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दुनिया मेरे आगे: हाशिये पर विवेक

हाल में कुछ दिलचस्प घटनाएं घटी हैं। चंदौली के नौगढ़ में पहले कुछ ग्रामीणों ने दो विक्षिप्त युवकों को बच्चा चोर समझ कर पीटा और फिर पुलिस को सौंप दिया।

Author Published on: September 18, 2019 3:44 AM
सांकेतिक तस्वीर।

कुमार विजय
चोरी गए बच्चे किनके थे या ऐसे बच्चे कहां से गायब हुए? चुराए गए या गुम हुए बच्चों के बारे में पहले की तरह चिंता क्यों नहीं जताई जा रही या यह बहस का विषय क्यों नहीं बन रहीं? ऐसे सवाल मन में उठना लाजिमी है। खासतौर पर तब, जब सोशल मीडिया के ताकतवर अंग- वाट्सऐप पर लगातार बच्चा-चोर गिरोहों की सूचनाएं तैर रही हों, जिनके शिकार वे तमाम निरीह और कमजोर लोग बनाए जा रहे हों, जिन्हें शहरों में पहचानने वाले लोग बमुश्किल हों। जाहिर है, ऐसे अजनबी और रोजी-रोजगार की तलाश में अपना गांव-घर छोड़ कर शहरों की ओर निकले बेसहारा भूखे-प्यासे लोगों को भला कोई क्यों पहचानने लगा! यहां तक तो बात समझ में आती है। लेकिन जब खून के रिश्ते के बहुत निकट के परिजन दादा-दादी और पिता बताए जाने पर भी लोग मानने और पहचानने को तैयार न हों, तो भला ऐसी अविवेकी भीड़ को क्या कहेंगे!

मामले का एक दिलचस्प पहलू यह है कि बच्चा-चोरी की अफवाहों को लेकर गली-मुहल्लों में भी खूब रस लेकर चर्चा में मशगूल लोगों से अगर आप पूछिए कि क्या इस दौरान किसी के बच्चे के चोरी होने या लापता होने की ऐसी खबरें मीडिया में आपने देखी हैं तो उन लोगों के पास इसका कोई जवाब नहीं होता। जाहिर है जाने-अनजाने ऐसे लोग भी अफवाहों को हवा ही देते हैं, जिससे उन अभिभावकों की भी चिंता बढ़ती है, जिनके बच्चे स्कूल जाते हैं।

बहरहाल, अभी तक यही माना जा रहा था कि यह बेरोजगार ऊबे और पूरी तरह बेकार खाली बैठे कस्बाई नौजवानों का अपनी ऊब मिटाने और ‘साहस’ जीने का एक शगल हो सकता है, जैसा कि मनोवैज्ञानिकों का मानना है। लेकिन देश के अलग-अलग राज्यों के शहरों-कस्बों में जितनी तेजी से ये घटनाएं घट रही हैं, उनका चलन काफी कुछ भीड़-हिंसा की तरह रहा है। पहले बहाना गाय बनी थी, अब निरीह बच्चे बन रहे हैं। लेकिन इसकी चिंता किसी को है, ऐसा प्रतीत नहीं होता। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश में तो एक ही दिन छह शहरों में ऐसी घटनाएं हुईं। पुलिस प्रशासन अब जाकर हरकत में आया है कि किसी संदिग्ध बच्चा चोर के पाए जाने पर कानून अपने हाथ में न लें, पुलिस को सूचित करें। कई जगह यह भी हुआ है कि कुछ गिरफ्तारियां भी हुईं तो कुछ मामलों में अज्ञात लोगों के विरुद्ध मामले दर्ज किए गए। अच्छी बात है। लेकिन वाट्सऐप के उन अफवाह वीरों का क्या? क्या उन पर भी कोई कार्रवाई वांछित हो सकती है? कुछ निषेधात्मक कदम उठाए जा सकते हैं? उन पर कोई साइबर कानून लागू हो सकते हैं? अगर हां, तो अब बिना देर किए इन्हें लागू किया जाना चाहिए।

हाल में कुछ दिलचस्प घटनाएं घटी हैं। चंदौली के नौगढ़ में पहले कुछ ग्रामीणों ने दो विक्षिप्त युवकों को बच्चा चोर समझ कर पीटा और फिर पुलिस को सौंप दिया। पुलिस की पूछताछ में खुलासा हुआ कि दोनों विक्षिप्त घर से भटके थे। दोनों में एक बीस साल पहले घर से निकला हरदोई का दिनेश था तो दूसरा बलिया से बारह साल पहले भटका बीरबल। इनके मिल जाने पर, जाहिर है परिजन खुश हो गए और इसे कुदरत का करिश्मा माना। यहां तक तो ठीक। लेकिन उन्हें निरपराध पीटने वाले ग्रामीणों का क्या हुआ?

अक्सर खबरों में बताया गया है कि ऐसी घटनाओं के शिकार अमूमन वे लोग हो रहे हैं, जो देखने में दीन-हीन और विक्षिप्त लगते हैं। लेकिन ऐसे लोगों को क्या कहेंगे, जो बिना कुछ जाने-समझे इन्हें पीट रहे हैं? कहीं हम एक अवसादग्रस्त समाज तो नहीं बनते जा रहे हैं? कुछ समय पहले एक घटना सोनभद्र में घटी, जिसमें अपनी छोटी बच्ची को गोद से उतार कर गाड़ी में बिठाते हुए एक पिता बच्चा चोर का शोर मचा कर पीटा गया। गनीमत यह थी कि उसी क्षेत्र में रहने वाले उस ‘भाग्यशाली’ पिता को कुछ लोग पहचानते थे। इस तरह वह आगे की और पिटाई से बच गया। मगर मामले में एक नया कोण यह उपस्थित हुआ कि पिता को चोर बता कर पीटने की पहल करने वाले दंपति पड़ोस के ही गांव के थे, जिनके विरुद्ध कार्रवाई के लिए पिता ने पुलिस को तहरीर दी। जाहिर है, यह घटना किसी रंजिश या साजिश का नतीजा भी हो सकती है।

यानी ऐसी घटनाएं अब नए मोड़ ले रही हैं। आगे कैसे-कैसे और कितने कोण जुड़ सकते हैं, इसकी कल्पना भी भयावह हो सकती है। इसलिए इन्हें महज युवाओं के खालीपन या ऊब मिटाने के ‘साहस’ का शगल मान कर उपेक्षा करना घातक होगा। दूसरी ओर उपेक्षित और निरीह किस्म के लोगों के प्रति समाज को भी थोड़ा संवेदनशील बनना होगा। मौके पर हस्तक्षेप की पहल करनी होगी। आवश्यक होने पर कानून व्यवस्था के लिए जिम्मेदार पुलिस को सूचना देनी होगी, तभी हम एक संवेदनशील समाज बन सकेंगे और ऐसी हवा-हवाई बहानों का शिकार बनने वाले मासूम लोगों को शायद बचा भी पाएंगे। किसी जिम्मेदार समाज के लिए यह जरूरी भी है।

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