ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे: नशे के उत्सव

कहा जाता है कि युवा अपना समय पढ़ाई और खेल में लगाएं, नशे में नहीं।

Author Published on: November 19, 2019 2:55 AM
धार्मिक आयोजनों की तड़क-भड़क, डीजे का करारा छौंक, भांग और घोटे की सुलभ उपलब्धता युवा जीवन को अनुशासन तोड़ने के लिए उकसाती है। सांकेतिक तस्वीर।

धार्मिक आयोजनों की आन-बान-शान में पिछले सालों में काफी इजाफा हुआ है। मेरे घर की छत से जुलूस की रौनक खूब दिखती है। मैंने देखा है कि जुलूस का मुख्य आधार और आकर्षण, अनगिनत लाउडस्पीकरों पर डीजे की तीव्र और अधिकतम फिल्मी धुन आधारित भजनों पर सैकड़ों युवा डांस करते हैं। विद्यार्थी अपने दोस्तों के साथ मजे के लिए आते हैं, जिनमें युवतियां भी शामिल होती हैं। जुलूस शाम को होता है, संभव है कि ऊर्जा बढ़ाने के लिए एकाध पैग शराब भी ले ली हो। वैवाहिक या उत्सवीय मनोरंजन के लिए यह सामान्य बात है।

उत्सव से अगले दिन की चित्र-खबरें बताती हैं कि भक्त, जिनमें राजनीतिक खिलाड़ी और अनाड़ी शामिल हैं, की संस्थाओं द्वारा आयोजित अनेक कार्यक्रमों में शोरदार डीजे का प्रबंध हुआ। भांग के पकौड़े और घोटा, अगाध प्रेम, श्रद्धा और भक्ति के साथ लेने के लिए युवा बाजुओं में होड़ रही। चिलम से कश लगाने के शौकीनों के लिए चांदी से बनी चिलमों का प्रबंध भी किया। देवताओं की शादी के जश्न में प्रसाद ग्रहण करना, बताते हैं एक हजार गुणा फल देता है!

खीर या फलों का प्रसाद पेट भरता है, लेकिन दूसरा प्रसाद चित्त प्रसन्न कर देता है और प्रिय साथी का संग हो तो बेहद आनंद मिलता है। पेट संतुष्टि से ज्यादा मन संतुष्टि मानी जाती है। साफ है कि इन आयोजनों में नशे को मनोरंजन के बहाने एक ‘लांच पैड’ मिल जाता है। धार्मिक आयोजनों की तड़क-भड़क, डीजे का करारा छौंक, भांग और घोटे की सुलभ उपलब्धता युवा जीवन को अनुशासन तोड़ने के लिए उकसाती है। क्या प्रसाद के नाम पर भांग, घोटा या ऐसा कुछ और नशे का खुला प्रचार नहीं है? यह विडंबना है कि एक तरफ तो सरकार और संस्थाएं मिल कर भांग के पौधे उखाड़ने का अभियान चलाती हैं, लेकिन हर बरस फिर हरी-भरी हो जाने वाली भांग ही अभियान को उखाड़ देती है। प्रसाद रूप में सर्वत्र उपलब्ध होकर, राजनेताओं के प्रश्रय में बंट कर फिर अपने बाहुपाश में बांधती है। यहीं विद्यार्थी जीवन में अनुशासन से छिटक कर जिंदगी, नशे के मनोरंजन की गर्त में धंसती जाती है।

हजारों युवाओं में जो मस्ती और मनोरंजन के लिए जुलूस में शामिल होते हैं, कहीं न कहीं नशे का बीज रोपित हो जाता है जो बड़ा होते-होते पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक और विशेषकर दिशाहीन शिक्षा और बेरोजगारी जैसी परिस्थितियों के कारण दूसरे नशों की खाद से बढ़ता है। नशा बेचने वालों का तंत्र बहुत चतुर है। पुलिस सूचनाओं और खुफिया सूचनाओं के आधार पर अपने हिसाब से निरंतर काम करती है। लेकिन अधिकतर सूचनाएं लुप्त रह जाती हैं। कभी पुलिस छापे में 1.18 ग्राम स्मैक मिलती है तो कभी एक किलो चरस या काफी मात्रा में चिट्टा। सरकार अनेक योजनाओं के अंतर्गत प्रयास करती है। स्कूल और सामाजिक संस्थाएं भी सेमिनार, जुलूस के माध्यम से कोशिश करते हैं, लेकिन नशे की लत निरंतर लगाए रखने वाले भी कम नहीं होते।

किसी जमाने में नशा करने वाले कफ सिरप गटकते थे, ब्रैड पर आयोडेक्स लगाकर खाते थे। अब तो तंबाकू, चरस, अफीम, गांजा, भुक्की, सुल्फा- कितना कुछ कितनी जगह आसानी से उपलब्ध है! दवा दुकानों पर नशीली गोलियां भी बेची जा रही हैं, आम जनता और महिला मंडल संघर्षरत हैं, प्रदर्शन कर रहे हैं। नियम और कानून सख्त हैं, प्रशासन है, लेकिन कार्यान्वयन की संजीदगी गायब है।

पहले जीवन सादा, सरल था और युवा मेहनती। लेकिन विकास और संप्रेषण के अति विकसित होते साधनों ने नशे पर भी बहुत काम किया और जाल बिछाने में समय नष्ट नहीं हुआ। कहा जाता है कि युवा अपना समय पढ़ाई और खेल में लगाएं, नशे में नहीं। लेकिन हर हाथ में मोबाइल की उपलब्धता ने हर समय अपने आप से खेलने की जो सुविधा दी है, वह अब दुविधा में तब्दील हो चुकी है। नशा तेजी से युवावस्था से बचपन की ओर बढ़ रहा है जो ज्यादा खतरनाक प्रवृत्ति है।

जरूरत है बेहद व्यावहारिक तरीके अपनाने की, बचपन से युवा हो रहे युवक-युवतियों को घर पर उनके अभिभावकों स्कूल में अध्यापकों और वरिष्ठ मित्रों द्वारा नशे के दूरगामी प्रभावों के बारे में खबरदार करना बेहद आवश्यक है। सामाजिक संस्थाओं की भूमिका कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। बच्चा अपने अभिभावकों की व्यस्तता के कारण वांछित समय और तवज्जो न मिलने के कारण भी नशे की राह पकड़ता है।

बच्चों और विद्यार्थियों को अभिभावकों और अध्यापकों की डांट और सजा का खौफ अनुशासन में रखता था, लेकिन हम सबने मिल कर सामाजिक ढांचे का पुनर्निर्माण ऐसा किया कि स्वतंत्रता ज्यादा बेलगाम हो गई। अब अभिभावकों और अध्यापकों की निरंतर और संयुक्त देखरेख और जिम्मेदारी की जरूरत है। सरकार की ओर से पुलिसकर्मियों और दवा निरीक्षकों की संख्या बढ़ा कर नशे के फैलते जाल को खत्म करने के लिए अतिरिक्त सुविधाएं देना बहुत लाजिमी है। हमें फिर पुराने तौर-तरीकों की तरफ लौटने की जरूरत है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 दुनिया मेरे आगेः विनम्रता के बजाए
2 दुनिया मेरे आगे: गांव की खिड़की
3 दुनिया मेरे आगे: भाषा का जीवन
जस्‍ट नाउ
X