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दुनिया मेरे आगे : शोर की मार

सड़कों पर वाहनों का दबाव लगातार बढ़ रहा है। असामाजिक तत्त्व और आज के युवा खाली सड़क पर लगातार हॉर्न के बटन पर अंगूठा रखे फर्राटा मारते रहते हैं!

Author नई दिल्ली | Published on: August 17, 2019 2:34 AM
सांकेतिक तस्वीर।

राकेश सोहम्
मैं एक ऐसे परिवार को जानता हूं जो संगीत के बेहद शौकीन थे। उन्होंने अपने ड्राइंग रूम में बड़े-बड़े साउंड बॉक्स लगा रखे थे। लगभग रोज तेज ध्वनि में वे उन्हें बजाते थे। ध्वनि इतनी तेज होती थी कि मेरे घर की खिड़की के शीशे कभी-कभी बजने लगते थे। उनके घर जब प्रथम संतान लड़की हुई, तब उनकी खुशी की सीमा न रही। उस नन्ही-सी बेटी को गोद में लेकर तेज संगीत के साथ ड्रॉइंग रूम में नाचते रहते। और यही शौक उनकी इकलौती बेटी के कान के परदे को हानि पहुंचाता रहा। इसका पता कुछ साल बाद तब चला, जब उनकी बेटी आवाज और संबोधन पर पर्याप्त प्रतिक्रिया नहीं देती थी। वह बोलती भी अजीब अंदाज में थी। डॉक्टरी जांच से पता चला कि तेज ध्वनि के कारण उसके कान के परदे को गंभीर हानि हुई है। वह जो भी सुन सकती थी, वह कार्टून के किरदार मिकी-माउस की आवाज की तरह ही। इसलिए जैसा सुनती है, वैसा ही बोलने की कोशिश करती है। वह सामान्य बोलचाल की तरह नहीं होता!

कुछ समय पहले शहर के मेडिकल कॉलेज में कान, नाक एवं गला विशेषज्ञों की दो दिवसीय कार्यशाला में प्रतिष्ठित औरख्यातिलब्ध डॉक्टरों ने बधिरों की जटिल शल्य चिकित्सा की। इस आयोजन में यह बात साफ तौर पर चर्चा में रही कि जन्मजात बधिरों को छोड़ कर अस्सी से नब्बे फीसद मामलों में आंशिक या पूरी तरह बहरेपन का मूल कारण ध्वनि-प्रदूषण है। हालांकि डॉक्टर इस बात की खुशी व्यक्त कर रहे थे कि बहरेपन की समस्या से निजात पाना अब संभव हो गया है। ‘काक्लियर इम्प्लांट’ अभी काफी महंगी तकनीक है। आने वाले समय में यह आम आदमी की पहुंच में आ जाएगी और उनका बहरापन मात्र छह से दस लाख में दूर किया जा सकेगा!

खैर, कुछ दिन पहले मैं पत्नी को लेकर स्कूटर से बाजार जा रहा था। भीड़ भरी सड़क पर पीछे से आने वाला मोटरसाइकिल सवार लगातार हॉर्न बजा रहा था। मुद्दा यह नहीं है कि वह हॉर्न क्यों बजा रहा था। सवाल यह है कि राह पर वाहन चलाते हुए हमने कितनी बार अनावश्यक हॉर्न बजाया। क्या हम केवल शौक के लिए हॉर्न बजाते हैं? आज शहरों में लाखों की संख्या में वाहन हैं। इनकी संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। शहरी विकास की गति मंथर है। सड़कें पहले की तरह संकरी हैं। दूसरी ओर बैंकों और ऋण मुहैया कराने वाले संस्थानों ने हर तबके के लोगों को वाहन थमा दिया है।

सड़कों पर वाहनों का दबाव लगातार बढ़ रहा है। असामाजिक तत्त्व और आज के युवा खाली सड़क पर लगातार हॉर्न के बटन पर अंगूठा रखे फर्राटा मारते रहते हैं! उन्होंने दोपहिया वाहनों में तरह-तरह के हॉर्न लगा रखे हैं। ये बटन दबाने पर तो बजते ही हैं, ब्रेक पर पैर रखने से भी विचित्र ध्वनि के साथ बज उठते हैं। चार पहिया वाहनों का भी यही हाल देखने-सुनने में आता है। इन वाहनों को पीछे की ओर करते हुए अनेक प्रकार की तीव्र ध्वनियां उत्पन्न होतीं हैं। छोटी-छोटी तंग कॉलोनियों में चार पहिया वाहनों को पीछे करने में समय लगता है। कई बार तो देर रात या अलसुबह रहवासियों की नींद में इन ध्वनियों से खलल उत्पन्न हो जाता है।

ऐसे कान-फोड़ू शोर से पत्नी के सिर में दर्द होने लगता है। तो सड़क पर उन्होंने अपने कान को हथेली से ढंक लिया और मेरे कान के पास आकर कहा- ‘स्कूटर रोक कर पीछे वाले वाहन चालक को रास्ता दे दो। वह बेकार शोरगुल कर रहा है।’ कमोबेश हर सभ्य नागरिक की यही स्थिति है। वह हमारे चारों ओर फैले शोर को रास्ता दे रहा है। शादी-विवाह, तीज-त्योहार, पूजा-अर्चना या फिर चुनावी रैली जैसे कई और आयोजन, इन सबके नाम पर ध्वनि विस्तारक यंत्र यानी लाउडस्पीकर प्रदूषण फैलाते रहते हैं। हम अपनी सभ्यता की आड़ में दरवाजा बंद कर लेते हैं।

मैं यहां वह आंकड़े नहीं दूंगा कि कितने डेसीबल की ध्वनि कानों के लिए घातक है या कितनी कम ध्वनि केवल कुत्ते सुन सकने की क्षमता रखत हैं। या यह कि रिमझिम बारिश की ध्वनि क्यों कर्णप्रिय होती है! लेकिन मैं यहां आधुनिक सभ्यता और नौजवानों से प्रश्न करना चाहता हूं। क्या हम सुधरेंगे? क्या प्रशासन कोई ऐसा ठोस कानून लाएगा, जिससे ध्वनि प्रदूषण पर अंकुश लग सके? आम सभ्य जन और प्रशासन कब तक निष्क्रिय बने रहेंगे? हमें खुद अनावश्यक ध्वनि विस्तारक यंत्रों के प्रयोग कम करने होंगे।

बहरहाल, हम देर रात कॉलोनी लौटे। घर के सामने स्कूटर बंद करने के पहले आदतन स्कूटर का हॉर्न बजाने जा रहा था, ताकि घर के अंदर बच्चे जाग जाएं। लेकिन पत्नी ने मना कर दिया और घर की इलेक्ट्रॉनिक डोर बेल का बटन दबा दिया। एक कर्ण प्रिय स्वर घर के अंदर से तैरता हुआ मेरे कानों में भी पहुंचा जो सुहाना लगा।

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