ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे: संवादहीनता के मंच

विद्वानों का कहना है कि समय से पहले अधकचरा ज्ञान विनाश का कारण है। यह हमारे समाज में हो रहा है। हम अखबारों में पढ़ते हैं कि चार साल या छठी कक्षा के बच्चे अनुचित आचरण करते हैं। सच यह है कि इस उम्र के बच्चों को उचित और अनुचित का अर्थ ही नहीं पता होता।

Author Published on: June 27, 2019 2:14 AM
घरों में हंसी के ठहाके और बहस की आवाजें गायब हो गई है।

अमिता तिवारी

सूचना, संप्रेषण और संचार का दायरा आज कितना व्यापक हो चुका है, यह किसी से छिपा नहीं है। दरअसल, अब यह हमारी जीवन-चर्या का हिस्सा बन गया है। इसकी शुरुआत शायद एक उदात्त उद्देश्य के तहत हुई थी कि अधिक से अधिक लोग एक दूसरे से जुड़ सकें, एक दूसरे के विचारों के बारे में जान सकें और जानकारी का विस्तार हो। एक हद तक सोशल मीडिया अपने इस उद्देश्य में सफल भी है। आज दुनिया का ज्यादातर हिस्सा फेसबुक, इंटरनेट, इंस्ट्राग्राम और वाट्सऐप के जरिए जुड़ चुका है। हम घर बैठे अमेरिका में बैठे अपने मित्र या संबंधी को अपनी दिनचर्या के बारे में बताते हैं, फोटो भेजते हैं, वीडियो पर भी एक दूसरे से बात कर लेते हैं, कितनी सारी सूचनाएं दे देते हैं। लेकिन अब ऐसा लगने लगा है कि सामाजिकता की जिस नींव पर सोशल मीडिया का भवन खड़ा था, वह नींव कहीं धसक गई है और ऐसे में भवन का भरभरा कर गिरना स्वाभाविक है।

आज सामाजिकता के नाम पर सोशल मीडिया द्वेष और लोगों के बीच दूरी की भावना फैलाने का बड़ा जरिया बन रहा है। एक मानसिकता और विचारधारा वाले लोगों के गुट बन गए हैं जो केवल जहर उगल रहे हैं, जिससे समाज विषाक्त हो रहा है। एक घटना कहीं घटती है, उसे तोड़-मरोड़ कर सोशल मीडिया पर पेश किया जाता है और उसकी तह में जाने की बजाय लोग उसे सही समझ कर मर-मिटने को तैयार हो जाते हैं।

पुरानी कहावत है कि किसी ने कह दिया कि कौवा कान ले गया तो लोग अपना कान न देख कर कौवे के पीछे भागने लगते हैं। आज यही सोशल मीडिया पर भी देखा जा सकता है। एक आदमी एक पंक्ति की पोस्ट डालता है और उससे असहमत होने वाले लोग गालियों की बौछार कर देते हैं। ऐसा ही दूसरी ओर से भी होता है। इससे हमारा समाज कौन-सी सामाजिकता सीख रहा है? इससे कौन-सी सद्भावना बढ़ रही है, कौन-सी मानवीयता पल्लवित, पोषित हो रही है? सच तो यह है कि सोशल मीडिया अब अभिव्यक्ति के नाम पर अनर्गल प्रलाप का माध्यम बन गया है।

सोशल मीडिया का उद्देश्य तो आपसी भाईचारा और मेलजोल बढ़ाना था, लेकिन आज परिवार और समाज में अकेलेपन की प्रवृत्ति बढ़ रही है। अगर घर में चार सदस्य हैं तो शाम को दफ्तर से आने के बाद चारों अलग-अलग दिशाओं में बैठ कर अपने-अपने स्मार्टफोन में व्यस्त हो जाते हैं। एक दूसरे से बातचीत में उन्हें वह आनंद नहीं आता जो फेसबुक और वाट्सऐप पर आता है। यानी इसने हमारे पारिवारिक और सामाजिक रिश्तो में संवादहीनता की स्थिति उत्पन्न कर दी है।

आज घरों में हंसी के ठहाके और बहस की आवाजें गायब हो गई है। हर व्यक्ति अपने आप में अकेले बैठना चाहता है और यह अकेलापन ही तनाव, अवसाद, मानसिक विकृति को बढ़ाता है, जिसका शिकार हमारा युवा वर्ग हो रहा है। पहले व्यक्ति अवसाद से घिरता था तो परिवार के सदस्यों और आत्मीय मित्रों से अपना दुख बांटता था और कई बार गंभीर स्थितियों से वह सकुशल निकल भी जाता था। मगर आज आत्मीयता की वह डोर टूट गई है। इस वजह से किशोरों और युवाओं में आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ रही है। ब्रिटेन में युवाओं पर हुए एक शोध के मुताबिक जो युवा सोशल मीडिया पर ज्यादा काम करते हैं, वे खुद पर ज्यादा दबाव तो महसूस करते ही हैं, साथ ही वे सामाजिक रूप से भी दूसरों से कटे रहते हैं।

यह चिंताजनक है कि सोशल मीडिया का बुरा प्रभाव बच्चों पर भी पड़ रहा है। एक शोध के मुताबिक दस साल तक के जो बच्चे सोशल मीडिया पर रोज एक घंटे से ज्यादा समय बिताते हैं, उनमें किशोरावस्था में दिमागी परेशानी का खतरा बढ़ जाता है। किशोरों में बढ़ती अक्रामकता, उद्दंडता, मूल्यहीनता और हिंसक प्रवृत्ति का एक कारण यह भी है कि सोशल मीडिया पर वे सब जानकारियां भी मौजूद हैं जो बच्चों को एक उम्र के बाद ही मिलनी चाहिए।

विद्वानों का कहना है कि समय से पहले अधकचरा ज्ञान विनाश का कारण है। यह हमारे समाज में हो रहा है। हम अखबारों में पढ़ते हैं कि चार साल या छठी कक्षा के बच्चे अनुचित आचरण करते हैं। सच यह है कि इस उम्र के बच्चों को उचित और अनुचित का अर्थ ही नहीं पता होता। वे जैसा देखते हैं, वैसा ही आचरण करते हैं। ऐसी स्थिति में गलत आचरण के लिए वह बच्चा नहीं, बल्कि समाज दोषी है, जिसने वह अधकचरा ज्ञान उसे उम्र से पहले दे दिया। आज अभिभावक अपने छोटे बच्चों को मोबाइल फोन पकड़ा कर यह बताने में गौरवान्वित महसूस करते हैं कि मेरा बच्चा अभी दो साल का है, लेकिन मोबाइल चला लेता है… यूट्यूब खोल लेता है। लेकिन इसका असर या हासिल क्या है?

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

X
Next Stories
1 दुनिया मेरे आगे: उम्मीद के साथ
2 दुनिया मेरे आगे: सामूहिकता का संदेश
3 पर्यावरण के दोस्त
ये पढ़ा क्या?
X