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दुनिया मेरे आगे: ओ नीले गुलमोहर

हम तुम्हें गुलमोहर बुलाते हैं। वह भी नीला गुलमोहर। लेकिन तुम्हारा ब्राजीली नाम जैकरंडा है और ये वनस्पति विज्ञानी तुम्हें जैकरंडा मिमोसिफोलिया ही कहते हैं। हम भारतीय भी गजब के हैं न! चीज कहीं की भी हो नामकरण संस्कार जरूर कर लेते हैं।

Author June 6, 2019 1:13 AM
नीला गुलमोहर

जगमोहन चोपता

गोपेश्वर से जैसे चमोली के लिए मोटरसाइकिल पर जाता हूं तो सड़क पर गुलमोहर के खूब सारे नीले-नीले फूल बिखरे होते हैं। लगता है, इस अजनबी शहर में कोई तो है जो हमारी राह में फूल बिछाए खड़ा है कि आओ प्यारे, इस जगह तुम्हारा स्वागत है। काहे अकुलाए और खिसियाए हुए दिख रहे हो और मोटरसाइकिल पर पर सरपट दौड़े जा रहे हो! चिंता न करो… काम गंभीर जरूर है, पर जरूरी तो नहीं कि हर वक्त अपनी शक्ल पर बारह बजाए रखा जाए। खुश हो जा प्यारे… कि नीले रंग ही सही, पर कितने खूबसूरत तरीके से खिलाया है मैंने इन्हें। दरअसल, इन्हें मैंने बड़े नाजों से पाला है! बस तुम्हारे लिए बिछाए हैं मैंने ये।

इसके बाद मैं एक गहरी सांस लेता हूं और मन ही मन यह कहता हूं कि सच तो कह रहे हो दोस्त! काम के साथ थोड़ा मुस्कराया भी जा सकता है। खेला जा सकता है, गाना गाया जा सकता है, चंद अल्फाजों को लिखा जा सकता है। कितना कुछ किया जा सकता है, लेकिन आखिर क्यों कुछ गुम-सा हो गया लगता रहता है!

इस तपती दोपहरी में कितना कुछ अनकहे ही कह जाते हो गुलमोहर! किसने लगाया होगा तुम्हें… कैसे पाला होगा इस सर्पीली सड़क के किनारे! कितना ध्यान रखना पड़ा होगा! एक ही नजर में यह साफ हो जाता है कि बहुत मेहनत लगी होगी तुम्हें पनपने और पनपाने में। हम कहां इतनी मेहनत कर पाते हैं। हालांकि यह जरूर लगता रहता है कि मेहनत करनी तो चाहिए। चलो… थोड़ा तुम्हें ही समझने में मेहनत कर ली जाए।

तो गुलमोहर बाबू, मुझे यही पता है कि तुम्हारा जन्म स्थान ब्राजील है, लेकिन तुम यहां गोपेश्वर कैसे आए होगे! खैर, तुम्हारे फूलों से यही लग रहा है कि तुम्हें भी मेरी तरह गोपेश्वर बहुत पसंद आ रहा है। सुना है कि तुम्हारे पुरखों को भारत आए फिलहाल दो सौ साल ही हुए हैं। तो अभी समाज में जैसा मौसम चल रहा है, उसे देखते हुए मेरी एक सलाह है कि खबरदार हो जाओ गुलमोहर! कहीं देश के ठेकेदार बने खास किस्म के लोग तुम्हें भी विदेशी न बोल दें। लेकिन ऐसी बातों पर बहुत ज्यादा चिंता न करो! यहां के आम लोगों ने तुम्हारे फूलों का उपयोग कृष्ण की मूरत को सजाने में कर लिया है। तभी तो तुम्हें कृष्ण-चूड भी कहते हैं।
सुनो यार… लेकिन तुम्हारे नजदीक जब अपनी मोटरसाइकिल पर आते ही ये कीड़े-मकोड़े तेज गति से नाक, कान, आंख में घुसते हैं न, वह जरा खराब लगता है। लेकिन जब तुम्हारी जासूसी यानी तुम्हारे बारे में तथ्यों की जानकारी हासिल की तो पता लगा कि तुम तो सड़क-किनारे खड़े भरी पूरी शहद की फैक्ट्री हो यार! खूब शहद होता है तुम्हारे फूलों में। यह अलग बात है कि वह शहद कैसे और कहां इस्तेमाल होता है। अभी तक यही जाना है कि तुम्हारी शाखाओं में फूल लगते ही मधुमक्खियां डेरा डाल देती हैं यहां।

हम तुम्हें गुलमोहर बुलाते हैं। वह भी नीला गुलमोहर। लेकिन तुम्हारा ब्राजीली नाम जैकरंडा है और ये वनस्पति विज्ञानी तुम्हें जैकरंडा मिमोसिफोलिया ही कहते हैं। हम भारतीय भी गजब के हैं न! चीज कहीं की भी हो नामकरण संस्कार जरूर कर लेते हैं। वह अपने इलाके और भाषा की सुविधा के साथ। तभी शायद तुम्हारा नाम बंगाल के लोगों ने ‘कृष्णचुरा’ तो कन्नड़ में ‘केम्पू तोराई’ रख दिया। तुम्हें इतने नामों से कभी गुदगुदी नहीं लगती क्या! वैसे सुना है तुम तो ‘कैसलपिननियासी’ परिवार के हो और तुम्हारा बॉटनिकल नाम ‘जैकरंडा मिमोसिफोलिया’ है। और बाबू मोशाय, तुम तो पांच साल के होते ही फूलों से गुलजार होने लगते हो।

तुम्हारे फूलों के बाद फल भी तो मनमोहक लगते हैं। बल्कि मैं इन्हें फल के बजाय बीजों की टोकरी कहूंगा तो ज्यादा बेहतर होगा। करीब-करीब किसी सीपी की तरह होते हैं तुम्हारे फूल। और जब खुलते हैं तो दर्जनों बीजों को फैला देते हो तुम धरती पर, ताकि खूब सारे फूल खिलें इस धरती को सुंदर बनाने के लिए। वैसे 1978 में बनी फिल्म ‘देवता’ में गुलजार साहब ने तुम पर बहुत ही रूमानियत भरा गीत लिखा है। पता है न तुम्हें! अरे वहीं गीत- ‘गुलमोहर तुम्हारा नाम होता, मौसमे गुल को हंसाना भी हमारा काम होता…।’

गुलमोहर, तुमने कभी लेखक और गायक स्टीव टिलसम का ‘ओ जेकरेंडा…’ गीत सुना है? कभी फुर्सत हो तो सुनना प्यारे… बिन हवा के झूमने न लगो तो बताना। उत्तराखंड की एक साथी समाजकर्मी लिखती हैं कि तुम्हारे फूलों के रंग को स्त्रीवादी रंग भी कहा जाता है। और मेरी एक शिक्षिका साथी तो तुम्हारे फूलों के रंग की तरह के खूब सारे सूट सिलवाना चाहती हैं। यानी कि तुम तो बहुत सारे लोगों की पसंद हो। यों ही खिलते रहो प्यारे!

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