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दुनिया मेरे आगे: बोली की मार

भाषा में गिरावट का एक प्रमुख कारण है हाल के दिनों में किताब पढ़ने की संस्कृति में लगातार गिरावट। जब ज्ञान का स्रोत मानक किताबें न हो कर सोशल मीडिया के हल्के-फुल्के के संवाद हो जाएं तो वाद-विवाद की संस्कृति का पतन तो अवश्यंभावी है।

कोई भी राजनीतिक दल इससे अछूता नहीं है।

ललित कुमार

बचपन में हमें सिखाया गया था कि वाणी का एक पर्यायवाची शब्द ‘सरस्वती’ भी होता है। वैसे तो भारतीय संस्कृति की हिंदू परंपरा में किसी भी काम की शुरुआत ‘गणेश’ का नाम ले कर करने की परंपरा रही है। तुलसीदास अपने ग्रंथ ‘रामचरितमानस’ के आरंभ में वाणी यानी सरस्वती की आराधना गणेश से भी पहले करते हैं। इस काव्य के पहले श्लोक में तुलसीदास लिखते हैं- ‘वंदे वाणीविनायकौ’, यानी मैं सरस्वती और गणेश की वंदना करता हूं। भाषा और सरस्वती का यह विनिमेय न केवल भारतीय संस्कृति में भाषा की महत्ता को रेखांकित करता है, बल्कि आज के चुनावी दौर में काफी प्रासंगिक है। यह छिपा नहीं है कि भाषा का स्तर चुनावी सरगर्मी के बीच गिरता जा रहा है और कोई भी राजनीतिक दल इससे अछूता नहीं है।

जिस देश में आज से पांच सौ साल पहले से ही ऐसे ग्रंथों की रचना होती आई है, सामान्य व्यवहार में अक्सर ‘मीठी वाणी’ को बहुत महत्त्व दिया गया है, बोलने के लहजे को बेहतर या कमतर मनुष्य होने का रूपक माना गया, अक्सर दुश्मनों और नकारात्मक प्रवृत्ति वाले लोगों के लिए भी सम्मानपूर्ण भाषा का इस्तेमाल किया जाता रहा हो, उसी देश के सार्वजनिक जीवन में भाषा का गिरता स्तर आखिरकार क्या दर्शाता है! ब्रिटिश लेखक जॉर्ज आॅरवेल ने अपने प्रसिद्ध आलेख ‘पॉलिटिक्स एंड द इंग्लिश लैंग्वेज’ (1946) में कहा था कि अंग्रेजी भाषा के गिरते स्तर का सीधा संबंध राजनीतिक और सामाजिक मूल्यों में गिरावट से है।
ऐसा लगता है कि हमारे राजनेताओं और बुद्धिजीवियों की नजर में इस तरह की बातों का कोई मूल्य नहीं है।

क्या हम कभी इस पर विचार करते हैं कि अपने विरोधियों के लिए जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल अखबारों में, समाचार चैनलों पर और सोशल मीडिया में किया जाता है, उसका समाज पर और खास कर बच्चों पर क्या दुष्परिणाम होगा? क्या अपने विरोधियों को धराशायी कर किसी भी कीमत पर सत्ता हासिल करना ही राजनीति का एक मात्र लक्ष्य रह गया है? क्या हमारे यहां लोकतंत्र की परंपरा अब यह नया मानक रचेगी कि हमारे भीतर की लोकतांत्रिक भावनाएं और विचार को खत्म होना होगा? क्या हम सभ्यता के उस दौर में कदम रखने जा रहे हैं जहां अपने से भिन्न मत रखने वाले और कमजोर तबकों के लोगों के अधिकारों के लिए कोई जगह नहीं होगी? ब्रिटिश पत्रकार और उपन्यासकार रॉबर्ट हैरिस के ऐतिहासिक उपन्यास ‘डिक्टेटर’ में प्राचीन रोम के प्रसिद्ध राजनेता और कुशल वक्ता सिसरो का कहना है कि राजनेता का प्रमुख लक्ष्य अपने देश की खुशी होनी चाहिए, न कि यश हासिल करने की लालसा। लेकिन जब किसी भी कीमत पर सत्ता, वैभव और धन पहली प्राथमिकता बन जाए तो भाषा और नैतिकता दोनों का पतन आश्चर्य की बात नहीं।

आज के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में भाषा के गिरते हुए स्तर को देखते हुए दिनकर की ‘रश्मिरथी’ से ये पंक्तियां बरबस याद आती हैं। इन पंक्तियों में कर्ण कृष्ण से कहते हैं- ‘वृथा है पूछना, था दोष किसका/ खुला पहले गरल का कोष किसका/ जहर अब तो सभी का खुल रहा है/ हलाहल से हलाहल धुल रहा है।’ जिस तरह से महाभारत के युद्ध में धर्म का उल्लंघन दोनों तरफ से हुआ था, ठीक उसी प्रकार किसी एक राजनेता या दल को भाषा के गिरावट के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। न जाने भाषा के स्तर पर हलाहल से हलाहल धोने की प्रवृत्ति भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में कब और कैसे आ गई और कब तक रहेगी? प्रश्न यह उठता है कि इस नैतिक पतन के परिणाम कितने दूरगामी होंगे?

आॅरवेल ने यह भी कहा था कि अगर हमारे विचार हमारी भाषा को भ्रष्ट कर सकते हैं तो हमारी भाषा भी हमारे विचारों को भ्रष्ट कर सकती है। अपरिष्कृत विचार अपरिष्कृत भाषा की जननी है या इसके विपरीत अनैतिक भाषा अनैतिक विचार को जन्म देती है। यह एक विचारणीय प्रश्न हो सकता है। लेकिन इस बात पर कोई दो मत नहीं हो सकता कि हमें अपने विरोधियों का भी सम्मान करना चाहिए। सुभाषचंद्र बोस और महात्मा गांधी में वैचारिक मतभेद थे, लेकिन दोनों ही एक दूसरे का सम्मान करते थे।

भाषा में गिरावट का एक प्रमुख कारण है हाल के दिनों में किताब पढ़ने की संस्कृति में लगातार गिरावट। जब ज्ञान का स्रोत मानक किताबें न हो कर सोशल मीडिया के हल्के-फुल्के के संवाद हो जाएं तो वाद-विवाद की संस्कृति का पतन तो अवश्यंभावी है। किताबें हमें नैतिकता का मूल्य पढ़ाती हैं, संवेदनशील बनाती हैं और अपने विरोधियों का भी सम्मान करना सिखाती है। लेकिन वर्तमान समय में जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल हम अपने विरोधियों के लिए करते हैं, वह भविष्य में हमारे लिए कहीं शर्मिंदगी का सबब न बन जाए। बशीर बद्र के शब्दों में- ‘दुश्मनी जमकर करो पर ये गुंजाइश रहे/ जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।’

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