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दुनिया मेरे आगे: वे अगर हमारे होते

हम कितने स्वार्थी हो गए हैं कि होटल, ढाबा, दुकान, फैक्ट्री, बस स्टैंड पर ऐसे बच्चों को काम करते देख कर इन पर बस लापरवाह नजर डाल कर वापस वैसे ही पत्थर दिल सामान्य बने रहते हैं, बेचैन होकर वहीं पर रो नहीं देते!

Author Published on: September 11, 2019 2:50 AM
सांकेतिक तस्वीर।

पूनम पांडे
आसमान से बरसती बूंदें हमेशा रूमानियत भरा अनुभव नहीं देतीं, कभी-कभी रुला भी जाती हैं। बारिश का मौसम अक्सर बहुत सारे बंधन ढहा भी देता है और कोई सैलाब-सा उमड़ आता है। पिछले महीने एक दोपहर कुछ ऐसा ही हुआ। आसमान बिल्कुल भूरा-काला था और रिमझिम बारिश वाले खुशनुमा मौसम में बाहर ‘गरमागरम भुट्टे, नींबू और मसाला नमक वाले, जो भी चख ले वे किस्मत वाले’ कह कर किसी ने लयबद्ध आवाज लगाई। उसकी आवाज के साथ ही सेंके गए भुट्टे की ऐसी खुशबू आई कि खुद को रोकना मुश्किल हो गया और पैर आवाज की दिशा में चल पड़े।

बाहर आकर देखा कि दो सलोने मासूम बच्चे हैं, तकरीबन बारह-तेरह साल के। गले में टोकरी बंधी है और वे ही कविता की शक्ल में आवाज लगा कर भुट्टे बेच रहे थे। बहुत प्यार उमड़ आया उन दोनों पर। फिर गौर से देखा कि उन दोनों के पांव कीचड़ में सने हुए थे और पैरों में चप्पल नहीं। तन पर मैला और चिथड़ा-सा कपड़ा। गंदे बाल, जैसे रेत में नहाए हुए। चेहरा जाने कितनी धूल और धुएं के चुंबनों से सराबोर, लेकिन माथे पर शिकन नहीं। दोनों की आंखों में ऐसी जोरदार वाली चमक थी कि बढ़िया मेकअप करने वाला कोई व्यक्ति भी किसी में पैदा न कर सके। शायद इन आंखों में यह चमक हर उस ग्राहक को देख कर आ जाती होगी, जो महक से खिंचा चला आता है और भुट्टे खरीद लेता है।

कहना न होगा कि मैंने भी बताई गई कीमत देकर खुशी-खुशी उनकी ग्राहक बनना पसंद किया और उन्हें पहनने को जूते और कुर्ते भी दिए। उसके बाद उन सूखे-से होठों पर खिली मुस्कान और आंखों में दुगनी चमक लेकर वे आगे चल पड़े… हौले-हौले आखों से ओझल हो गए। मगर दिल से अब भी वे बच्चे नहीं गए, कहीं मन में बस गए। बंद आखों में रह-रह कर इनके घर-परिवार, माता-पिता आदि के चित्र बनते-बिगड़ते रहे। कैसी मजबूरी होगी मां-पिता की… क्या बात होगी जो इन बच्चों को भी काम पर लगा दिया?

यों बाल श्रम एक जघन्य अपराध है, गैरकानूनी है, पर हम इसे चुपके-चुपके चलता और फलता हुआ देख कर भी वैसे ही अनदेखा कर देते हैं, जैसे किसी को गैरकानूनी रूप से प्लास्टिक की थैली में सामान बेचते हुए देख रहे हैं या किसी पंद्रह साल के किशोर-किशोरी को गैरकानूनी ढंग से मोटरसाइकिल चलाते हुए देख रहे हों। पर यह उससे भी गंभीर बात है और विचारणीय है कि उन बच्चों के खेलने-खाने और पनपने-पलने की उम्र है, मगर ऐसे लाखों बच्चे हर कस्बे और शहर में हैं, जो इसी तरह दिन-रात काम कर रहे हैं। इनको आराम और सुविधा का नाम-पता तक नहीं मालूम। बस यही पता है कि आज काम किया और सौ रुपया कमाया।

बस यही है इनकी जिंदगी का सच। बाकी कुछ नहीं। पढ़ाई-लिखाई, तकनीक, सामाजिक प्रतिष्ठा, साफ-सुथरी दिनचर्या, चमक-दमक इनके लिए सिर्फ एक कठिन पहेली-सी है। जो लोग अमीर हैं, गाड़ी-बंगले वाले हैं, वे इनको भले ही हर दिन दिख जाते हैं, पर इन बच्चों के लिए सुखी और समृद्ध लोग ‘चंद्रकांता संतति’ के वे अय्यार हैं जो आसानी से सबकी समझ में नहीं आते। मगर ये नौनिहाल हाड़-मांस के बच्चे हैं, इंसान हैं… बिल्कुल हमारी तरह।

हालांकि यह हम जानते हैं, मगर मानते नहीं। हमारी ओछी सोच है यह। इसलिए ऐसे लाखों बच्चे मरती हुई मानवीयता और हमारी संवेदनहीनता का प्रतिबिंब बनते जा रहे हैं। अखबार में कभी भूले-भटके इन बच्चों के खिलाफ किसी अत्याचार, अनाचार, अन्याय की कोई खबर छप भी जाती है तो हम उस पर गौर नहीं करते। हम कितने स्वार्थी हो गए हैं कि होटल, ढाबा, दुकान, फैक्ट्री, बस स्टैंड पर ऐसे बच्चों को काम करते देख कर इन पर बस लापरवाह नजर डाल कर वापस वैसे ही पत्थर दिल सामान्य बने रहते हैं, बेचैन होकर वहीं पर रो नहीं देते!

बाल श्रमिक बने ऐसे कितने ही बच्चे हमारे सामने से होकर गुजरते हैं। बहुत गरीब, निपट अनपढ़, अभिभावकों से वंचित बच्चे बड़े ही सुनियोजित तरीके से लाए जाते हैं और कारखानों में बतौर मजदूर काम पर लगाए जाते हैं। अपना व्यवसाय कौन नहीं चमकाना चाहता! कौन है जो कारोबार करते हुए मुनाफा कमाना नहीं चाहता, पर इन मासूम बच्चों से काम लेकर कुछ बेरहम कारोबारी क्यों इनका जीवन खराब करने पर तुले रहते हैं? ऐसा करके क्या वे अपनी संवेदनशीलता को भी कठघरे में खड़ा नहीं करते? लेकिन ऐसे लोगों को संवेदना से मतलब भी क्या..!

एक कविता पढ़ी थी कि ‘कुछ बच्चे इतने अच्छे होते हैं कि बिल्कुल जिद नहीं करते, कभी खिलौने नहीं मांगते, कभी मनचाही जगह पिकनिक सैर-सपाटे के नाम पर रूठ नहीं जाते। और ऐसे अच्छे बच्चे सौ रुपए रोज में दिहाड़ी मजदूर बना दिए जाते हैं!’ शायद इन्हें डरा-धमका कर काम कराना बहुत आसान है। मगर यह एक गैरकानूनी हरकत है, एक बेरहम और संवेदनहीन मानसिकता और अमानवीयता है। मासूमों का खून पीकर कमाया हुआ धन बरकत नहीं ला सकता!

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