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दुनिया मेरे आगे: पैदल से पैदल तक

पैदल से एक मुहावरा बनता है। यह वैसे व्यक्ति पर विशेष रूप से लागू होता है जो जानता तो कुछ नहीं, पर हर काम में टांग अड़ाता है।

Author Published on: November 12, 2019 2:56 AM
गांधीजी की राह दौड़ते चला जाए, दुनिया पीछे भागेगी। इस ‘भागने’ का संदर्भ केवल दौड़ने से नहीं, अनुसरण करने से भी है।

देखा जाए तो हम पैदल चलने वालों से कुछ नहीं सीखते, बल्कि पैदल को कोई अहमियत भी नहीं देते। आता-जाता हर कोई उसे उसकी हैसियत या सीमा बता जाता है। जबकि ऐसा है नहीं। शतरंज के खिलाड़ी खूब जानते हैं ‘पैदल’ को। उसकी चाल किस-किस की राह रोक लेती है, यह गौर करने की बात है। इसके आगे बड़े-बड़े हाथी-घोड़े तक पानी भरते हैं। पैदल से एक मुहावरा बनता है। यह वैसे व्यक्ति पर विशेष रूप से लागू होता है जो जानता तो कुछ नहीं, पर हर काम में टांग अड़ाता है। ऐसे में उसे कह दिया जाता है- ‘क्यों भई? क्या पैदल से हो?’ मजे की बात यह है कि जो खुद ‘पैदल से’ होता है, आमतौर पर वही दूसरे को यह समझता है। ऐसे में कौन असली ‘पैदल से’ है और कौन नकली, उसकी पहचान के लिए एक तीसरे की खोज करनी पड़ती है।

जिया लाल शास्त्री हमारे पड़ोसी हैं जो एक स्कूल में शिक्षक भी हैं। उनका स्कूल तो दिल्ली के जामा मस्जिद इलाके में है, लेकिन वे बस से अक्सर दो किलोमीटर पहले उतर जाते हैं। एक दिन हमने पूछा- ‘मास्टरजी, आपको जामा मस्जिद बस स्टैंड पर उतरना चाहिए, पर आप उससे काफी पहले क्यों उतर जाते हैं?’ वे मुस्कराए, फिर बोल पड़े- ‘ये अपना स्टाइल है। हालांकि किराया बराबर ही लगता है, लेकिन असल में मैं पहले इसलिए उतर जाता हूं, ताकि कुछ दूर पैदल चल सकूं। पैदल चलने का एक अलग ही आनंद है। इधर-उधर देखते हुए चलो। रास्ते में कुछ पसंद आ जाए या दिख जाए तो उसे खरीद लो।’
इस क्रम में कई बार ऐसे मित्र-परिचित भी मिल जाते हैं जो सालों से नहीं मिले। जिनका अता-पता नहीं था। चूंकि दोनों ही पैदल होते हैं, इसलिए मिल गए। यों भी, डॉक्टर साहब कहा करते हैं- ‘आपका पेट बाहर आ रहा है। आप पैदल चला करें। कम से कम पांच किलोमीटर चलेंगे तो आपके लिए अच्छा है। वजन घटेगा और दवाइयां भी कम लेनी पड़ेंगी। जेब को आराम मिलेगा, वह अलग। खरीदारी की दिशा और दशा बदल जाएगी।’ हम डॉक्टर साहब को देख कर मुस्करा उठे। उनकी ताकीद तो समझ में आ रही थी, पर यह हमारी समझ से परे था कि ये बातें वे खुद पर क्यों नहीं आजमाते! लेकिन मैं चुप रहा। डॉक्टर साहब से पंगा कौन ले!

हालांकि कहते हैं कि पैदल चलने वाले कभी मोटे नहीं होते, न ही उनका पेट बाहर निकलता है। गांधीजी की राह दौड़ते चला जाए, दुनिया पीछे भागेगी। इस ‘भागने’ का संदर्भ केवल दौड़ने से नहीं, अनुसरण करने से भी है। इसमें अगर पैदल चलना है तो यह जोड़ा जा सकता है कि पैदल के पंजे जमीन के समांतर चलें, ऊपर उठने न पाएं, वरना पैदल-राग अधूरा। जमीनी व्यक्ति और हवाबाज व्यक्ति का चलन हमेशा विपरीत होता है। उसी के मुताबिक एक जमीन पर रह कर दूसरों को जमीन सुंघा सकता है। जबकि आसमान में उड़ने वाला जब भी जमीन पर आता है तो उसके अंजर-पंजर सब हिले होते हैं। ऊपर से और यह कह दिया जाता है- ‘जनाब, बड़ी देर कर दी आपने जमीं पर आते-आते।’ एक जमाना था। हमारी सेना में पैदल सैनिक बहुत संख्या में थे। गांव भर के युवा जन सब सेना में कूच कर रहे होते थे। नए बच्चों को वैसे भी खेती से कम ही लगाव रहता है। ये बच्चे महत्त्व देते हैं देश को। देश की खातिर खेत होने से बिल्कुल भी डरते नहीं।

यह तो अच्छा हो गया इस वैज्ञानिक युग में। आपस की लड़ाइयां अब पैदल की न होकर हवाई-हवाई हो गई हैं। कुछ देश अपने आकार में बहुत छोटे हैं। लेकिन बात-बेबात पर बेलगाम होते रहते हैं। छोटे होने के बावजूद खुद को बहुत बड़ा तीसमार खां समझते हैं, अपने पास रखे हथियारों के बल पर। कहते हैं, कमजोर के हाथ कोई असलहा पड़ जाए तो वह अपने को बहुत बड़ा पहलवान समझने लग जाता है। जबकि असल में उसके हमदर्द देश समझाते हैं उसे। वे जानते हैं कि जो खुद ‘पैदल से’ है, वह क्या निकालेगा दूसरे की हवा! आज के समय में सब जान रहे हैं कि टकराव का अर्थ है युद्ध, बल्कि महायुद्ध। एक बटन दबा नहीं कि चारों तरफ धमाका और आग। इसलिए चलते रहना चाहिए पैदल। दूसरों को भी चलाते रहना चाहिए। पैदल का जमाना बहुत पुराना है और आगे भी उसका जमाना आएगा।

कभी हम दस किलोमीटर की दूरी भी पैदल तय कर लेते थे। तब पुराना जमाना था और नई उमर थी हमारी। आज हमारी उम्र नहीं रही और जमाना नया हो गया। पहले साधन सीमित हुआ करते थे, अब बिल्कुल सब नया-नया। दुनिया चांद पर पहुंच गई और हम ‘पैदल से’ खड़े हैं अपना सिर खुजाते। यानी आप कह सकते हैं कि हम अभी भी वहीं ठहरे हुए हैं- पैदल से पैदल तक।

विप्रम

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