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दुनिया मेरे आगे: उम्मीद का जीवन

तेजी से बदलते सामाजिक-आर्थिक परिवेश में विद्यालय और महाविद्यालयों में ऐसे पाठ आमतौर पर कम ही पढ़ाए जाते हैं, जहां वर्तमान और भविष्य के जीवन को अच्छे विचारों के आधार पर खड़ा किया जाए।

Author May 21, 2019 1:20 AM
जब सच परोसा जाता है तो बहुत कम लोगों को उसका स्वाद अच्छा लगता है।

राजेंद्र प्रसाद

आज बहुत सारे लोगों के पास काफी बातों के लिए पर्याप्त समय है, लेकिन अपने व्यक्तित्व को खंगालने, निखारने, संवारने, सुधारने, उस पर विचार करने आदि के लिए उनके पास कोई वक्त नहीं है। कई बार बेबसी होती है, कई बार सांसारिक चक्र में उलझन से सुलझने का भाव पैदा ही नहीं होता। हालांकि संसार में मजबूत व्यक्तित्व के विकास की बहुत आवश्यकता है, लेकिन संकीर्ण सोच, तंगदिली या दुनियादारी के खेल में अत्यधिक रमने के कारण हम इस बात पर विशेष या उतना ध्यान नहीं दे पाते, जितना जिंदगी को सुनहरा बनाने के लिए जरूरी होता है। निश्चित रूप से ऊंचाई पर वे ही पहुंचते हैं जो बदला नहीं, बदलाव लाने की सोच रखते हैं।

तेजी से बदलते सामाजिक-आर्थिक परिवेश में विद्यालय और महाविद्यालयों में ऐसे पाठ आमतौर पर कम ही पढ़ाए जाते हैं, जहां वर्तमान और भविष्य के जीवन को अच्छे विचारों के आधार पर खड़ा किया जाए। हम सब अच्छी संतान तो चाहते हैं, लेकिन उसे तैयार करने के लिए कौन-कैसे बीड़ा उठाएगा, यह प्रश्न निरंतर कुरेदता प्रतीत होता है। आमतौर पर परिवार, शिक्षा, समाज आदि में सभी जगह अच्छे भविष्य की चमक व्यक्तित्व निर्माण की मजबूत आधारशिला के बजाय येन-केन-प्रकारेण धन कमाने की सफलता वाली मनोवृत्ति पर अधिक टिकी हुई है।

समूचे परिवेश पर गहन चिंतन-मनन की डुबकी लगाने पर ऐसा लगता है जैसे हम इंसान तो हैं, लेकिन इंसानियत कहीं खो-सी गई है और उसे ढ़ूंढ़ने की कोशिश अपने अंदर करने के बजाय बाहर और वह भी दूसरों में खोजने की ज्यादा ललक है। यों भी आज के युग में इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि आमतौर पर जीवन के मूल सिद्धांत बने नहीं हैं और कहीं कुछ बने भी हैं तो आपाधापी के जंजाल में वे गायब या गौण हो गए हैं और जीवन का सही रास्ता सीखना, तलाशना, बताना और अपनाना दिन-प्रतिदिन दूभर हो रहा है। निस्संदेह धन की तृष्णा, स्वार्थ के राग, दाव-पेच की लालसा, अहंकार की चेतना, दिल-दिमाग-क्रिया में भिन्नता, अविश्वसनीय वातावरण, सामाजिकता की कमी, ईर्ष्या रोग, प्रशंसा की भूख, जीभ के स्वाद, जुबान की कड़वाहट, संस्कार की गिरावट, चिंतन-मनन का अभाव, संतोष को तिलांजलि आदि चाहे-अनचाहे विकारों ने हमें चारों तरफ से ऐसा जकड़ लिया है कि हमने अब सही को सही पहचानना, सही के लिए सही सोचना लगभग बंद कर दिया है।

जिंदगी की मजेदार बात यह भी है कि हर कोई चाहता है कि मेरी भावना का ध्यान रखा जाए, मुझे न्याय मिले, मेरे साथ दूसरे अच्छा करें, दूसरों से सच जानने को मिले, मैं सुखी रहूं, मुझे कोई धोखा न दे, लोग मुझे पहले नमस्कार करें, मेरी पूछ हो, मेरा सम्मान हो, मुझे दिमाग वाला समझें, मेरी आदतें लोग सही मानें, मेरी सब तारीफ करें आदि। दूसरी तरफ उससे पूछा जाए कि वह ये सब पाने के लिए कितनी जिम्मेदार और सार्थक भूमिका जीवन में निभाता है तो शायद इसका संतोषजनक उत्तर न दे। यह ऐसे दृष्टांत की तरह है, जैसे जीवन में सच की भूख सबको है, लेकिन जब सच परोसा जाता है तो बहुत कम लोगों को उसका स्वाद अच्छा लगता है।

नसीहत केवल आदर्शवाद का प्रकाश नहीं है, बल्कि उसमें व्यावहारिकता, सच्चाई, अनुभव का खजाना, भविष्य का ऐसा महत्त्वपूर्ण दर्शन है, जिससे हम भाईचारा, आस-पड़ोस, मानवता, कर्मशीलता, संवेदनशीलता आदि को ऐसे निरंतर जिंदा रखने का वैचारिक अभ्यास कर सकते हैं, जिससे हमारे अंदर एक अच्छे और नेक इंसान बनने की ज्वाला सुलगती रहे। यह व्यक्ति की विचारधारा पर निर्भर करता है कि वह कितना, क्या और कैसे अपनाता है और कितने अपनेपन से ऐसी बातें पढ़ता-सीखता है, जिसमें जीवन के रहस्य बिना किसी विशेष मेहनत के इस तरह छिपे हुए हैं, जिन्हें थोड़ा-थोड़ा पढ़ने और फिर उन्हें अंगीकार करने से खुद को गौरवान्वित महसूस करेंगे।

आज की दौड़ती-भागती जिंदगी में किसी को गहराई से इन रत्नों को खोजने का वक्त नहीं है और उन्हें अगर सार-संक्षेप में कहीं से कुछ सामग्री मिल जाए तो खुद को धन्य मानना स्वाभाविक है। यह बात आज के संदर्भ में कितनी महत्त्वपूर्ण है- ‘कोई अच्छा इंजीनियर मिले तो बताना, मुझे इंसान को इंसान से जोड़ने वाला पुल बनाना है, बहते आंसुओं को रोकने वाला बांध बनाना है और सच्चे संबंधों में पड़ती दरारों को भरवाना है!’ बहुत मुश्किल नहीं है जिंदगी की सच्चाई समझना। जिस तराजू पर दूसरों को तौलते हैं, उस पर कभी खुद भी बैठ कर देखना चाहिए। यानी अगर इंसान के अंदर इंसानियत नहीं है तो उसकी जीवनरूपी नदी की धारा कैसे बहेगी, यह सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। इंसान ख्वाहिशों से बंधा एक ऐसा परिंदा है जो उम्मीदों से घायल है, पर उम्मीदों पर ही जिंदा है। लोग भूल जाते हैं कि कर्म एक ऐसी रसोई है जहां हमें वही मिलेगा जो हमने पकाया है।

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