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दुनिया मेरे आगे: परंपरा का आईना

आम भारतीय जनमानस में बसे दो ग्रंथों ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ में भी घटनाओं की तार्किकता पूर्वजन्म के प्रारब्ध और संचित कर्म व वर्तमान के कर्मों से निर्धारित होती है।

Author Published on: October 8, 2019 2:13 AM
हरिद्वार के अलावा भी भारत में अन्य स्थानों पर भी यही परंपरा रही है।

निशा नाग

काल को निरंतर प्रवाह की तरह देखना भारतीय परंपरा की विशेषता रही है। भारतीय मानस में काल एकरेखीय नहीं है, बल्कि चक्रीय है। यानी जो आज है, वह कल भी था और परसों भी होगा। यह आस्था रही है कि घटनाएं, व्यक्ति- सब यहां बार-बार अपने को दोहराते हैं। यानी जन्म-पुनर्जन्म के सिद्धांत ने व्यक्ति को मृत्यु के बाद पुनर्जीवन और दुख के पहाड़ टूट पड़ने पर पूर्वजन्म के कर्मों का फल कह कर संतोष कर लेने का सहारा दिया है। आम भारतीय जनमानस में बसे दो ग्रंथों ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ में भी घटनाओं की तार्किकता पूर्वजन्म के प्रारब्ध और संचित कर्म व वर्तमान के कर्मों से निर्धारित होती है। यानी राजा दशरथ का राम के वनवास जाने पर प्राण त्याग देना उनसे श्रवण कुमार के अनजाने में हुए वध के कारण मिले श्राप का परिणाम था। ‘महाभारत’ की भी अनेक घटनाएं इसी तरह जन्म-पुनर्जन्म में किए गए कर्मों पर आधारित हैं। शायद इसीलिए भारतीय जनमानस ने पश्चिम की तरह इतिहास को संजोने का प्रयत्न नहीं किया।

आज जिस साक्ष्य के आधार पर इतिहास की इमारत खड़ी की जाती है, वे बर्तनों और औजारों के टूटे-फूटे जमीन में गड़े टुकड़े हैं। यह वह इतिहास है जो आम जन की बात नहीं करता, बल्कि कुछ विशेष जनों की बात करता है, जिन्हें नायक कहा जाता है। आम जन इस इतिहास में शायद कहीं भी नहीं। जन-इतिहास स्मृत ही होते हैं, जिन्हें पीढ़ियां अपने तरीके से वहन करती हैं। इतिहास अगर कहीं सुरक्षित रहा है तो वह या तो राज्याश्रय में या धर्माश्रय में या फिर लोकाश्रय में। भारत के संदर्भ में इतिहास की एक अन्य परंपरा रही है, जिसे स्मृत इतिहास कहा गया है। जहां किंवदंतियां, लोक कलाएं गाथाएं, मिथक और इतिहास अपने रूप और अंतर्वस्तु में इस तरह घुले-मिले हैं जैसे दूध और पानी। यह उन ऐतिहासिक साक्ष्यों से परे है जो इमारतों, बर्तनों के टुकड़ों, सिक्कों या फिर पांडुलिपियों में बसा रहता है।

हालांकि कुछ ऐसे साक्ष्य अवश्य मौजूद रहते हैं, जो आम और गुमनाम जनों की कथा को कह देता है। एक बार किसी पुरानी गढ़ी को देखते हुए उसके पूजा स्थल के बाहर लगे हुए हाथों के लाल निशान को दिखा कर गाइड ने बताया कि यह उन राजपूत रानियों के हाथ के निशान हैं जो सती हो गर्इं! उन्हें देखते हुए लगा कि कुछ निशान इतने छोटे थे जैसे दस और बारह वर्ष की बच्चियों के होते हैं और मन उन अज्ञात स्त्रियों के प्रति घोर करुणा से भर गया, जो अभी स्त्री बनी भी नहीं थीं। इसी तरह, जोधपुर में घर के समीप तापी बावड़ी को देखते हुए मुझे बताया गया कि अभी जब इसकी सफाई हुई तो काफी मात्रा में इसमें से सोने-चांदी के गहने निकले, जिसे सरकार ने अपनी पास रख लिया है। मेरा प्रश्न था कि क्या यहां गहने छिपाए गए थे, तो उत्तर मिला- ‘यह उन महिलाओं के थे, जिन्होंने पारिवारिक क्लेश, निस्सतांन होने या अन्य किसी दुख से यहां डूब कर आत्महत्या कर ली थी’। उन स्त्रियों का कोई इतिहास या स्मृति चिह्न नहीं है। केवल स्त्री के दुख की शाश्वत गाथा यहां भी मौजूद है।

आम जन का इतिहास कहीं और भी सुरक्षित रहा है। अभी अपने आत्मीय के असमय काल कलवित होने पर हरिद्वार जाना पड़ा। यह पहले मालूम था कि यहां पर परिवारों के परंपरागत पंडे हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी कर्मकांड करवाते रहे हैं। उनके पास ढेरों पुराने बही-खाते थे। उन सबमें स्थान विशेष के अनेक खानदानों का इतिहास दर्ज था कि कौन कब काल-कवलित हुआ और उसके फूल लेकर कौन-कौन आया! उनके अनुसार, उनके पास तीन सौ सालों का इतिहास दर्ज है। हरिद्वार के अलावा भी भारत में अन्य स्थानों पर भी यही परंपरा रही है।

सभी जगह बही-खाते और वहां आकर श्राद्ध कर्म करवाने वालों का इतिहास इसी तरह दस्तावेजों में दर्ज है। यह जान कर हैरानी भी होती है कि आज से दो-तीन सौ वर्ष पूर्व, जब यातायात के साधन मौजूद नहीं थे, लोग कैसे दूरदराज से वहां तक पहुंचते थे! बैलगाड़ी पर महीनों की कठिन यात्राएं ही तब एकमात्र उपाय रहा होगा। मगर तब भी आस्था उन्हें वहां तक पहुंचाती थी। पॉल वाइस के अनुसार अपने को अतीत से जोड़ने में आनंदानुभूति होती है, मनुष्य अपने स्रोत की चेतना से अपने को आश्वस्त कर लेता है कि वह अकेला है। यह मनुष्य का स्वभाव है कि वह किसी चीज को किसी परिप्रेक्ष्य में रख कर ही पहचान सकता है। यह शायद काल के असंख्य प्रवाह में एक बिंदु के समान स्थित मानव के अस्तित्व को समझने का प्रयत्न हो। यह एक सच्चाई है कि आज की चूहादौड़ में फंसी दुनिया में किसे फुर्सत है बीते कल की फिक्र करने की! पर हम दौड़ में पल भर भी थम कर सोचें कि आज तो कल की नींव पर ही खड़ा है और आने वाला कल लगातार आज बनता चला जा रहा है तो अतीत वर्तमान और भविष्य- अनिवार्य रूप से अविभाज्य लगने लगेगें और यह भी की इतिहास परंपरा का ही एक हिस्सा है।

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