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दुनिया मेरे आगे: लोरी की डोर

लोरी शिशुओं के लिए केवल नींद की दवा नहीं होती। मानसिक विकास में एक महत्त्वपूर्ण कदम होता है संप्रेषण-भावों और शब्दों दोनों का। संप्रेषण की राह पर लोरी शिशु को सबसे पहले नन्हे डग भरना सिखाती है, जब वह लोरी के शब्दों को खुद तुतलाते हुए दुहराता है।

1977 में छोटे छंद की एक और लोरी बहुत लोकप्रिय हुई। (फोटो सोर्स : Pixabay)

अब अक्सर ऐसा होता है कि नींद पलकों के साथ आंख-मिचौनी खेलती रहे और मन अतीत की गहराइयों में ड़ूब जाए। सूरदास की पंक्तियां याद आती हैं- ‘यशोदा हरी पालने झुलावें, हलरावें दुलराएं, मल्हरावें, जोई सोई कुछ गावें’। फिर लोरियों के संसार में मुस्कराता हुआ अपना शैशव याद आने लगता है, जब मां मीठे स्वर में नींद से अनुनय करती थी- ‘आ जा री आ, निंदिया तू आ, झिलमिल सितारों से उतर, आंखों में आ सपने सजा।’ अमर फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ की यह लोरी नींद से बोझिल पलकों पर लयात्मकता का स्निग्ध चुंबन जड़ देती थी। मां के सान्निध्य को देर तक महसूस करने की लालच में आंखें नींद से विद्रोह करती थीं तो उन्हें हौले से मूंद कर स्वप्नलोक में विचरने के लिए भेज देती थीं उनकी लोरियां। उनकी दूसरी प्रिय लोरी थी उन्ही दिनों की बेहद सफल फिल्म ‘अलबेला’ में लता मंगेश्कर की गाई लोरी ‘धीरे से आ जा री अंखियन में, निंदिया आ जा री आ जा।’ गीतकार राजेंद्र कृष्ण की इस लोरी के छोटे छंद में छोटी-छोटी लहरों-सा शांत बहाव था और बाल मन को रिझाने वाले शरारती भाव भी- ‘तारों से छुप कर तारों से चोरी/ देती है रजनी चंदा को लोरी/ हंसता है चंदा भी निन्दियन में/ निंदिया आ जा री, आ जा।’ ‘निंदियन’ और ‘गलियन’ जैसे छोटे, सरल और मीठे शब्द ही तो लोरी को बड़ों की कविता से अलग एक विशिष्ट पहचान देते हैं। लहर-लहर बहते स्वर, जिनमें अधिक उतार-चढ़ाव न हों। प्रवाह हो, लेकिन आंदोलन न हो, लोरी में सम्मोहन भरते हैं।

आगे चल कर 1977 में छोटे छंद की एक और लोरी बहुत लोकप्रिय हुई। फिल्म ‘मुक्ति’ की आनंद बक्शी रचित इस लोरी के शब्द थे- ‘लल्ला लल्ला लोरी/ दूध की कटोरी/ दूध में बताशा/ मुन्नी करे तमाशा।’ सहज, सरल और संक्षिप्त शब्दों वाली इस लोरी की एक और विशेषता थी कि लता के अतिरिक्त इसे गायक मुकेश ने भी गाया था, जबकि मां की ममता से जुड़ी होने के कारण लोरी आमतौर पर महिला स्वरों में ही पसंद की जाती है। आशा भोंसले ने भी 1950 में ही फिल्म वचन में ‘चंदा मामा दूर के/ पुए पकाएं बूर के/ आप खाएं थाली में/ मुन्ने को दें प्याली में’ गाकर बच्चों को एक खूबसूरत, सदा जवान लोरी की भेंट दी थी।
बच्चों की पकड़ में आसानी से आ सकें, इसलिए लोरी के स्वरों में अधिक उतार-चढ़ाव नहीं होता। वह शांत रस का एक अद्भुत रेशमी जाल बुनती है। शिशु मन उस जाल में फंस कर मछली की तरह तड़पता नहीं, न उससे मुक्त होने का प्रयास करता है। इतना स्निग्ध होता है लोरी का संगीत कि उसके सम्मोहन के जाल से हौले-हौले फिसल कर अनायास ही शिशु नींद के आगोश में चला जाता है। मां अगर शिशु को अपने अंक में बांधती है तो लोरी मां और शिशु दोनों को अपने अंक में भर कर एक कर देती है।

लेकिन लोरी शिशुओं के लिए केवल नींद की दवा नहीं होती। मानसिक विकास में एक महत्त्वपूर्ण कदम होता है संप्रेषण-भावों और शब्दों दोनों का। संप्रेषण की राह पर लोरी शिशु को सबसे पहले नन्हे डग भरना सिखाती है, जब वह लोरी के शब्दों को खुद तुतलाते हुए दुहराता है। लोरी शिशु का परिचय उसकी सांस्कृतिक विरासत से भी कराती है। चंद्रमा को ‘चंदा मामा’ कहना विशुद्ध भारतीय संस्कृति की पहचान है। तभी आमतौर पर हर भारतीय भाषा की लोरी चंदा मामा को दूध का कटोरा लेकर आने को कहती है। फिल्म मिलन की सुमधुर लोरी ‘राम करे ऐसा हो जाए, मेरी निंदिया तोहे मिल जाए’ शिशु के मन में यह उत्सुकता भी जगाती होगी कि यह राम कौन हैं, जिनके किए कुछ भी हो सकता है।

संसार की सभी भाषाओं में लोरियां शिशु का परिचय उसकी सांस्कृतिक विरासत से कराती हैं। अंग्रेजी की प्रसिद्ध क्रिसमस कैरोल ‘साइलेंट नाइट’ लोरी की मिठास और क्रिसमस की भावुक संवेदना में स्वरों को गूंधकर शिशु का परिचय ईसाइयत से कराती है। उसी तरह अपनी सुख-सुविधा से परे जाकर दूसरों के लिए कुछ करने का पावन संदेश इन शब्दों से मिलता है कि ‘मैं गाऊं, तुम सो जाओ, सुख सपनों में खो जाओ।’ लोरी के सरल सहज शब्द छोटे-छोटे टुकड़ों में दोहराए जाकर बालक के खिलंदड़ी मन को एक बिंदु पर केंद्रित करके एकाग्र होना सिखाते हैं।

आज के अत्याधुनिक परिवेश में घर-दफ्तर के कार्यभार और सामाजिक कर्तव्यों से जूझती हुई मां के पास क्या अब भी लोरी सुना कर शिशु को निंदिया की गोद में सौंपने का धीरज बचा है? क्या टीवी और टेबलेट पर कार्टून फिल्में देखते-देखते सो जाने वाले या अपने पालने में अकेले झूलते बच्चे लोरी की मिठास से परिचित हैं? सोचते-सोचते मेरी आंखों की नींद पूरी तरह उड़ जाती है। कभी मुझे मीठी नींद सुलाने वाली लोरी अब शायद स्वयं सो गई है- यह दारुण विचार मुझे झकझोर कर जगा देता है।

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