन्न होने लगते हैं। नतीजतन, हम कुछ सुस्त और चिड़चिड़े-से हो जाते हैं। लेकिन कभी-कभी यह भी होता है कि जीभ का स्वाद बदलने के लिए चटपटा भोजन करते हैं तो मन प्रसन्न हो जाता है। शरीर का ‘प्रोसेसिंग यूनिट’ एकदम सीधा है। उसके अंदर हम जैसा ‘इनपुट’ डालते हैं, वह वैसा ही ‘आउटपुट’ वह हमें देने लगता है। हालांकि वह हमें अलग-अलग तरीके से सचेत जरूर करता रहता है। जब भी हम खाने-पीने में अति करने लगते हैं या फिर खान-पान में किसी प्रकार की कमी होने लगती है, तब हमारा शरीर हमें संकेत अवश्य देता है, ताकि हम अपनी जीवनशैली को वापस सही पटरी पर ले आएं। सही भोजन और व्यायाम करना तो फिर भी हमारे नियंत्रण में है, पर उन अवांछित विचारों का क्या किया जाए जो हमारे मन और मस्तिष्क पर अनचाहे गहरा असर छोड़ते जाते हैं और उसका प्रभाव हमारे शरीर पर भी दिखने लगता है। विषैले विचारों को भीतर प्रवेश करने से रोकना काफी चुनौतीपूर्ण होता है।

एक सामान्य व्यक्ति दिन भर में कई लोगों से मिलता-जुलता है और उस मुलाकात में एक दूसरे के विचारों और प्रभामंडल का परस्पर असर भी होता रहता है। ऐसे में हम देखते हैं कि कई बार हमारी सकारात्मक ऊर्जा बढ़ जाती है। वहीं कई बार इससे उलटा हो जाता है। हम अपने आपको उदास और निरुत्साही-सा महसूस करने लगते हैं। न चाह कर भी कई बार हमें ऐसे विचारों को सुनना पड़ जाता है जो मन की शांति को तो भंग करते ही हैं, साथ ही स्वास्थ्य पर भी उनका विपरीत असर होने लगता है। कुछ गलत विचार हमें अपने लक्ष्य से भटकाने का काम भी कर जाते हैं।

जीवन में आई विपरीत परिस्थितियां भी हमारे अंदर नकारात्मकता पैदा करती हैं। लंबे समय के संघर्ष के बाद मिली असफलता के बाद आने वाली निराशा से जीवन में आए नकारात्मक विचार मनुष्य को निरंतर कमजोर बनाते हैं। हालांकि यह सब बाहरी वातावरण में घटित होने वाली चीजे हैं जो तब तक निष्प्रभावी हैं, जब तक कि हम उन्हें अपने भीतर प्रवेश न करने दें और शुरुआत में ही उनसे मुकाबला कर उन्हें परास्त कर दें। जिस तरह शारीरिक बीमारियों से बचने के लिए हमारे शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बेहतर होनी चाहिए और उसे मजबूत रखने के लिए हम नियमित उचित आहार और पौष्टिक तत्त्व उसे देते रहते हैं, उसी तरह मानसिक दृढ़ता और मनोबल के लिए भी हमेशा अपने मानसिक स्वास्थ्य का पूरा ध्यान रखा जाना जरूरी है। दृढ़ इच्छाशक्ति और आत्मबल से काफी हद तक असाध्य रोगों को भी परास्त किया जा सकता है।

जरूरी नहीं कि हर समय हमारे आसपास ऐसे लोग मौजूद रहें जो हमें सकारात्मक ऊर्जा देते रहेंगे। जरूरी यह है कि खुद के लिए हम खुद दिनभर की ऐसी खुराक तैयार करें जो हमे सकारात्मक और ऊर्जावान बनाए रख सके। मसलन, हम सुबह ‘मेडिटेशन’ या फिर कोई प्रेरणास्पद किताब के कुछ पन्नों से अपने दिन की शुरुआत कर सकते हैं। यह भी सच है कि स्वयं से अधिक प्रेरणा हमें और कौन दे सकता है! इसलिए अपनी बार-बार आलोचना करने की आदत से हमें परहेज करना चाहिए। छोटे-छोटे प्रयास और सफलता पर खुद ही अपनी पीठ थपथपा लेने में कोई बुराई नहीं है। दूसरों से प्रशंसा और स्वीकृति पाने के लिए पूरे समय निरर्थक प्रयास करते रहने को लक्ष्य बनाने में तो कई बार हम खुद ही निराशा का रास्ता अनायास खोल देते हैं।

एक अच्छा तरीका यह है, जिससे हम खुद को ऊर्जावान बनाए रख सकते हैं- अपने आप को ‘सेकंड पर्सन’ की तरह देखना। अक्सर हम दूसरों की देखभाल बहुत अच्छे से करते हैं। मुसीबत के समय उन्हें सही राय भी दे पाते हैं। लेकिन जब अपनी बात आती है तो कई वजहों से अपना नकारात्मक तरीके से अवलोकन करने लगते हैं या फिर हम खुद को प्राथमिकताओं की सूची में सबसे निचले पायदान पर रख देते हैं। यही वजह होती है कि महत्त्वपूर्ण समय निकल जाता है… कारवां गुजर जाता है और हम गुबार देखते रह जाते हैं।

अपना खयाल रखने का एक तरीका डायरी लेखन भी है। इसके तहत हम छोटे से छोटे काम, जैसे दोस्तों से मिलना, शरीर की देखभाल करना, कुछ नया सीखना, अधिक से अधिक खुशियों के अवसर तय करना जैसे लक्ष्य पूरे महीने भर के लिए निर्धारित कर सकते हैं। ऐसे में मन के सकारात्मक ऊर्जा से भरे रहने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। हर दिन कुछ नया करने का जोश हमें बांधे रखेगा। अगर हम चाहते हैं कि हम और हमारे आसपास के लोग स्वस्थ और खुश रहें तो सबसे पहले जरूरी है कि हम खुद खुश रहें। इसके लिए जरूरी है कि हमारे शरीर ही नहीं, मन-मस्तिष्क को हम अच्छे विचारों का ‘इनपुट’ देते रहें। इसका जो ‘आउटपुट’ हमें मिलेगा, निश्चित ही वह हर तरफ खुशियां बिखेरने का कारण बनेगा।

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