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दुनिया मेरे आगे: बाजार में समाज

युद्ध के मैदानों में, सरकारी आश्रय-स्थलों में, घर में या चिह्नित स्थलों, मसलन सोना गाछी, जीबी रोड जैसे तमाम रेड लाइट एरिया में। चमड़ी और दमड़ी का खेल कैसे चल रहा है, यह हम समझ सकते हैं।

Author Published on: November 2, 2019 2:39 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

बीनू कबीर

हम सब अपने-अपने जीवन में चौराहों, नुक्कड़, गली और मकान को कुछ खास मायने में याद रखते हैं। कुछ गलियां और चौराहे हमारे शहर में होते हैं, बस हम उनसे अनजान रहते हैं। लेकिन बहुत दिनों तक अनजान नहीं रह पाते। एक न एक दिन खरीदार बन कर वहां पहुंच ही जाते हैं। सबकी वहां पहुंचने की अपनी-अपनी वजहें होती हैं। कुछ खरीद-बिक्री अलहदा होती है। श्रम की खरीद-फरोख्त कम से कम कीमत पर जहां होती है, वह है ‘लेबर चौराहा’! यह ‘चौराहा’ हमारे सभी शहरों और कस्बों में मौजूद है। पूंजी और श्रम का निम्नतम और न्यूनतम का खेल हम यहां देख सकते हैं। कुछ न समझ पाएं तो बिकने वाले और खरीदने वाले का चेहरा तो देख ही सकते हैं। फिर घर आकर श्रम कानून पढ़ सकते हैं!

दूसरा, इलाका है ‘रेड लाइट एरिया’। घटना कहीं की हो सकती है, कहीं भी हो सकती है। युद्ध के मैदानों में, सरकारी आश्रय-स्थलों में, घर में या चिह्नित स्थलों, मसलन सोना गाछी, जीबी रोड जैसे तमाम रेड लाइट एरिया में। चमड़ी और दमड़ी का खेल कैसे चल रहा है, यह हम समझ सकते हैं। यहां पुरुष की दृष्टि संपन्नता और दरिद्रता दिख जाती है। सवाल है कि पुरुष हृदय से संचालित होता है या हार्मोनों से? दोनों को मर्यादा में रखने का शिक्षण-प्रशिक्षण उसे मिला है या नहीं? औरत उसके लिए एक उम्र तक कौतूहल है, एक उम्र में आनंद, एक समय में खिलौना और एक समय में कूड़ादान।

स्त्री और पुरुष के लिए एक-दूसरे को जानना एक जैसा नहीं होता। भाषा, संस्कृति, मानसिक, शारीरिक संरचना, आर्थिक, सामाजिक अवस्थिति दोनों को भिन्न बिंदुओं पर रखती है। यों तो इंसान के लिए किसी दूसरे इंसान को जानना भी सहज नहीं। जब हम किसी को जानना शुरू करते हैं, तब यह जानते हैं कि अब तक जानते ही नहीं थे या कितना कम और कितना अलग जानते थे। फिर जानना और समझना सीखते हैं। हम ‘जजमेंटल’ होने की जगह ‘रेशनल’ होना सीखते हैं। शब्दों को सचमुच जीते हुए उनका होना महसूस करते हैं। साथ शब्दों की बाजीगरी और जादूगरी भी पकड़ पाते हैं। समाज की संरचना में कुछ बातें खुद बुनी और बंधी हैं जो स्त्री-पुरुष संबंध को मर्यादित रखती हैं। तमाम रिश्तों की डोर उन्हें सम्मान करना सिखाती है, लेकिन शायद सहज होना नहीं सिखाती। उनकी जिज्ञासाओं और कुंठाओं को जगह ही नहीं देती। फिर कैसे वे मनोग्रंथि बन जाती हैं!

समाज की संरचना की कमियों को राज्य कानून बना कर दंड का प्रावधान करके पूरा करता है, क्योंकि राज्य अपने नागरिकों के संरक्षक की भूमिका में होता है और ऐसा करना उसके लिए अनिवार्य है। व्यक्ति हो संस्था हो या फिर कोई पद, सबको जानने-समझने की एक प्रक्रिया है, जिसमें वक्त लगता है। सब्र की दरकार होती है और परिणाम के प्रति तटस्थ, यहां तक कि निर्मोही होना पड़ता है।

यहां यह रेखांकित किया जा सकता है कि कर्ता की भूमिका में व्यक्ति ही दोनों जगह है- राज्य में और समाज में भी। ऐसी स्थिति में व्यक्ति का मानस, यानी हृदय, विवेक और हार्मोनों का संयोग ही वह जगह है, जिसकी पड़ताल करनी होगी। व्यक्ति यानी स्त्री-पुरुष और अन्य की मानस संरचना कई बिंदुओं पर समान होती है, लेकिन अधिकांश बिंदुओं पर भिन्नता है। फिर व्यक्तित्व के विभिन्न स्तर उसे जटिल से जटिलतम बनाते जाते हैं। देश-काल के साथ जोड़ कर देखें तो परिवार, संस्कृति, जीवन शैली, आर्थिक स्तर, उसमें समय-समय पर भय, संदेह, प्रतिशोध, लालच, घमंड को उसके मानस का हिस्सा बनाते जाते हैं। अगर व्यक्तित्व के इन तमाम बिंदुओं और स्तरों पर गाहे-बगाहे बात न हो, इसका प्रकटीकरण, परिमार्जन, संशोधन, पुनर्निर्माण न हो, तो एक बीमार और मृत्यु की तरफ अग्रसर व्यक्ति ही दिखेगा और ऐसा समाज भी ऐसा ही होगा।

ऐसी स्थिति में राज्य के लिए व्यवस्था का सकुशल संचालन असंभव हो जाएगा। नौकरशाही हो या राजनीतिक नेतृत्व या फिर सामाजिक चिंतक और कार्यकर्ता- सब विफल होंगे। या कभी कहीं वे भी हमें इस दुरभि संधि में शामिल दिखेंगे। फिर सारे ‘लेबर चौराहे’, सोना गाछी, जीबी रोड और राज्य के आश्रय-स्थल, सब एक ही कहानी कहेंगे। मजबूरी और लाचारी की कहानी। बद से बदतर सामने आएगा।

ऐसा तब होता है, जब व्यक्ति ‘वस्तु’ बन जाता है, अपने निर्णय दूसरों और परिस्थितियों के हवाले कर देता है, जब समाज ‘बाजार’ बन जाता है, जहां जरूरतें ही नहीं, मजबूरियां भी बेची और खरीदी जाती हैं, जब किसी भी तरह की सूचना ही ‘ज्ञान’ बन जाती है, तब समाज, राज्य और इनकी संस्थाएं, इनके पदाधिकारी अपने ही सदस्यों और नागरिकों से सौदा करते हैं। सौदा वही कर पाता है जो कीमत अदा कर पाता है और बिकने वाले इंसान, वे पुरुष हों या स्त्री, निरीह मूक पशुओं की तरह बिक जाते हैं। इन सबके बीच एक संवेदनशील हृदय के साथ वैज्ञानिक विवेक और सक्षम रीढ़ से संपन्न इंसान विलुप्तप्राय हो गया है!

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