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दुनिया मेरे आगे: आदतों का कचरा

कूड़े-कचरे और कबाड़ को हटाने के लिए महज आश्वासन नहीं, इंसानी प्रयास और दृढ़ इच्छा शक्ति चाहिए। लेकिन इस मसले पर अभी तक हमारे दिमाग में कचरा भरा हुआ है।

Author June 13, 2019 1:21 AM
फोटो सोर्स : Twitter

संतोष उत्सुक

कुदरत की हर रचना खूबसूरत है। इसका काफी कुछ खुद बिगाड़ने के बाद भी हम लगातार इसकी अनदेखी किए जा रहे हैं। अपनी लापरवाही, स्वार्थ और विकास के साथ बढ़ती दोस्ती के कारण उतना ध्यान नहीं देते कि प्रकृति के आंगन में बढ़ती गंदगी साफ होती रहे। किसी से भी प्रेरणा लेना अब हमें नहीं भाता। पॉलीथिन और प्लास्टिक का प्रयोग कानूनन बंद है। व्यक्तिगत, राजनीतिक, सामाजिक संस्थाओं, जुलूसों, बैठकों और सरकार द्वारा किए गए प्रयासों का फर्क पड़ा है, लेकिन अगर गाड़ी और पद से उतर कर सचमुच पैदल चल कर संजीदा दिमाग और वाकई खुली आंखों से देखा जाए तो तस्वीर उजली नहीं है। सामने के अनेक डरावने चित्र खींचे जा सकते हैं।

पिछले दिनों पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के कई क्षेत्रों में जाना हुआ। हरे और नीले बॉक्स लगे हुए पुराने लेटर-बाक्स की याद दिलाते हैं। मगर जैसे अब हम पत्र लिखना पसंद नहीं करते, उसी तरह इन डिब्बों में अभी भी कूड़ा-कचरा डालना पसंद नहीं करते। लोग यहां-वहां कूड़ा-कचरा फेंकते दिखते हैं। नालियों में कचरा फंसा है और उसमें पानी की कमी के कारण बदबू फैलती रहती है। पर्यटक अभी भी बीयर, पानी, कोल्ड ड्रिंक की बोतल, नैपकिन और फल वगैरह चलती कार से बाहर फेंकते दिखे। कूड़ा निष्पादन के बारे में अज्ञान तो नहीं है, घोर लापरवाही है। कहीं दुकान के बाहर गत्ते का डिब्बा रखा है, पॉलीथिन कोने में पड़े हैं। उखड़ी हुई सड़कों के आसपास टूटे पत्थर, मिट्टी के ढेर, लकड़ी के टुकड़े, बोतलें, उड़ते पॉलीथिन पेड़ों पर लटके, यहां-वहां पड़े हैं। एक जगह पर दो दिन लगातार देखा कि कचरा पेटी में आग लगा कर निबटाया जा रहा है। अनेक डंपरों के पास भी कबाड़ फैला हुआ है। कितनी जगह देखा कि नीले और हरे बॉक्स नए और साफ-सुथरे खड़े हैं। इनमें कचरा डालेंगे तो ये गंदे हो जाएंगे, शायद समझदार नागरिक ऐसा नहीं करना चाहते।

ऐसा लगता है कि हमें अपनी बिगड़ी हुई सांस्कृतिक आदतों से प्यार है। पॉलीथिन और प्लास्टिक से लगाव का कारण समझना मुश्किल है। कहीं चाय के लिए रुकें तो ढाबे और रेस्टोरेंट वाले अपना सब तरह का कूड़ा अपने ही आस-पड़ोस में या बहती नदी पर बने पुल के पास फेंक रहे हैं। बेचारी नदी की जिम्मेदारी तो कब से इसे अपने साथ बहा ले जाने की मान ली गई है। पत्थरों के बीच बहते पानी में पॉली लिफाफों में भरा घरेलू कचरा, लकड़ी के टुकडेÞ, कपड़े, पॉलीथिन, प्लास्टिक और लोहा, यहां तक कि पुराने टीवी के कैबिनेट तक फंसे हैं। कई बाजारों में घुसते ही नाक दबानी पड़ती है। इतनी बदबू है कि मन करता है कि वहां जाकर प्रशासन से सवाल करना चाहिए।

कूड़े-कचरे और कबाड़ को हटाने के लिए महज आश्वासन नहीं, इंसानी प्रयास और दृढ़ इच्छा शक्ति चाहिए। लेकिन इस मसले पर अभी तक हमारे दिमाग में कचरा भरा हुआ है। कितनी बार शैलेंद्र का लिखा गीत जुबान पर आता है- ‘दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई… काहे को दुनिया बनाई’। फेसबुक पर यह लिख भर देने से क्या हम सचमुच समस्या का सामना कर लेते हैं? मीडिया में कितनी बार फोटो के साथ खबरें छपती हैं, मगर प्रशासन की दूसरी प्राथमिकताएं रहती हैं। ऐसे में अनगिनत जगह लिखे क्षेत्र को साफ-सुथरा रखने के विज्ञापन महज पैसा कमाने का पर्याय लगते हैं।

अधिकतर बाजारों, गलियों, किनारों, कोनों, नालों और नालियों में गंदगी और उसकी सड़ांध पसरी हुई हैं। पुरानी और नई इमारत का कबाड़ रिहाइशी क्षेत्र से बाहर फेंक दिया जाता है। वहीं कहीं यह बोर्ड भी लगा होता है कि ‘यहां कूड़ा-कचरा फेंकने पर जुर्माना लगाया जाएगा।’ लेकिन जुर्माना कौन करेगा और किस पर? प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों पर बड़े ओहदेदार मंत्री और संतरी स्वार्थ साधने, पूजापाठ कराने आते हैं। लेकिन उनके पास सामाजिक कामों के लिए वक्त नहीं रहता। हरिद्वार जैसे प्रसिद्ध तीर्थ पर देखा गया कि लोग ‘हर की पैड़ी’ के पास नहा कर बच्चों के डायपर तक वहीं फेंक जाते हैं। कुछ कदम पीछे ही पुल के नीचे पानी में फैली गाद, प्लास्टिक बोतलें, पुरानी मूर्तियां, पुराने कपड़े और कचरा गंगा का हिस्सा है। पार्किंग स्थल पर भी पानी की तरह फैला है कूड़ा। प्रसिद्ध तीर्थ पेहवा का हाल भी अलग नहीं है। यहां पुलों के नीचे कचरा शान से पसरा हुआ है।

क्या यह सब हमारी बिगड़ी हुई आदतों का कचरा नहीं है जो हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा हो चुका है? कबाड़ हटाने की आदत उगाने के लिए एक सख्त अनुशासन लागू करना ही होगा। हमारे यहां राजनीति चाहे तो कुछ भी करवा सकती है। क्षेत्र के प्रभावोत्पादक व्यक्ति, कर्मठ अध्यापक और अधिकारी, संजीदा पंचायत सदस्य और मेहनती निस्वार्थी पार्षद अगर यह जिम्मेदारी संभाल कर नागरिकों को कूड़ा-कचरा सही तरीके से ठिकाने लगाने का अच्छी तरह अभ्यास करवा दें तो पुराना मुहावरा ‘करत-करत अभ्यास ते जड़मति होत सुजान’ फिर करामात दिखा सकता है।

 

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