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आपका परिचय

धर्म हम तय नहीं करते। मां के गर्भ में ही इसका निर्धारण हो जाता है कि हम समाज के किस तबके में आएंगे और हमारे परिचय का आवरण किस जाति और धर्म से आवृत्त होगा। इससे तैयार होने वाला विभाजन एक ऐसी विडंबना है, जिसका तोड़ मिल भी जाए तो उसे लागू करना मुश्किल लगता है।

Author Updated: February 26, 2019 4:23 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

अंबालिका

हाल ही में एक मित्र के साथ थी तो उनके सहयोगी ने औपचारिकता का निर्वाह करते हुए मेरी ओर रुख करके पूछा- ‘आपका परिचय?’ मैं स्वभाव से संकोची हूं। अचानक इस प्रश्न से थोड़ा हिचकिचा गई। हालांकि यह एक सामान्य औपचारिकता है, लेकिन मुझे यह प्रश्न बहुत विचित्र लगता है। ‘परिचय’ पूछे जाने के बाद हम भले ही अपना नाम और साथ में काम बता दें, लेकिन आज भी मैं इस शब्द को परिभाषित करने में सहज नहीं हो पाती हूं। असमंजस की स्थिति बन जाती है। यों सामान्य तौर पर देखें तो इस प्रश्न में कुछ भी विशेष नहीं है। व्यावहारिक पक्ष यही कहता है कि प्रश्न अति साधारण है- परिचय! मगर मेरा मन-मस्तिष्क इस परिचय की सीमा को मापने में इतना निर्बल हो जाता है कि इस शब्द से भागना चाहता है। मैं ‘परिचय’ में क्या निहित मानूं? कुछ वर्णमालाओं का सार्थक व्यवस्थित संयोजन, जिसे मैं अपना ‘शुभ’ नाम कहती हूं, क्या केवल वही मेरा परिचय है? या किसी कार्यस्थल का कोई पदभार संभालती अपने पद से अवगत कराऊं। इससे कुछ आगे बढूं तो जिसके साथ किसी जगह पर मौजूद हूं, उसके साथ अपने संबंध का उल्लेख करूं? विवाहित हूं तो निस्संदेह अपने पति के नाम को अपना ‘परिचय-पट्ट’ मानूं! कहां है परिचय की सीमा?

क्या मेरा ज्ञान और मेरी सोच-समझ मेरे परिचय में शामिल है? या फिर इन सबसे अलग मैं अपने साथ किसी जाति और संप्रदाय की भी प्रतीक हूं? हमारे जन्म के साथ ही समाज का सबसे विवादित रूप हमसे जुड़ जाता है- धर्म। धर्म हम तय नहीं करते। मां के गर्भ में ही इसका निर्धारण हो जाता है कि हम समाज के किस तबके में आएंगे और हमारे परिचय का आवरण किस जाति और धर्म से आवृत्त होगा। इससे तैयार होने वाला विभाजन एक ऐसी विडंबना है, जिसका तोड़ मिल भी जाए तो उसे लागू करना मुश्किल लगता है। समाज में ऊंची कही जाने वाली जातियों के लोग आज भी सिर उठा कर चलते दिखते हैं और निम्न मानी जाने वाली जातियों के लोगों को परिचय तक के लायक नहीं समझते। एक क्षत्रिय के लिए उसका विशेष परिचय उसका क्षत्रिय होना है। उसकी शान में कोई खलल नहीं आना चाहिए। दूसरी ओर एक ब्राह्मण सिर्फ अपने जन्म की वजह से खुद को समाज में सबसे उच्च समझता है। लेकिन मानव होने के नजरिए से सोचें तो क्या यह उचित है?

क्या परिचय इतनी तुच्छ वस्तु है, जिसे धर्म और जाति विशेष से जोड़ कर समेट दिया जाए? मैं नहीं मानती आदिकाल से चली आ रही वर्ण व्यवस्था केवल समाज को सुव्यवस्थित रूप से चलाने का पर्याय रही होगी। जब तकनीक उन्नत नहीं थी, जब व्यक्ति के पास अतिशय समय था, तब वह उन कार्यों को करता था जो उसके सामर्थ्य के दायरे में था। लेकिन सुविधा और सत्ता के लोभ में समाज के समर्थ तबकों ने पहले लोगों को श्रेणियों में बांट दिया, फिर सामाजिक सत्ता पर खुद काबिज हो गए और धारणाओं से लेकर व्यवहार तक को संचालित करने लगे। मानवता के हनन की शुरुआत शायद वहीं से हुई होगी।

आज जब हम संचार युग में जी रहे हैं तो इस तरह की रूढ़ियों का कोई औचित्य नहीं। मनुष्य केवल मनुष्य है। जाति, वर्ण-भेद या धर्म के बंधन मिथ्या हैं, भ्रम हैं। इन बंधनों से जितनी जल्दी मुक्ति मिल जाएगी, मनुष्य उतना जल्दी मनुष्य बनेगा, राष्ट्र उतनी जल्दी विकास करेगा। किसी भी सभ्य समाज वाले देश में लोगों के बीच भिन्नता की जगह नहीं हो सकती। सोचने की जरूरत है कि अगर दो अलग वर्णों या जातियों के लोगों के अंग-प्रत्यंग एक ही संचरना में बंधे हैं तो वह शक्ति क्या हो सकती है जो इन्हें अलग करती है? सच यह है कि हमारा आदि और अंत एक है। हम चाहे समाज के जितने भी खंड कर लें, दुख होने पर आंसू और सुख होने पर हंसी, ये किसी विभाजन को नहीं देखते। हमारा अस्तित्व एक है और हमारा मनुष्य होना हमारा श्रेष्ठ परिचय है।

इसलिए मैं परिचय को इन सीमाओं में नहीं बांधती। धर्म, जाति या अन्य विशेषताएं मेरा परिचय नहीं। मैं अपना परिचय स्वयं मैं हूं। मेरा पूरा व्यक्तित्व मेरा परिचय है। विचार, बुद्धि, विवेक जैसी कई परिधियों से घिरा है यह परिचय। परिचय देने के लिए खुद से परिचित होना और आत्मबल होना जरूरी है। मेरुदंड की शक्ति परिचय है। लेकिन आज का युग इस परिचय का नहीं रहा। व्यक्ति तो है, पर व्यक्तित्व डूबता जा रहा है। ‘रीढ़ की हड्डी’ रोगग्रस्त हो गई है। बल क्षीण होता जा रहा है। फिर वास्तविक परिचय की जगह गहां! यथार्थ की वेदी पर कृत्रिम का झंडा लहरा रहा है। मनुष्य का अस्तित्व मनुष्य ही भूलता जा रहा है। पारलौकिक कल्पनाओं के अंधेरे में आस्था के परिचय से व्यक्ति का मनुष्य कराह रहा है। सब भाग रहे हैं… नाम, पद और परिचय के पीछे! नहीं… परिचय इस भागमभाग दौर की वस्तु ही नहीं!

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