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दुनिया मेरे आगे: पढ़ने की दहलीज

बच्चों में भाषा सीखने की जन्मजात क्षमता होती है। स्कूल आने के पहले बच्चा भाषा की समझ बना लेता है। भाषा की तासीर मौखिक होती है। इसके साथ ही और भी जुमले स्कूली शिक्षा में अमूमन व्याप्त हैं और बड़े ही शब्दाडंबर के साथ इनका इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन सही मायनों में बच्चों के साथ भाषा शिक्षण करना टेढ़ी खीर से कम नहीं! विडंबना यह कि ‘असर-2018’ की रिपोर्ट भी यही बताती है कि हमारे यहां के बच्चे पढ़ना नहीं सीख पा रहे। आखिर क्यों? मुझे लगता है कि हमारे शिक्षक प्रशिक्षणों और तमाम कार्यशालाओं में भाषा शिक्षण के तहत असल मुद्दे नदारद रहते हैं जो शिक्षकों की तैयारी के लिए जरूरी हैं।

Author Published on: March 13, 2019 3:42 AM
पढ़ना सीखने में स्कूली परिवेश के साथ ही घर का वातावरण भी मायने रखता है। (Express Photo)

कालू राम शर्मा

प्राथमिक कक्षाओं में बच्चों के सीखने-सिखाने के सवाल को हमारे यहां ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया जाता। ऐसा लगता है कि शुरुआती कक्षाओं में बच्चों का सीखना-सिखाना आम बात है। यही धारणा स्कूल से लेकर कमोबेश उच्च स्तर पर भी दिखाई देती है। इसके चलते बच्चे भाषायी क्षमता में कुशल नहीं हो पाते। भाषायी क्षमता में प्रारंभिक स्तर पर सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना वे हुनर हैं, जिन पर बच्चों की पकड़ बनाने पर जोर तो दिया जाता है, मगर ढाक के तीन पात। मैंने पाया है कि भाषा शिक्षण में कार्य करने वाले लोग इन चारों हुनर को एकरेखीय और क्रमबद्ध सिखाने में भरोसा करते हैं। जबकि पहले दो सुनना और बोलना आपस में गुथे हुए हैं। ऐसा कैसे हो सकता है कि स्कूल आने वाला बच्चा पहले सुनना सीखेगा और फिर बोलना! यह जरूर है कि बच्चों को स्कूली माहौल में अधिक से अधिक सुनने-बोलने के अवसर मिलें।

गिजु भाई बच्चों को अपने संदर्भ और परिवेश की कहानियां सुनाते थे। वे बिल्कुल छोटे बच्चों को पढ़ना सिखाने की हड़बड़ी में नहीं थे। कहानियां सुनाना भाषा शिक्षण की पहली सीढ़ी है जहां वे सुनने के हुनर के लिए तैयार होते हैं। जाहिर है कि कहानी के पात्र, घटना आदि पर बच्चे सोचते हैं और कुछ व्यक्त भी करते हैं। अगर बच्चे कहानी सुन रहे हैं तो इसका अर्थ है कि उनके संज्ञानात्मक स्तर पर हलचल हो रही है और वे कहानी के पात्रों की तासीर, घटनाओं के क्रम और अर्थ आदि को पकड़ पा रहे हैं। वास्तव में पढ़ना-लिखना सिखाने के पहले बच्चों में सोचने-समझने का ढांचा निर्माण करना बेहद जरूरी होता है, जिसका अभाव प्राथमिक स्कूली शिक्षा में दिखाई देता है। हर कोई बच्चों से अपेक्षा करता है कि वह पढ़ना और लिखना सीख जाए। लेकिन ये दोनों हुनर उस सोचने-समझने की नींव पर ही विकसित किए जा सकते हैं। मेरी जानकारी में एक स्कूल है, जिसका यहां जिक्र प्रासंगिक होगा जहां बच्चों को पढ़ने का दबाव नहीं बनाया जाता। फिर भी वहां से निकलने वाला हर बच्चा पढ़ना सीख लेता है।

वजह साफ है कि बच्चों को पढ़ना सिखाने के लिए उचित वातावरण दिया जाता है। दरअसल, प्राथमिक स्कूल में बच्चा जैसे ही भर्ती होता है, उसे पढ़ना सिखाने के लिए वर्णमाला के अर्थहीन गहरे कुएं में धकेल दिया जाता है। वहां उसे वर्णमाला, बारहखड़ी, सरल शब्दों को सिखाने की प्रक्रिया में उलझाया जाता है। वर्णमाला वगैरह सिखाने के लिए हमारे शिक्षा जगत में एक से एक कथित तरीके और गतिविधियों के निर्माण में ऊर्जा बरबाद होती है। हमारे यहां आज भी वर्णमाला सिखाने को लेकर नए-नए तरीके ईजाद किए जाते हैं, जिन्हें हम ‘नवाचार’ की श्रेणी में शुमार करते रहते हैं। लेकिन इस पर कभी सवाल उठाने की जहमत नहीं उठाई जाती कि आखिर ये पढ़ना सिखाने के संदर्भ में कामयाब प्रक्रिया है भी या नहीं। लिहाजा, इस पर अगर सवाल उठाए भी जाएं तो वयस्कों द्वारा दलील यह दी जाती है कि हम भी तो वर्णमाला पढ़ कर ही यहां तक पहुंचे हैं।

वर्णमाला के जरिए पढ़ना सीखने की प्रक्रिया उबाऊ और लंबी होती है। पढ़ना सीखने में स्कूली परिवेश के साथ ही घर का वातावरण भी मायने रखता है। आज सर्व साधारण की शिक्षा को लेकर हम जहां खड़े हैं वहां वर्णमाला पद्धति बोझिल होकर पढ़ने से विमुख कर देती है। सवाल यह भी है कि हमने पढ़ने को सीमित दायरे में लिया है। पढ़ना दरअसल पढ़ कर समझना और उस पर चिंतन करना भी है। खासकर प्रारंभिक कक्षाओं में बच्चों के लिए थकाऊ और उबाऊ है। स्कूलों में एक ही तरह की गतिविधियां होती हैं जो बचपन की तासीर से मेल नहीं खातीं।

स्कूली शिक्षा और खासकर प्रारंभिक कक्षाओं में पढ़ने के हुनर को पोषित करने के लिए पाठ्य-पुस्तकों को भी दरकिनार करना होगा। अगर बेहतर पाठ्य-पुस्तकें बना भी दी जाएं तो वे पढ़ना सिखाने में अहम भूमिका अदा नहीं कर सकतीं। इसके लिए स्कूलों में बाल साहित्य उपलब्ध कराना और उसके इस्तेमाल के हुनर को विकसित करना होगा। ‘असर’ और अन्य अध्ययनों की रिपोर्ट आंखें खोलने के लिए पर्याप्त हैं जहां मिडिल स्कूल में पहुंच कर बच्चे दूसरी कक्षा की पाठ्यपुस्तक नहीं पढ़ पाते। इसका हल प्रारंभिक स्तर की कक्षाओं में खोजना होगा और उसे अमल में लाना होगा।

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