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दुनिया मेरे आगे: किसान का दुख

कुछ समय पहले कर्ज से दबे किसान के पेड़ से लटक कर खुदकुशी कर लेने की एक खबर ने मन को बहुत परेशान करके रख दिया। पता चला कि महज दो बीघा जमीन के मालिकाना वाले किसान ने एक बैंक से पचास हजार रुपए का कर्ज लिया था।

Author Published on: November 8, 2019 2:46 AM
भारत के किसान आज इक्कीसवीं सदी में भी कृषि के लिए प्रकृति पर निर्भर हैं।

कुंदन कुमार

कभी-कभी सुबह पढ़ी एक सकारात्मक खबर दिनभर शरीर को स्फूर्त और मन को तरोताजा बनाए रखती है, वहीं बुरी खबर पर नजर पड़ने पर सारा दिन मन व्यथित और उदास रहता है। किसी भी खबर की पृष्ठभूमि में एक खास तरह का मनोविज्ञान होता है और समूची प्रक्रिया में इसका ध्यान रखा जाता है। इसलिए अब कई जगहों पर नकारात्मक खबरें पहले पन्ने पर छापने से बचने की कोशिश की जाती है। हालांकि यह अपने आप में सोचने की बात है कि अगर सच किन्हीं हालात में नकारात्मक प्रभाव पैदा करता है तो उससे लोगों को दूर रखने का हासिल क्या होगा! यों नकारात्मक खबर और सामाजिक जीवन से सरोकार रखने वाली खबरों में बड़ा अंतर होता है। नकारात्मक बातें जहां समाज में नकारात्मक ऊर्जा का विस्तार करती हैं, वहीं सामाजिक सरोकार से जुड़े ब्योरे समस्याओं पर सरकार और समाज को सतर्क करते हुए पाठक के मन-मस्तिष्क पर सकारात्मक छाप छोड़ते हैं। सामाजिक समस्याओं का गहन अध्ययन करके ही सरकार समाधान के लिए नीतियां बनाती है, जिसमें समाचार-माध्यमों की भूमिका अति महत्त्वपूर्ण होती है। एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते इन सब पर हमारी नजर रहती है, क्योंकि ये हमें संवेदनशील बनाते हैं और आशा करते हैं कि सामाजिक समस्याओं के समाधान की दिशा में हमारी सहभागिता बढ़े।

कुछ समय पहले कर्ज से दबे किसान के पेड़ से लटक कर खुदकुशी कर लेने की एक खबर ने मन को बहुत परेशान करके रख दिया। पता चला कि महज दो बीघा जमीन के मालिकाना वाले किसान ने एक बैंक से पचास हजार रुपए का कर्ज लिया था। इसके अलावा भी उस पर अन्य लोगों के कर्ज थे। इसे लेकर वह तनाव में रहने लगा और आखिरकार जब कर्ज का बोझ उससे सहा नहीं गया तो उसने पेड़ से लटक कर आत्महत्या कर ली! इस घटना के थोड़े दिनों बाद इसी तरह का एक और वाकया सामने आया जिसमें कर्ज के बोझ से दबे एक अन्य किसान ने फांसी लगा कर जान दे दी। किसानों की आत्महत्या से संबंधित खबरें अक्सर आती रहती हैं। देश का शायद ही कोई ऐसा राज्य है, जहां किसान सरकारी तंत्र से हार कर लाचारी में आत्महत्या करने पर मजबूर नहीं हुआ हो। इन घटनाओं के बारे में जानने के बाद मन में यह सवाल बार-बार आता रहा कि आखिर किसान आत्महत्या करने को मजबूर क्यों हो जाते हैं? इसकी क्या वजह हो सकती है कि सबका पेट भरने वाला ‘अन्नदाता’ खुद दो जून की रोटी के लिए तरसता रहता है?

इसी तरह की जद्दोजहद से गुजरने के इन्हीं दिनों में सोशल मीडिया पर एक बुजुर्ग किसान का वीडियो काफी प्रसारित हुआ, जिसमें वह फूट-फूट कर रोते हुए एक पत्रकार को अपना दर्द सुना रहा था। वीडियो में वह बाढ़ के कारण फसल डूबने की बात कह रहा था कि ‘मेरी फसल डूब गई! मेरी चार-चार बेटियां हैं! उनकी शादी के लिए पैसे नहीं हैं! अब उनकी शादी कैसे होगी?’ व्यथित किसान के ये शब्द किस संवेदनशील मन को नहीं झकझोर देंगे? जहां यह यह गीत आए दिन आज भी सुनने को मिलता है कि ‘मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती…’, वहां के किसान आज हाशिये पर और उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। लेकिन किसानों की सुध लेने की फुर्सत किसी के पास नहीं है! सरकारी व्यवस्था के साथ-साथ प्रकृति भी कई बार किसानों के साथ अन्याय करती है। कभी बाढ़ या सूखे के तांडव से किसानों के सपने मार देती है, तो कभी सरकारी तंत्र का उपेक्षित रवैया किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर कर देता है।

भारत के किसान आज इक्कीसवीं सदी में भी कृषि के लिए प्रकृति पर निर्भर हैं। कृषि के क्षेत्र में अत्याधुनिक तकनीक विकसित हो जाने के बाद भी अधिकतर किसानों के सामने फसलों की सिंचाई के लिए वर्षा जल की आस पर ही टिके रहने की लाचारी होती है। हम कोई ऐसी तकनीक विकसित कर पाने में असमर्थ रहे हैं जो बाढ़ से हमारी फसलों की रक्षा कर सके या सूखे में सिंचाई का अभाव न हो। किसानों को उनकी फसल का उचित दाम तक नहीं मिल पाता है। अगर वे सरकारी गोदाम में अपना अनाज बेचते हैं, तो उन्हें अपनी मेहनत की कमाई के लिए भी दफ्तरों का चक्कर लगाना पड़ता है। गनीमत यही है कि लाख मुश्किलों का सामना करते हुए भी कृषकों ने कृषि कार्य नहीं छोड़ा है। अगर अपनी त्रासदी से हार कर कभी अन्नदाताओं ने अन्न उपजाना छोड़ दिया तो उस दिन बड़े-बड़े उद्योगपतियों और राजनेताओं समेत सबको दो जून की रोटी भी मयस्सर नहीं हो पाएगी!

इसलिए हमारी समूची व्यवस्था को किसानों की समस्या पर गंभीरता से विचार करना होगा। ऐसी कृषि-नीति बनानी होगी, जिससे कृषि सिर्फ ‘जीवन निर्वाह’ से रोजगार सृजन करने वाले पेशे में परिवर्तित हो जाए। खेती और किसानों की दयनीय स्थिति देख कर ही युवा आज इससे मुंह फेर रहे हैं। नहीं भूलना चाहिए कि किसान इस देश के गौरव हैं।

 

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