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दुनिया मेरे आगे: गायब होते गांव

गांव की तस्वीर एकदम बदरंग और दयनीय दिखाई पड़ रही है। गांव के धूल-धूसरित जीवन से सब मुक्ति चाहते हैं, लेकिन मैं गांव और उसकी शीतल छांव चाहता हूं।

Author Published on: January 16, 2020 2:47 AM
शहर की चकाचौंध ही आधुनिकता और प्रगति का पर्याय बन चुकी है।

रीतेंद्र कंवर शेखावत

एक प्यारा शेर है कि ‘मर ही जाता मैं शहर में बच गया, गांव की शीतल हवाएं साथ हैं।’ आज भी गांवों में जाएं तो वहां शीतल हवाएं, सघन अमराई और तालाब मिलेंगे। यह और बात है कि ऐसे मनोरम दृश्य वाले अनेक गांवों को महानगर निगलता चला जा रहा है। मिट्टी की एक खुशबू होती है, इसका पता तब चलता है, जब सब कुछ छोड़ कर गांव से शहर में बसते हैं। शहर, जहां चारों ओर कंक्रीट दिखता है। मिट्टी के लिए थोड़ी बहुत जगह या तो बाग-बगीचों और पार्कों में होती है या फिर घर के गमलों में। एक तरह से देखा जाए तो शहर कृत्रिम हैं, जबकि गांव सहजता से बसते हैं। जाहिर है, शहर में आने के साथ ही मिट्टी की अपनी खुशबू से भी दूर हुआ। जब अपने गांव से दूर हो गया, तब उसकी मिट्टी की खुशबू और उसकी कीमत का अंदाजा हुआ। गांव में रहने की अपनी समस्याएं भी हैं, इसके बावजूद गांव मुझे आकर्षित करता है। लोगों में आपसी तालमेल होता है और एक-दूसरे का हर काम में सहयोग करते हैं, चाहे वह खेती में हो या कोई सामाजिक दायित्व का कार्य जैसे शादी-ब्याह हो। ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों के भीतर बहुत सरलता, निश्छलता और अपनापन है। ये बातें शहरी लोगों के मुकाबले ज्यादा मानवीय होने का परिचय देती हैं।

सही है कि गांवों में शहरों जैसी तकनीक नहीं आई है, लेकिन आवश्यकता भर सुविधाएं अब यहां भी पहुंच गई हैं। लोग गांव में भी अब आमतौर पर गैस-चूल्हे का प्रयोग करते हैं। बहुत सारे घरों में पंखा भी दिख जाता है और बिजली रहने पर टेलीविजन का प्रयोग भी। कुछ जगहों को छोड़ कर अधिकतर जगह सड़कें भी बन चुकी हैं और आवाजाही के साधन भी मिलने लगे हैं। हालांकि अब दूसरी तरह से हालात इतने खराब हैं कि गांव के लोग खुद भी वहां रहना नहीं चाहते। मशीनों के बढ़ते इस्तेमाल की वजह से गांवों में आजीविका और पेट पालने के साधन बहुत कम हो गए हैं। एक त्रासदी यह कि गांव भी राजनीति की चपेट में आ चुके है, जिससे दंगे-फसाद की समस्याएं आम होती जा रही हैं। लोगों की थाना-अदालतों में आवाजाही बढ़ी है। दरअसल, गांव अब सिर्फ खेतों के बीच कुछ कच्चे और ज्यादा पक्के घरों की आबादी भर रह गए हैं, जहां जीवन-रस पूरी तरह सूख-निचुड़ चुका है। पढ़ी-लिखी नई पौध गांव में रहना नहीं चाहती। चमक-दमक और शहर की चकाचौंध ही आधुनिकता और प्रगति का पर्याय बन चुकी है।

ऐसे में गांव की तस्वीर एकदम बदरंग और दयनीय दिखाई पड़ रही है। गांव के धूल-धूसरित जीवन से सब मुक्ति चाहते हैं, लेकिन मैं गांव और उसकी शीतल छांव चाहता हूं। नदी, तालाब, हरियाली चाहता हूं। शहरों में यह सब दुर्लभ है। लेकिन मेरे या आपके चाहने से क्या होगा! स्मृतियों में रहा-बचा गांव यथार्थ में अब नहीं है। ग्रामीण इलाकों में अशिक्षा और गरीबी आज भी भयानक स्तर तक कायम हैं। सरकारी स्कूलों के हालात बेहद चिंताजनक है। इसलिए जब तक वहां के बच्चों को अच्छी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिलने लगती, तब तक वहां के जीवन में कोई बदलाव आएगा, ऐसा सोचना शायद खामखयाली है। अशिक्षा के कारण ही गांवों में आज भी अंधविश्वास और सामाजिक कुरीतियां जमी हुई हैं। लोग हर समस्या को लेकर बाबाओं और तांत्रिकों की मदद लेते हैं। महिलाओं के पास न सपने हैं, न उन सपनों को पूरा करने के लिए उड़ान। जातिगत ऊंच-नीच का भेद और शोषण आज भी जड़ें जमाए हुए है।

दूसरी ओर, शहरों के अनाप-शनाप और उसके अनियोजित विकास के दैत्य ने विगत डेढ़-दो दशकों में ही कितने ही गांवों को निगल लिया। विकास के नाम पर हर तरफ लोगों को उजाड़ा जा रहा है और लोग खुश हैं, क्योंकि उनके पास पैसा आ रहा है, भौतिक सुख-सुविधाएं बढ़ रही हैं। जो युवा पहले साइकिल चला कर बीस किलोमीटर तक आना-जाना मजे से कर लेता था, अब उसे साइकिल अछूत-सी लगती है। उसे महंगी बाइक चाहिए। शहरी चमक-दमक को ही अब जीवन-स्तर का पर्याय समझा जा रहा है।

आज एक गांव की कई फसली उपजाऊ धरती बिक कर जब शहर की सीमा में समा कर पलक झपकते अपनी छाती पर कंक्रीट का जंगल खड़ा कर लेती है, तो यह सिर्फ एक गांव और उसकी देहाती बस्ती का नष्ट हो जाना नहीं है, बल्कि उस गांव का रहन-सहन, रीति-रिवाज, वहां का लोक जीवन, कथा-किस्से, खलिहान, खाड़े, खानपान, पालतू पशुओं के रंभाने की आवाजें, उनके बाड़े, खुरों के निशान, गोधूलि सब कुछ नष्ट हो जाना है, जिसकी भरपाई किसी तरह संभव नहीं। मैंने गौर किया है कि इंसान कितना भी स्वार्थी क्यों नहीं हो, लेकिन अंतिम समय में जैसे उसे अहसास हो जाता है कि जीवन का असली मतलब अपनों के संग मिल कर जीना है। होना यह चाहिए कि गांव की मिट्टी में पले लोग शहर से अच्छी चीजें सीख कर गांव में लौटें, प्रयोग करें और गांव को भी उन्नत बनाने में सहयोग करें।

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