ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे: मुक्ति का सफर

उनकी स्वच्छंद हंसी, शरारतें और चंचल निगाहें मुझे लगातार उधर ही देखने को विवश कर रही थीं।

Author Published on: September 10, 2019 5:15 AM
सांकेतिक तस्वीर।

कविता भाटिया

पिछले दिनों पारिवारिक आयोजन के दौरान मेरा एक रेस्तरां में जाने का संयोग बना। उस दौरान मैंने बदलती हुई एक नई सामाजिक प्रवृत्ति को देखा। लगभग आठ-दस महिलाएं जिनकी उम्र पचास से सत्तर वर्ष के बीच रही होगी, वे रेस्तरां के कोने में बड़ी टेबल पर आपस में मिल-जुल कर खा-पी रही थीं, बतिया रही थीं और बीच-बीच में उन्मुक्त ठहाके भी लगा रही थीं। उनकी स्वच्छंद हंसी, शरारतें और चंचल निगाहें मुझे लगातार उधर ही देखने को विवश कर रही थीं। भरवां गोलगप्पे, पावभाजी और पिज्जा के स्वाद को मैं उनकी आंखों की चमक से महसूस कर रही थी। बच्चों, पति और घर-गृहस्थी के दायित्वों से मुक्त दिख रही वे स्त्रियां मुझे स्त्री-मुक्ति का जश्न मनाती लगीं।

आयु की वजह से शारीरिक रूप से भले ही वे अपेक्षाकृत कुछ कमजोर हो गई थीं, पर ‘अभी तो मैं जवान हूं’ की तर्ज पर वे इठला रही थीं। शायद पितृसत्तात्मक समाज से अब तक मिली अवमानना और उससे उपजी निराशा, अवसाद और घुटन को कम से कम उस समय दरकिनार कर ये आत्मविश्वासी स्त्रियां बेखौफ और बेबाक दिख रही थीं। अपनी सोच और आकांक्षाओं के अनुरूप जीने की कोशिश करतीं इसी सामाजिक व्यवस्था में अपने लिए छोटे-छोटे सुख तलाशने की यात्रा करतीं इन स्त्रियों को देखना मेरे लिए थोड़ा खास अनुभव था, लेकिन मुझे यह सब देख बहुत भला लग रहा था। इसके बाद अलग-अलग दो अन्य अवसरों पर फिर ऐसे ही दृश्य देखने को मिले और फिर मेरे मनोमस्तिष्क में कुछ पुरानी-नई तस्वीरों से जुड़ी बातें दस्तक देने लगीं।

याद आने लगा कि पहले मोहल्ले में स्त्रियां घर के कामकाज से निवृत्त होकर दोपहर से पहले या शाम को पति के आने से पूर्व अपने समूह में स्वेटर बुनतीं, पापड़-बड़ियां बनातीं, अपनी-अपनी बालकनी में सूखे कपड़े उतारतीं या फिर अन्य कामों के साथ-साथ आत्मसंतोष के लिए परस्पर अपने निजी सुख-दुख को साझा किया करती थीं। इस क्रम में केवल सुख-दुख का साझापन ही नहीं, बल्कि एक-दूसरे को दी जाने वाली सीख और नसीहतें भी शामिल रहती थीं। समय बदलने के साथ-साथ बालकनियां सिमटने और मिटने लगीं।

सोसाइटी फ्लैटों के चलन ने स्त्रियों को घर के भीतर समेट दिया। टेलीविजन की दुनिया उनकी दुनिया बनने लगी। सास-बहू के धारावाहिकों ने उनकी दुनिया में अपनी जगह बनाई। आज के अति आधुनिक कहे जाने वाले समय में स्मार्टफोन के चलन ने अन्य समूहों की तरह स्त्रियों को भी चारदिवारी से मुक्त कर एक तरह की उन्मुक्तता दी है। वे सोशल मीडिया का हिस्सा बन कर आज वहां अपने सुख-दुख, परेशानियों और दिक्कतों को बिना झिझक और दुराव-छिपाव के साझा कर रही हैं। इसके अलावा, मर्दवादी सोच को चुनौती देते हुए सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर भी बेबाकी से अपनी राय रख रही हैं।

इस सबसे जहां उनमें निजता का भाव प्रबल हुआ है, वहीं आत्मविश्वास में भी वृद्धि हुई है। माना जा रहा है कि इस तरह एक नई किस्म का ‘साइबर स्त्रीवाद’ तैयार हो रहा है। यह मुक्ति वैयक्तिक ऊर्जा और संघर्ष के सहारे अपने ‘स्पेस’ की खोज है। सन 1792 में मेरी वोल्सटन क्राफ्ट ने अपनी पुस्तक ‘विंडिकेशन आॅफ द राइट्स आॅफ वीमेन’ में स्त्री समाज के अधिकारों और जीवन निर्वाह के क्षेत्र में उनके अपने स्वतंत्र निर्णय लेने के विषय के बारे में विचार प्रतिपादित किए थे। स्त्री मुक्ति का अर्थ पुरुष हो जाना कतई नहीं है। पुरुषों की तरह सिगरेट, शराब के कश लगाना, क्लब और पब संस्कृति को अपनाना और अपनी देह का कामुक प्रदर्शन कर केवल यौन उच्छृंखलता का परिचय देना भी स्त्री मुक्ति नहीं। बल्कि समाज द्वारा बनाए गए स्त्रीत्व के बंधनों से मुक्ति के साथ मनुष्यत्व की दिशा में कदम बढ़ाना ही सही अर्थों में ‘स्त्री स्वतंत्रता’ है।

यह मुक्ति की लड़ाई समानता की है, अपने अधिकारों की प्राप्ति की है। जिस समाज में अपने घरेलू जीवन और दायित्वों को निभातीं, अपने परिश्रम को ही पारिश्रमिक मानते हुए स्त्रियां जीवन जीती हैं, वहीं थेरी गाथाओं में पूर्णिमा और सुमंगला की स्त्री स्वतंत्रता की कविताओं में स्त्री का शुरुआती क्रांतिकारी रूप देखा जा सकता है, जहां कष्टमय घरेलू जीवन और पति की अवहेलना झेलती स्त्री मुक्त होकर अपने आनंद को ‘अहो! मैं मुक्त नारी! मेरी मुक्ति कितनी धन्य है…’ कह कर व्यक्त करती हैं।

महादेवी वर्मा के ‘कीर का प्रिय! आज पिंजर खोल दो…’ के स्त्रीवादी विद्रोह से आगे बढ़ते हुए आधुनिक कवयित्री स्नेहमयी चौधरी की कविता- ‘उन्मुक्त हूं देखो/ और यह आसमान…’ से मृदुला गर्ग की ‘हरी बिंदी’ कहानी की नायिका आधुनिक नारी का प्रतिनिधित्व करती अपने विद्रोह को ही दर्शाती है। पुरातन सामाजिक परंपराओं और रूढ़ हो चुकी मान्यताओं को ठेंगा दिखातीं ये महिलाएं दरअसल स्त्री मुक्ति की राही हैं। यह मुक्ति की मशाल महानगरों के ऊंचे भवनों से आगे निकल कर सुदूर प्रांतों के गांवों के छोटे घरों में रहने वाली स्त्रियों तक ले जाने की आवश्यकता है, तभी ‘मुक्ति’ की यह अवधारणा सार्थक होगी।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 दुनिया मेरे आगे: कहने का कौशल
2 दुनिया मेरे आगे: चंदा मामा के घर
3 दुनिया मेरे आगे: गिद्धों का खत्म होना