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दुनिया मेरे आगे: समाज की संगत में

उत्तराखंड के बहुत से सरकारी स्कूलों में खोजबीन विधा पर आधारित बाल शोध मेलों के जरिए इस तरह के प्रयास किए जा रहे हैं, जहां बच्चे अपनी पाठ्य-पुस्तकों की विषय-वस्तु पर सवाल तैयार करते हैं।

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है।

जगमोहन चोपता

गेहूं की कटाई से खाली खेतों में जगह-जगह चूल्हे जल रहे थे। हर चूल्हे पर दो महिलाएं मुस्तैदी से रोटियां पका रही थीं। खेत के किनारे पुरुषों का झुंड सब्जी काट रहा था। इक्का-दुक्का युवा बड़े कड़ाहे में हलवा बना रहे थे। छोटे-छोटे लड़के-लड़कियां हर एक चूल्हे से बनी रोटियों को इकट्ठा कर रहे थे। कुछ बच्चे सभी को चाय बांट रहे थे। गांव के बड़े बुजुर्ग गप मारने के साथ-साथ इन तमाम कामों पर पैनी नजर गड़ाए हुए थे। ऐसा लगता था कि किसी फिल्म के दृश्य का फिल्मांकन किया जा रहा हो। लेकिन यह सब हो रहा था पहाड़ के एक गांव में।

बीते सप्ताह एक शादी में अपने गांव चोपता जाना हुआ, जहां शाम को बरात आनी थी। बाजार के तमाम दबावों के बावजूद गांव में आज भी सहकारिता पर आधारित कामकाज जारी है। गांव के लोग बरातियों के लिए मिल कर खाना तैयार करते हैं। युवक-युवतियों द्वारा बरात के स्वागत से लेकर खाना परोसने तक के तमाम काम मिल-जुल कर किए जा रहे थे। इस प्रक्रिया में धीरे-धीरे बड़े-बुजुर्ग छंट कर मार्गदर्शक की भूमिका में चले जाते हैं तो छोटे बच्चे उनकी जगह लेने लगते हैं।

समाजीकरण का यह बहुत ही अनोखा आयोजन लगता है। इस प्रक्रिया में स्कूली बच्चे इन तमाम कामों के जरिए एक बड़े समूह के साथ संवाद करते हैं। यह संवाद इनमें समूह में काम करने का कौशल तो देता ही है, साथ में देता है खूब सारा आत्मविश्वास। यह विश्वास है काम के प्रति समर्पण का, काम के प्रति आदर का और इंसानी समाज में काम कितना महत्त्वपूर्ण है, इन सबका। काम करते छोटे-छोटे बच्चों को देख वयस्क अंदाजा लगा लेते हैं कि किस बच्चे की किस तरह के कामों में रुचि है। वे उनमें भविष्य के कुशल भोजन बनाने, भोजन परोसने और मिल कर काम करने और जश्न मनाने वाले नागरिक को न सिर्फ देख रहे होते हैं, बल्कि उनको इस ओर बढ़ाने का भी सायास प्रयास करते हैं। यह खेतिहर समाज के बहुत जरूरी संस्थान जैसा है, जहां वे अपने बच्चों को भविष्य के लिए तैयार करते हैं। इसे लेकर गांव के बड़े-बुजुर्गों का बहुत ही सूक्ष्म अवलोकन भी है। मसलन, जो बच्चा इन तमाम प्रक्रियाओं में अच्छे से जुड़ता है, बड़े होकर समाज में घुलने-मिलने के साथ ही वह जो भी पेशा चुनता है, वहां वह अपने लिए बेहतर स्थान बना लेता है। ऐसा कहने के पीछे उनके पास पीढ़ियों के खूब सारे उदाहरण होते हैं।

इन तमाम पहलुओं को देखते हुए मुझे लगता है कि सामाजिक विज्ञान की कक्षाओं में ऐसे बच्चों के अनुभव कितने कारगर और शिक्षण को जीवंत करने वाले हो सकते हैं! शादी-ब्याह के उनके पास ढेरों उदाहरण होते हैं, जो जेंडर, जाति और विविधता के सम्मान जैसी अवधारणाओं पर समझ बनाने के लिए बहुत मुफीद लगते हैं। काम के प्रति सम्मान का इससे अच्छा उदाहरण क्या हो सकता है! इतिहास में समय और परिवर्तन को बरातों में आए बदलाव के जरिए बहुत ही रोमांचक तरीके से समझा जा सकता है। साथ ही यहां भौगोलिक वजहों से खाना बनाने के तरीकों से लेकर परोसने की प्रक्रियाओं के जरिए समझना सहज हो सकता है।

इस प्रक्रिया में बच्चों को अपने समाज और वहां की प्रक्रियाओं को समझने और उनका विश्लेषण करने का मौका मिल पाएगा। गांवों में समय के साथ-साथ इन प्रक्रियाओं में क्या-क्या बदलाव आए? बदलाव के कारण क्या रहे और आने वाले दिनों में किस तरह का बदलाव हो सकता है? ऐसे सवालों के जवाब तलाशने में मददगार होंगे, जिससे इतिहास, भूगोल की दक्षताओं पर बच्चे सहजता से समझ बना पाएंगे। समाज में हो रहे इस तरह के बेहतर प्रयासों को जब कक्षाओं में स्थान मिलता है तो बच्चों को भी महसूस होता है कि उनके समाज में होने वाले काम कितने महत्त्वपूर्ण हैं। इसके साथ ही शादियों में खुलेआम शराब परोसने, दिन-प्रतिदिन महंगी होती शादियां, दहेज जैसी बुराइयों पर भी आलोचनात्मक विश्लेषण के खूब मौके मिलते हैं। स्थानीय संदर्भों पर कक्षा में होने वाले संवाद से बच्चों में एक सजग भावी नागरिक के रूप में मुकम्मल समझ बनेगी, जिससे वे अपने स्तर पर अपने गांवों में जहां बेहतर कामों को बढ़ाने में अपना योगदान दे सकेंगे, वहीं कुप्रथाओं के उन्मूलन के लिए संवाद और जागरूकता फैलाने के साथ ही इनसे विमुख भी हो पाएंगे।

उत्तराखंड के बहुत से सरकारी स्कूलों में खोजबीन विधा पर आधारित बाल शोध मेलों के जरिए इस तरह के प्रयास किए जा रहे हैं, जहां बच्चे अपनी पाठ्य-पुस्तकों की विषय-वस्तु पर सवाल तैयार करते हैं। इनके जवाब समुदाय की मदद से खोजते हैं और स्कूल में एक दिन बाल शोध मेले का अयोजन करते हैं। इस आयोजन में वे अपने शोध को प्रस्तुत करते हैं। बाल शोध विधा द्वारा शिक्षण करने वाले शिक्षक साथियों के अनुभव बताते हैं कि बच्चे इन प्रक्रियाओं में सवाल बनाने, डाटा एकत्र करने, विश्लेषण करने और प्रस्तुतिकरण जैसे कौशल सहजता से सीखते हैं। इस तरह की प्रक्रियाओं में समुदाय का स्कूल से जुड़ाव और मजबूत होता है जो विद्यालय विकास के लिए बहुत कारगर है।

 

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