ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे: समांतर संघर्ष

बापू का जीवन, उनके जीवन के द्वंद्व, तनाव, संघर्ष- सभी कुछ को ‘बा’ ने संभाला।

Author Published on: October 2, 2019 1:47 AM
आशा प्रसाद ने ‘कस्तूरबा, कमला, प्रभावती’ पुस्तक में लिखा है कि ‘बा’ के इसी व्यवहार ने देश की साधारण और गरीब स्त्रियों के हृदय जीत लिए थे।

भावना मासीवाल

एक संयोग है कि ‘बा’ और ‘बापू’ के जन्म के लिहाज से देखें तो दोनों के ही डेढ़ सौ साल हो गए। ‘बापू’ यानी महात्मा गांधी को तो हम सभी विद्यालयी पाठ्यक्रम की किताबों से लेकर व्यावहारिक शिक्षा में परिवार और समाज में पढ़ते आ रहे हैं, लेकिन ‘बा’ यानी कस्तूरबा गांधी की चर्चा कम होती है। ‘बा’ से मेरी पहली पहचान बापू के जीवन परिचय को पढ़ने के दौरान हुई। फिर महात्मा गांधी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ पढ़ी तो जाना कि एक हद तक सीमित पहचान वाली ‘बा’ ही ‘बापू’ के प्रयोग यानी अहिंसा, आत्मबल, संयम, उपवास, ब्रह्मचर्य, विश्वास, धैर्य, आत्मविश्वास, निष्ठा, कर्तव्य, सादगी की भोक्ता और दृष्टा रहीं। यही प्रयोग वैश्विक स्तर पर बापू के ‘सत्य के प्रयोग’ बने, जिन पर भारत और विश्व में खूब चर्चा हुई, लेकिन ‘बा’ यानी कस्तूरबा गांधी चर्चा का विषय नहीं बन सकीं। जबकि वे आजादी की लड़ाई में अपनी पूरी निष्ठा और बलिदान के साथ मौजूद थीं।

‘बा’ ने अपने पूरे परिवार, पति, बच्चों को समाज और देश सेवा के प्रति न केवल समर्पित कर दिया, बल्कि अपना जीवन भी प्रेम, समर्पण, त्याग और सेवा के माध्यम से देश को सौंप दिया। सवाल है कि क्या व्यक्ति का शिक्षित वैचारिक आग्रह और राजनीति में सक्रिय हस्तक्षेप ही उसे पहचान दिलाता है? क्या नेपथ्य में काम करने वाले हाथ महत्त्वपूर्ण नहीं? हर पुरुष की सफलता में एक स्त्री का सहयोग होता है। लेकिन मोहनदास करमचंद गांधी को ‘महात्मा’ बनने में हर स्तर पर सहयोग करने वाली कस्तूरबा गांधी को इतिहास में वाजिब अहमियत नहीं मिल सकी।

हालांकि गांधी खुद मानते थे कि ‘बा’ से ही उन्होंने जीवन में आत्मसंयम और संतुलन सीखा। बापू का जीवन, उनके जीवन के द्वंद्व, तनाव, संघर्ष- सभी कुछ को ‘बा’ ने संभाला। वे तो परिवार से विरक्त समाज और देश हित के लिए काम करते थे। दूसरी ओर ‘बा’ परिवार और उसके उद्देश्यों के बीच सामंजस्य लाकर बच्चों को उनसे जोड़ती हैं। वे कस्तूरबा गांधी ही थीं, जो मोहनदास करमचंद गांधी के अहिंसा के सिद्धांत की नींव थीं। सिद्धांत के व्यवहार में सफल प्रयोग से ही सिद्धांत की उपयोगिता सिद्ध होती है।

