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दुनिया मेरे आगे: जीवन की राह

छोटी-छोटी गलतफहमियां हमारे जीवन को बाधित कर सकती हैं। इसलिए जीवन को नया आगाज देने के लिए यह जरूरी है कि हम इनसे दूर रहें। यह एक मशहूर पंक्ति है- ‘जिंदगी जिंदादिली का नाम है, मुर्दादिल क्या खाक जिएंगे।’

Author May 16, 2019 1:40 AM
‘जिंदगी जिंदादिली का नाम है, मुर्दादिल क्या खाक जिएंगे।’ (Photo: Thinkstock Images)

साकेत सहाय

जिंदगी जिंदादिली का दूसरा नाम है। जब तक जियो, मस्ती से जियो! अगर आपके साथ किसी का तनाव है तो आज ही उसे सुलझा लीजिए। माफी मांगना और माफ करना, ये समझदार लोगों के काम हैं। उस पर दिन-रात सोचना, अपना नुकसान करना नासमझ लोगों का काम है। हम सभी ने एक कहानी जरूर सुनी होगी। दो बौद्ध भिक्षु कहीं जा रहे थे। उनके गुरु ने उन्हें सिखाया था कि स्त्रियों से दूर रहना। भिक्षुओं के रास्ते में एक छोटी-सी नदी आई, जिसे पार कर दूसरी ओर जाना था। वहां किनारे पर एक युवती खड़ी थी, जिसे तैरना बिल्कुल नहीं आता था। उसने इन भिक्षुओं से कहा कि उसे पानी से डर लगता है और उनसे नदी पार करवाने का अनुरोध किया। उनमें से एक बौद्ध भिक्षु ने मानवता बोध के नाते उसे कंधे पर उठाया और नदी के उस पार छोड़ दिया। उसके साथी को यह कार्य बेहद अटपटा लगा। साथ ही वह इस घटना के बाद बेहद तनाव में आ गया। काफी देर बेचैन रहने के बाद उसने कहा- ‘हमारे गुरुजी ने हमें स्त्रियों से दूर रहने को कहा था, लेकिन आपने तो उस स्त्री को कंधे पर बिठा लिया।’ इस पर पहले भिक्षु ने मुस्कराते हुए कहा- ‘मैंने तो उस युवती को कंधे से उतार कर अलग कर दिया है और तुम अभी भी उसका बोझ अपने दिलो-दिमाग में रखे हुए हो। उस समय उस युवती को मेरी मदद की आवश्यकता थी, मैंने मदद की और बात खत्म हो गई।’ यह बात सुन कर दूसरे भिक्षु को अपनी भूल समझ में आ गई।

हम सब अपने जीवन में अक्सर ऐसी भूल करते हैं। कितनी ही निरर्थक चीजों से दिमाग को भरे रहते हैं। हमारे साथ किसने गलत व्यवहार किया, किसने ढंग से बात नहीं की, सहायता नहीं की जैसी कई तरह की बातों के कड़वे या मीठे अनुभवों से हमने अपने दिमाग को बीमार करके रखा हुआ है। दरअसल, यह हमारी मानवीय समस्या है कि हम जिसे गलत मानते हैं, उसे देखते ही हमारे मन में नकारात्मक भाव उत्पन्न हो जाते हैं। मन कसैला हो जाता है और दिन खराब हो जाता है। फिर भी हम उसे भूलते नहीं, जिससे हम खुद को परेशान करते रहते हैं। आए दिन ऐसी घटनाओं का सामना हम सभी को घर, आॅफिस, बाजार में या दूसरे सार्वजनिक स्थलों पर होता रहता है। इससे हमारा दिमाग ऐसी घटनाओं का कूड़ाघर बनता चला जाता है। ऐसे में अगर हम अपने दिमाग पर इतना बोझ लादेंगे तो आगे कैसे बढ़ेंगे, बड़े कैसे होंगे? यह सोचने की बात है कि अगर गाड़ी में जरूरत से ज्यादा सवारियां हो तो गाड़ी के साथ-साथ सवारियों की हालत कैसी हो जाती है। ऐसे में अगर जीवन में आगे बढ़ना है तो हमें हर दिन फालतू के इस दिमागी बोझ को उतारते चलना है। जब भी हम शाम में दफ्तर से निकलें तो उस दिन के सभी गिले-शिकवे या मतभेदों को वहीं छोड़ दें। अगर किसी से विवाद या मनमुटाव हो भी जाए तो सामने वाले से तुरंत कह देना चाहिए कि आज जो भी हमारे बीच हुआ, उसमें मेरी जो गलती थी, उसके लिए मैं माफी चाहता हूं। उसकी गलती पर वह माफी मांगता है या नहीं, यह उसके सोचने का तरीका है। कम से कम आप अपना बोझ उतारें और आगे बढ़ जाएं। अगर आपसी रिश्तों में भी लड़ाई हो जाए तो उस विवाद को अगले दिन तक मत जाने दें। तुरंत सुलह करके खत्म कर दें। यह तथ्य है कि विकार और विवाद जितना लंबा खिंचेगा, उतनी ही समस्या उत्पन्न करेगा।

हालांकि यह सब करना आसान काम नहीं है, फिर भी कोशिश की जाए तो इसकी खुशी सबसे पहले हमें मिलेगी। कहावत है कि जो छोटी-छोटी बातों का जितना बोझ अपने दिमाग में रखेगा, वह उतना ही ज्यादा समस्याग्रस्त होगा। सफल वही बन सकता है जो भीतर से खुश और संतुष्ट हो। किसी पात्र में अगर पहले से बहुत सारी चीजें भरी हों तो उसमें अमृत के लिए भी जगह नहीं बन सकती। जिंदगी में वाकई कुछ बनना चाहते हैं, जीवन का आनंद लेना चाहते हैं, आगे बढ़ना चाहते हैं, नया मुकाम हासिल करना चाहते हैं तो इसका एकमात्र उपाय है दिमाग में फालतू के बोझ लेना बंद कर देना चाहिए। दिमाग हमारा है, शरीर हमारा है, इसलिए उसकी खुशी के लिए हमें ही प्रयास करने होंगे। इसलिए दिमाग को इन फालतू की चीजों से दूर रखना चाहिए और सभी से संवाद बनाए रखने का प्रयास हो तो इससे बेहतर कुछ नहीं। छोटी-छोटी बातों को दिल पर लगा कर रखने से अच्छा है कि दिमाग को स्वतंत्र रखा जाए। अगर किसी को बोलने में दिक्कत है तो तो एसएमएस या सोशल चैट का इस्तेमाल कर गलतफहमियों को दूर कर लेने की जरूरत है। छोटी-छोटी गलतफहमियां हमारे जीवन को बाधित कर सकती हैं। इसलिए जीवन को नया आगाज देने के लिए यह जरूरी है कि हम इनसे दूर रहें। यह एक मशहूर पंक्ति है- ‘जिंदगी जिंदादिली का नाम है, मुर्दादिल क्या खाक जिएंगे।’

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