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दुनिया मेरे आगे: मन की पगडंडी

कभी लगता है कि कथाओं में जो कृष्ण हमारे आसपास हैं, उनके बारे में जो कहानियां हैं, अगर वे कृष्ण भी यही करते और अपना मन मार कर घर के आंगन में सीमित रहते तो गाय, दूध, मक्खन आदि पर इतना कुछ कहां लिखा जाता!

Author Published on: November 9, 2019 2:54 AM
मन ही है जो निरा सपाट नहीं है, फिर भी उसको समझना काफी आसान है।

पूनम पांडे

मन आमतौर पर मर्जी का मालिक होता है। लेकिन आजकल यह मन बाजार की अंगुलियों पर नाचने वाला जमूरा बन गया है। मन जो चाहता है, वह कर नहीं पाता, क्योंकि मन की चाह को कुछ लोग घूरने लगते हैं। मिसाल के तौर पर अगर मन यह चाहे कि चौराहे पर गोलगप्पे का आनंद लिया जाए तो उसे कुछ मानसिक विचार या परंपरा से मिले संस्कार रोक देते हैं। मसलन, कम से कम दस परिचित चेहरे उसी वक्त सामने से गुजर जा सकते हैं और इस तरह सरेआम पानी-पूरी चटकाते हुए देख कर मजाक बना सकते हैं, अपनी कोई राय या टिप्पणी देकर आपके गोलगप्पे के स्वाद को कड़वा बना दे सकते हैं। इसी तरह आपके पास कार हो, लेकिन आपका मन अगर चाहे कि आज स्थानीय तौर पर चलने वाली बस से बाजार जाया जाए और लोगों के बीच उतर कर सामूहिक होने का सुख लिया जाए, दुकानों पर जाकर जरूरी सामान लाया जाए, तो यहां पर फिर से इस फकीरी ठाठ पर कोई न कोई गांठ लग जाती है और मन मार कर खुद को अपनी कीमती गाड़ी पर सवार होकर अकेले ही बाजार से रूबरू होना पड़ता है।

कभी लगता है कि कथाओं में जो कृष्ण हमारे आसपास हैं, उनके बारे में जो कहानियां हैं, अगर वे कृष्ण भी यही करते और अपना मन मार कर घर के आंगन में सीमित रहते तो गाय, दूध, मक्खन आदि पर इतना कुछ कहां लिखा जाता! बाल लीला पर कुछ भी पढ़ने, सुनने, कहने लायक होता ही नहीं! फिर अगर उन लीलाओं को लिखने वालों ने जमाने का खयाल किया होता और लोक में मौजूद बातों से इतर अपनी कल्पनाशीलता को कलम से दर्ज नहीं किया होता तो ये कहानियां भी हमारे सामने कहां आ पातीं! यह जो आधुनिकता बनाम बाजारवाद का जानलेवा फंदा है, वह हमारी दिनचर्या के सरल सहज शब्दों में इतनी जटिलता पैदा कर रहा है कि हमारी अपनी मानसिक कल्पना को कमजोर ही करता जा रहा है।

पिछले दिनों एक पड़ोसी बालक ने अपने घर पर खिल रहे सुंदर ताजे-ताजे फूलों और पत्तियों से बेहद कलात्मक बंदनवार बना कर सजाए जो सचमुच मनमोहक लग रहे थे। थोड़ी देर बाद वह अपने मित्र के घर गया जहां पर विदेशी फूलों की सजावट की गई थी। यह देख कर वह एकदम सदमे में आ गया। उसके बाद उसे अपने घर के बंदनवार बिल्कुल अच्छे नहीं लगे। उसका मन आहत हो गया था। यही है वह दिखावा जो बाजार पैदा कर रहा है पैसा कमाने के लिए, मगर बीमार हमारा मन हो रहा है।

यह जो मन है, वह बड़ी-बड़ी बातों पर नहीं टूटता, छोटी-छोटी बातों से चटक जाता है, मगर मन की खलबली और उधेड़बुन में मस्त होकर बहने वाले दुनिया में कई लोग ऐसे उदाहरण बन गए जो आज सबके लिए प्रेरणास्रोत हैं। उनको अपने अल्हड़ मन की अपनी भाषा से ऐसी चमक मिली कि उन संकेतों को अपने भीतर मथ-मथ कर वे बुद्धिमान कहलाए। मन की उस भाषा को प्रेमचंद ने सुना और कहानी सम्राट बन गए, मीरा ने सुना और अपने जीवन की तमाम सुविधाएं त्याग कर वृंदावन चली गर्इं। वह मीरा अपने पदों मे आज तक अमर हैं। कलाम ने बस अपने मन की सुनी और ‘मिसाइल मैन’ बने, फिर देश या दुनिया में एक जगह बना ली।

एक बार सोचिए कि दुनिया को बल्ब की रोशनी कैसे मिलती, अगर थामस अल्वा एडीसन अपने मन की मर्जी पर जीवन की अर्जी न लिख देते! जो जैसा चला आ रहा था, वे भी उसी में रमे रहते तो न वे कुछ नया कर पाते, न दुनिया को यह आविष्कार मिला होता। अपने मन की पगडंडी पर चलकर विवेकानंद ने अपनी संस्कृति और सभ्यता की अमिट छाप सारी दुनिया में छोड़ दी। समाज की विकृत यथास्थिति पर उन्होंने जो सवाल उठाए, वे विचार आज मानवता के लिए अनमोल हैं। कबीर के समकालीन ने उनके मन की आजादी को कहां आसानी से स्वीकार किया होगा, लेकिन कबीर अपने मन की सरगम में रमे रहे और आज वे सबके लिए प्रकाश स्तंभ हैं।

वह मन ही है जो निरा सपाट नहीं है, फिर भी उसको समझना काफी आसान है। मन इस उबड़-खाबड़ समाज में इतना कुछ होते हुए भी कहीं किसी सार्थक अर्थ से जोड़े रखता है। मगर कहीं न कहीं आडंबरी जीवन-शैली वाली करवट ने इसको आच्छादित कर लिया है। इसी फेर में हम अपने मन को मारने और दिखावे में जीने के आदी हो गए हैं। यदा-कदा इसको बाजार की पहेलीनुमा अधकचरे घोल से सजी सच्चाई दुविधा में डाल ही देती है। वरना नई पीढ़ी इतनी भटकी हुई नहीं होती। बाजार के षड्यंत्र से भरी बंधी-बंधाई चमकदार चौखट में कसने से बचना जरूरी है। जितनी जल्दी अपने मन के ध्वनि-संसार को समझ लिया जाए, उतना ही उत्तम।

 

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