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दुनिया मेरे आगे: इंसानियत के हक में

संत के रूप में प्रचारित बाबाओं के आश्रम हैं। आम जन भटक कर शांति की तलाश में इन आश्रमों में आ जाता है।

Author Updated: October 3, 2019 3:48 AM
हालत यह है कि धार्मिक भावनाओं, आस्था और विश्वास का ठेस पहुंचने की दलील पर न्यायालय के फैसले तक पर सवाल उठाए जा रहे हैं। (सांकेतिक तस्वीर)

दुनिया के किसी भी हिस्से में जब आस्था या धर्म के नाम पर तनाव पैदा होने लगता है तो लोगों का जीवन मुश्किल में पड़ता है। जहां तक भारत का सवाल है कि तो यह एक धर्मप्राण देश है। मानव धर्म इसके मूल में है। इसलिए धर्म का एक व्यापक अर्थ है जो जीवन की क्रियाओं को समग्र रूप से संबोधित करता है। लेकिन वास्तविक स्थिति बिल्कुल अलग है। धर्म के नाम पर बहुत सारे साधु-संत और आश्रम के संचालक महात्मा कहे जाने वाले लोग आमजन को बेवकूफ बना रहे हैं। पिछले कुछ सालों के दौरान आश्रमों और बाबाबों के किस्से हम सबने पढ़े हैं। हर व्यक्ति के जीवन में दुख और निराशा किसी न किसी कारण से होती है। इस हताशा में लोग धार्मिक बाबाओं के दुश्चक्र में फंस जाते हैं।

इसके अलावा, लोगों के अपने-अपने भगवान होते हैं। वे अपनी भक्ति और सामर्थ्य से दान भी देते हैं। जल, फल-फूल या नारियल आदि अर्पित किए जाते हैं। पैसे मंदिरों की ‘गुल्लक’ में या यों ही भगवान के सामने रख दिए जाते हैं। कई मंदिरों की आमदनी लाखों में होती है जो आखिरकार पुजारी या पंडितों के पास जाती है। उनसे पूछने वाला कोई नहीं कि कितना पैसा आया और उसका क्या हुआ! कई प्रतिष्ठित मंदिरों में तो जमा धनराशि करोड़ों रुपए है। लेकिन इन पर न कोई सामाजिक-धार्मिक दबाव है और न ही शायद कोई कानून लागू होता है। जबकि इस पैसे का सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों, स्वास्थ्य, शैक्षिक संस्थाओं पर और आम जन के सहायतार्थ उपयोग किया जाना चाहिए।

यह किसी से छिपा नहीं है कि मंदिरों के बाहर भूखे लोगों की कतारें होती हैं। जैसे-तैसे उनके खाने की व्यवस्था हो जाती है, पर कोई यह नहीं सोचता कि उन्हें सक्षम कैसे बनाया जाए। वे मनुष्य की तरह जी सकें। उनके बच्चों को अक्षर ज्ञान मिले। प्रशिक्षण देकर उन लोगों को सिलाई, कढ़ाई, बुनाई और हाथ से किए जाने वाले छोटे रोजगार दिए जा सकें, ताकि वे भी सम्मान से जी सकें। लेकिन होता यह है कि धर्म के नाम पर उनके आगे खाने का सामान या कुछ सिक्के फेंक दिए जाते हैं, वे वहीं पड़े रहते हैं। दूसरी ओर, मंदिर बड़े और भव्य बनते जाते हैं। उनमें मौजूद मूर्तियों को पहनाए जाने वाले वस्त्रों और आभूषणों की कीमत बढ़ती जाती है। मंदिर के बाहर सड़कों के किनारे फटेहाल या कंबल लपेटे लोग कड़ाके की सर्दी में ठिठुरते पड़े रहते हैं। स्कूल और अस्पताल है या नहीं या फिर किस हालत में है, इस सबकी किसी को फिक्र नहीं होती।

संत के रूप में प्रचारित बाबाओं के आश्रम हैं। आम जन भटक कर शांति की तलाश में इन आश्रमों में आ जाता है। लेकिन पिछले कुछ समय के दौरान संत कहे जाने वाले लोगों के जैसे आचरण सामने आए हैं, वह अपने आप में बहुत कुछ कह जाता है। कई बाबा तो जेल की सजा काट रहे हैं। ऐसे आश्रमों में जाने वाले कई लोग कुछ समय बाद अपना पैसा गंवा कर, आत्मविश्वास खोकर और हताश होकर आश्रमों से बाहर आते हैं। उन्हें जीने का कोई मार्ग नजर नहीं आता। इस तरह के आश्रमों में भक्ति का वितंडावाद मनुष्य को अंधेरे में धकेलता है, क्योंकि ऐसी आस्था तार्किक शक्ति को विच्छिन्न कर देती है। अलग-अलग धर्मों के दायरे में अभी भी ऐसे आश्रम हैं, जहां अंधविश्वास का राज है, भूत-प्रेत उतारे जाते हैं। इस प्रक्रिया में कोड़ों से मारा जाता है, गर्म सलाखों से दागा जाता है और यहां तक कि पशुओं की बलि तक दी जाती है। लेकिन इस पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होती।

दूसरी ओर, कहीं धर्म के ठेकेदार तालिबान की फौज तैयार कर रहे होते हैं, जो हत्याओं और आतंक में ही अपने धर्म का प्रतिफलन देखते हैं। उन्हें पूरा यकीन होता है कि आत्मघाती हमला करने के बाद मिली मौत के बाद उन्हें स्वर्ग मिलेगा। इसी तरह, हाल ही में केरल में एक नन से पादरी ने जिस तरह बलात्कार किया, वह भी अकेला मामला नहीं है। मुश्किल यह है कि पहले तो इन धर्म के ठेकेदारों की पोल नहीं खुलती। खुल भी जाए तो बहुत मुश्किल से इनके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई होती है। बल्कि आज हालत यह है कि भीड़ बन कर हत्या तक कर देने के आरोपी जेल से निकल कर आते हैं तो उनका स्वागत होता है। फिर सब वैसा ही चलता रहता है।

अंतर आता है तो उन पीड़ितों के जीवन में, जो इनके विरोध में आवाज उठाते है। उनके लिए जिंदगी की राह बहुत कठिन हो जाती है। हालत यह है कि धार्मिक भावनाओं, आस्था और विश्वास का ठेस पहुंचने की दलील पर न्यायालय के फैसले तक पर सवाल उठाए जा रहे हैं। सबरीमाला में रजस्वला उम्र की स्त्रियों के प्रवेश निषेध पर अदालत का फैसला और उसका विरोध इसका ज्वलंत उदाहरण है। राजनीतिक पार्टियां भी भीड़ को अपना वोट बैंक मान कर राजनीति कर रही हैं। जबकि दुनिया के किसी भी समाज में मनुष्य और मनुष्यता प्राथमिक होने चाहिए। जहां आस्था के नाम पर अंधविश्वास हावी होगा, वहां मनुष्यता खंडित होगी।

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