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दुनिया मेरे आगे: झूठ और बहाना

सभी जानते हैं कि मूंछ कटाना कोई खेल नहीं है। कल वे घंटे भर तक इधर-उधर की बातें करते रहे।

Author Published on: October 4, 2019 2:46 AM
देखने में सवाल छोटा-सा है, पर अपनी सच्चाई में वह हमारे जीवन की हर धड़कन में समाया है।

रमाशंकर श्रीवास्तव

रात में नाटक देख कर लौटे तो दोस्तों के साथ नाटक के पात्रों पर टीका-टिप्पणी होने लगी। एक ने कहा कि जो साधू बना था उसकी दाढ़ी सही नहीं लग रही थी। एक पात्र के मुंह पर पाउडर सही तरीके से नहीं पुता था। चर्चा चलते-चलते एक दोस्त ने कहा कि यार, नाटक तो पूरी जिंदगी में है, उस पर मुलम्मे के लिए झूठ और बहानेबाजी की जरूरत होती है। विचार करके देखिए तो दोस्त की इस बात में सच्चाई है। जन्म लेते ही बालक रोने लगता है, उसकी रुलाई दूध मांग रही है। रुलाई दूध पीने का बहाना बन कर आती है। देखने में सवाल छोटा-सा है, पर अपनी सच्चाई में वह हमारे जीवन की हर धड़कन में समाया है।

दरअसल, झूठ और बहाने में थोड़ा ही अंतर होता है। जीवन में हमें इन दोनों का अक्सर इस्तेमाल करना पड़ता है। दोनों के आगे मन शंकालु रहता है। विश्वास होता नहीं। झूठ अनेक शंकाओं को जन्म देता है। झूठ को सच जैसा दिखने के लिए बड़ी मेहनत करनी पड़ती है। लेकिन बहाने का आधार थोड़ा मजबूत होता है। उसको शब्दों से सजाना पड़ता है। जिसने जितना सजा लिया, उसका बहाना उतना ही विश्वसनीय लगता है। इन्हीं बातों में नाटकबाजी की भूमिका होती है। नाटक से जीवन का कोई काम नहीं संपन्न होता।

दो पुराने मित्र बाजार में मिल गए। दोनों खुश। मित्र ने पूछा- ‘तुम कैसे हो’ तो जवाब था- ‘मैं बिल्कुल ठीक हूं। तुम अपना बताओ।’ मुंह से ‘बिल्कुल ठीक’ होने की बात निकल गई, मगर सच क्या है, वे ही जानते होंगे। वास्तविक मन:स्थिति में बोलना होता है कुछ, और बोल जाते हैं कुछ और। मित्र को अपने हाल के बारे में ‘बिल्कुल ठीक’ कहने के बाद किसी दुकानदार से बेबात ही झगड़ा कर बैठ सकते हैं। लोगों के साथ व्यवहार को कितना भी नियंत्रित कर लिया जाए, भीतरी मन:स्थिति का असर किसी न किसी रूप में पड़ ही जाता है। अगर भीतर से खुश हैं तो वह भी नहीं छिपेगा और दुखी, गुस्सा या परेशान हैं तो वह भी झलक जाएगा।

समाज में ऐसे कई मिलेंगे जिनकी बातों पर एकबारगी विश्वास नहीं होता। पिछले महीने एक सज्जन ने गंभीरता से कहा कि अब देखिए, इस देश का क्या होता है! अमेरिका तो भारत के खिलाफ हो गया है। सुनने वाले को शंका होती है कि यह आदमी झूठा प्रचार कर रहा है। बड़ा नाटकबाज है। दरअसल, पूरी दुनिया ही बहानों के पीछे पड़ी है। कहती कुछ है और करती कुछ। कल जो कहा था, आज भूल गए। पिछले दिनों का बोला संवाद दस रोज बाद तक याद कहां रहता है! वह संवाद झूठ की लहर बन कर आया था और गया। अपनी बात सुनाने के पहले शब्दों पर विचार कर लेना चाहिए, ऐसा समझदार लोगों का कहना है। हम हर बार संकल्प लेते हैं कि अब जो बोलेंगे, सोच-समझ कर बोलेंगे। लेकिन मौका पड़ने पर भूल जाते हैं।

नाटक में संवाद भूल जाना आम बात है। वैसे ही जिंदगी में जगह-जगह हमें एक ऐसे व्यक्ति की जरूरत पड़ती है जो हम पर अंकुश रखे। बहकने पर टोक दे। नहीं तो आवेश में हम क्या से क्या बोल जाते हैं। यह सच है कि आवेश में बोली बात भूलते देर नहीं लगती। नाटक तो नाटक है, कितना याद रखेंगे! उसी तरह ठीक से जीने के लिए बहुत-सी बातें भूलनी पड़ती हैं। कल पड़ोसी ने चुनौती दी कि उनकी बात अगर झूठ निकली तो वे अपनी मूंछ कटा लेंगे। बात झूठ निकली, मगर उन्होंने मूंछ नहीं कटाई। अब कौन याद दिलाए कि मूंछ कटा लो। सभी जानते हैं कि मूंछ कटाना कोई खेल नहीं है। कल वे घंटे भर तक इधर-उधर की बातें करते रहे। आज पूछा तो बोले, भूलो यार उन बातों को। बीती बातों में उलझ कर जिंदगी चौपट मत करो।

इसीलिए लगता है कि नाटक करने के लिए तरह-तरह के संवाद जरूरी हैं, लेकिन सारे संवाद हमेशा याद रखे जाएं, यह जरूरी नहीं। घर-परिवार, मित्र मंडली, भाई-रिश्तेदार- सब जगह झूठ और बहानों का विस्तार है। जो सीधे सच्चे हैं और झूठ-सच में नहीं पड़ते, वे हर जगह फंस जाते हैं, क्योंकि बचाव के लिए जिस नाट्यकला की जरूरत है, वह उनमें नहीं होती है। सिनेमा या धारावाहिक नाटकों में जीवन के अनेक नाटक देखे जा जाते हैं।

झूठ-सच बोलना पड़ता है। आप जानते हैं कि आप जो झेल रहे हैं, जो कर रहे हैं, वह सभी सच नहीं है। लेकिन आप इस सच्चाई को सीधे बना कर नहीं करते। झूठ भी तभी असरदार होता है, जब उसे सच बना कर कहा जाए। शब्दों का प्रयोग और हावभाव सभी में थोड़ा परिवर्तन चाहिए। जीने के लिए सांस लेना जरूरी है, उसी तरह कुछ लोग अपने अस्तित्व के लिए झूठ और बहानेबाजी को जरूरी मानते हैं। लेकिन यह सवाल बना हुआ है कि वह झूठ या बहाना कितने पैमाने का हो कि किसी अन्य को उससे कोई भी नुकसान न हो!

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