ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे: भाषा का जीवन

हिंदी हमारी भाषा है। यही एक भाषा है जो हम सबको एक दूसरे से जोड़ने में सक्षम है।

Author Published on: November 15, 2019 3:07 AM
हिंदी के साथ समस्या यह है कि देश से जोड़ कर देखे जाने के क्रम में इसके लिए एक विशेष दिवस तय किया गया।

भाषा किसी भी समाज का जीवन होती है। वह जितनी समृद्ध होती है, भावों और विचारों की अभिव्यक्ति और उसका प्रवाह उतना सहज होता है। अलग-अलग देश नहीं, बल्कि हर कुछ दूर पर भाषा या उसके स्वरूप में फर्क यह बताने के लिए काफी है कि समय-समय पर भिन्न समुदायों ने अपनी अभिव्यक्ति के लिए अपनी मौजूदा भाषा को समृद्ध किया है, उसे परिष्कृत किया है या फिर किसी अलग भाषा को अपने संवाद का जरिया बनाया है। भारत ऐसा देश है, जिसे किसी एक भाषा से नहीं बांध सकते, फिर भी एक बड़े इलाके की सामान्य भाषा होने के नाते हिंदी के लिए खास जगह तो है ही।

अब इसे देश और भावनाओं से जोड़ कर देखा जाने लगा है तो यह बहुत अस्वाभाविक नहीं है। लेकिन यह ध्यान रखने की जरूरत है कि देश में बहुत सारी अन्य भाषाएं हैं और वे भी देश के लिए ताकत का ही काम करती हैं। हिंदी के साथ समस्या यह है कि देश से जोड़ कर देखे जाने के क्रम में इसके लिए एक विशेष दिवस तय किया गया और आमतौर पर हर साल ‘हिंदी दिवस’ के रूप में हम सब इससे गुजरते हैं। इस दिन हिंदी की समृद्धि के लिए खूब गुण गाए जाते हैं, संकल्प लिया जाता है। लेकिन इसके बाद पूरे साल हिंदी कहां और किस हाल में रहती है, इससे शायद ही किसी को मतलब होता है।

दरअसल, अमूमन जो बात हमारे जीवन में या तो न के बराबर होती है या लुप्त होती जा रही होती है, उसे अपने को याद दिलाते रहने के लिए लोग एक ‘डे’ यानी ‘दिवस’ मुकर्रर कर लेते हैं। थोड़ा स्पष्ट कहें तो ज्यादातर समाजों में जिन-जिन की अहमियत घटती जाती है, उन सबका ‘दिवस’ मनाया जाने लगता है। मसलन, ‘मदर्स डे’, ‘फादर्स डे’, ‘टीचर्स डे’, ‘वर्कर्स डे’, ‘वीमेंस डे’ आदि। शायद उसी भावना के चलते ‘हिंदी दिवस’ मानाने की प्रथा भी चल पड़ी हो। लेकिन हिंदी तो जीवित है, रोजाना की भाषा है और शोर यह है कि दुनिया की तीसरी सबसे ज्यादा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा है। हमारे देश में सबसे ज्यादा लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है। यह सब है। लेकिन तब ये ‘दिवस’ या ‘डे’ की जरूरत क्यों? इन बातों में उलझने के बजाय हिंदी की दशा और दिशा पर गौर किया जा सकता है।

टीवी में आजकल एंकर या प्रस्तोता बनने के लिए परदे पर किसी अदाकार की तरह स्टाइल से बात करने और अपने आप को पेश करने करने की योग्यता जरूरी लगती है। भाषायी और दिमागी सक्षमता की इसमें कोई आवश्यकता नजर नहीं आती। इसलिए आप देखेंगे कि मराठी शब्द ‘ताबडतोब’ को टीवी एंकरों ने ‘ताबड़तोड़’ करके अपनी हिंदी में जगह दे दी है। बात-बात में ‘कुल मिला कर’ तकिया कलाम की तरह हो चुका है और उर्दू का शब्द ‘खुलासा’, जिसका लफ्जी मतलब ‘जिस्ट’ होता है, वह ‘एक्सपोजे’ की तरह इस्तेमाल में तबियत से लाया जा रहा है।

फिल्मों में ‘आप जाएंगे’ की जगह ‘आप जाओगे’, ‘कहिए क्या बात है’ की जगह ‘कहें क्या बात है’ का चलन आम है। फिल्मों के दर्शकों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। उर्दू गजल में अगर बहर, रदीफ, काफिया, वजन का व्यापार है तो हिंदी कविता में भी छंद मीटर, लय आदि का अपना खुसूसी व्याकरण है। हिंदी में कविता के नाम पर ज्यादातर अतुकांत लिखा जा रहा है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि उसमें सार नहीं है। छंदों में जो गीत लिखे जा रहे हैं, वे ज्यादातर कवि सम्मेलनों में तरन्नुम से वाहवाही लूटने वाली प्रवृत्ति से ताल्लुक रखते हैं।

कुछ दिनों से फिल्मों में कुछ नए और उदार या ‘लिबरल’ शब्द चल पड़े हैं, मसलन, ‘बैंड बज गई’ और इसी भाव के कुछ दूसरे शब्द, जिनके अर्थ निश्चित ही असुविधाजनक हैं, लेकिन उनका प्रयोग आम होता जा रहा है। चूंकि ऐसे शब्दों को बोलते हुए लोकप्रिय सितारों को दिखाया जाता है, इसलिए ये शब्द आम लोगों में भी सामान्य हो चुके हैं। एक जमाना गुजरा, जब हिंदी वाले अपने ‘अंक’ तो अंग्रेजी में तब्दील कर ही चुके हैं और हिंदी अब आमतौर पर विज्ञापन बेचने की भाषा हो गई है, जिसकी लिपि ज्यादातर अंग्रेजी है।

इसमें कोई शक नहीं कि हिंदी बढ़ रही है। हिंदी हमारी भाषा है। यही एक भाषा है जो हम सबको एक दूसरे से जोड़ने में सक्षम है, लेकिन इसके स्तर, मूल्य और प्रारूप पर जो प्रहार हो रहा है, उसे भी पहचानने की जरूरत है। चूंकि हिंदी एक बीमार स्थिति में पहुंच गई है और अंग्रेजी के मुकाबले फैशन में नहीं रही है, शायद यही वजह है कि इसके लिए एक दिवस मुकर्रर करके निबट जाने का नाम हिंदी दिवस रख दिया गया है। हिंदी अगर हमारी भाषा और संस्कृति है तो हमें इस पर गर्व भी होना चाहिए और इसके गिरते स्तर को फिर से उठाने का प्रयास भी करना चाहिए।

अशोक कुमार

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 दुनिया मेरे आगे: हवा में जहर
2 दुनिया मेरे आगे: कहां गए किस्से
3 दुनिया मेरे आगे: पैदल से पैदल तक
जस्‍ट नाउ
X