भारत की आजादी के आंदोलन में कस्तूरबा गांधी ही वह महिला थीं, जिन्होंने महिलाओं को निजी दायरे से बाहर निकाला और आजादी के आंदोलन में सार्वजनिक भागीदारी का हिस्सा बनाया, आजादी में महिलाओं की अहम भूमिका सुनिश्चित की। ‘बा’ को लगता था कि महिलाओं को भी असहयोग आंदोलन में सक्रिय योगदान देना चाहिए। वे घर-घर जाकर महिलाओं को असहयोग के दूसरे दौर में भाग लेने के लिए प्रेरित कर रही थीं। उनको समझा रही थीं कि शराब की दुकानों पर धरना दो, यही देश की आजादी की दुश्मन है।

‘बा’ का महिलाओं का नेतृत्व करना और उन्हें आंदोलन का हिस्सा बनाना दरअसल उनके सरल और अभिमान रहित व्यवहार का प्रभाव था। आशा प्रसाद ने ‘कस्तूरबा, कमला, प्रभावती’ पुस्तक में लिखा है कि ‘बा’ के इसी व्यवहार ने देश की साधारण और गरीब स्त्रियों के हृदय जीत लिए थे। इसी कारण नमक सत्याग्रह के समय या अन्य अवसरों पर वे स्त्रियां घर की चारदिवारी से बाहर आर्इं, समय-समय पर लाठियां खार्इं और जेल गर्इं।’ यहां जाति, वर्ग, धर्म किसी भी तरह का भेदभाव नहीं था, बल्कि ‘आजादी’ के पूरे आंदोलन का एक मत था।

यही वह दौर था जब स्त्रियां सक्रिय रूप से राजनीति और आंदोलन का हिस्सा बन कर उभर रही थीं। यह ‘बा’ चरित्र का ही गुण था कि महिलाओं ने आजादी के आंदोलन में अपनी भूमिका को पहचाना। बिहार में चंपारण आंदोलन के बाद ‘बा’ के नेतृत्व में ही 1922 के असहयोग आंदोलन का कार्यभार आया। असहयोग आंदोलन में नेतृत्व के कारण बापू को मार्च 1922 में छह वर्ष के लिए जेल की सजा हो गई। बापू को कारावास में डाले जाने के बाद निराश लोगों को ‘बा’ संभालती हैं। आशा प्रसाद के मुताबिक, ‘उस समय कस्तूरबा का रूप एक वीरांगना की तरह लोगों के सामने उभरा।

उन्होंने राष्ट्र के नाम यह हृदय-स्पर्शी संदेश दिया- ‘गांधी को दी गई सजा का उत्तर भारत इस तरह से देगा- एक, सभी स्त्री-पुरुष विदेशी कपड़ा पहनना छोड़ दें, खुद खादी पहनें और दूसरों को खादी पहनने के लिए बाध्य करें, दो, सभी स्त्री-पुरुष प्रतिदिन कताई को अपना धार्मिक कर्तव्य समझें और दूसरों को भी कातना सिखाएं-समझाएं और तीन, सभी व्यापारी विदेशी कपड़ों का व्यापार करना छोड़ दें। इस संदेश के बाद विदेशी कपड़ों की होली जलने लगी और घरों में चरखे की धूम मचने लगी।’

असहयोग आंदोलन के बाद 1932 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में भी ‘बा’ ने सक्रिय होकर महिलाओं का नेतृत्व संभाला और जेल भी गर्इं। साहसी, सुदृढ़ और विवेकशील निर्णय लेने वाले व्यक्तित्व के साथ ही अनासक्त और सादगी भरा जीवन उन्हें प्रभावी बनाता था। उन्होंने अस्पृश्यता का विरोध किया और समाज में व्याप्त इस जड़ बुराई का डट कर सामना किया। उनका समर्पण उनके परिवार से अधिक मानवता और देश के प्रति था। ‘बा’ का जीवन भारतीय स्त्री जीवन का यथार्थ है। ऐसा यथार्थ जो स्त्री होकर बेटी, पत्नी, मां और समाज सेविका जैसे सभी रूपों में संघर्षरत था।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 दुनिया मेरे आगे: आधा-आधा कुआं
2 दुनिया मेरे आगे: दौलत का आना-जाना
3 दुनिया मेरे आगे: पर्यावरण के हक में