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दुनिया मेरे आगे: युद्ध की आग

दुनिया भर का इतिहास युद्ध के रक्तरंजित किस्सों से भरा हुआ है। इन किस्सों की कहानियां साहित्य का भी महत्त्वपूर्ण अंग बन चुकी हैं। बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में ही दुनिया ने पहला विश्व युद्ध देख लिया था।

Author Published on: March 19, 2019 3:53 AM
भारतीय वायुसेना ने बीते 26 फरवरी को पाकिस्तान में एयर स्ट्राइक किया था। (Photo: AP)

रजनीश जैन

भारत में बंटवारे के बाद से ही युद्ध की विभीषिका पर फिल्में बनती रही हैं और साहित्य लिखा जाता रहा है। बहुत सारे वरिष्ठ साहित्यकारों ने बंटवारे के दौरान भोगे गए यथार्थ को अपने शब्द दिए हैं। आतंक, उत्पीड़न और नफरत से जानवर बनते मनुष्य के उदाहरणों के दृश्यों, शब्दों से गुजरते हुए साठ या सत्तर के दशक के बाद जन्मा वह पाठक भी सिहर जाता है, जिसने बंटवारे को देखा नहीं है, सिर्फ सुना है। खुशवंत सिंह की कृति ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’, भीष्म साहनी की ‘तमस’ और अमृता प्रीतम की ‘पिंजर’ जैसी रचनाएं साहित्य होते हुए भी दरअसल ऐतिहासिक दस्तावेज हैं। इन कहानियों को पढ़ते हुए पाठक जिस मानसिक त्रासदी से गुजरता है, उसके बाद वह नफरत शब्द से ही नफरत करने लग जाता है।

इन तीनों ही कृतियों को सिनेमाई माध्यम में बदला गया है और उल्लेखनीय बात यह है कि किताब की ही तरह ये कहानियां परदे पर भी उतना ही सटीक प्रभाव उत्पन्न करने में सफल रही हैं। समय-समय पर बनी युद्ध फिल्मों और देशभक्ति के गीतों ने भी राष्ट्र प्रेम की भावना को बढ़ाने में महती भूमिका निभाई है। हालांकि दर्जनों युद्ध फिल्मों में से कुछ ही फिल्में वास्तविकता और तथ्यों के नजदीक रही हैं। 1964 में चेतन आनंद निर्देशित ‘हकीकत’ चीन के साथ युद्ध की घटनाओं पर आधारित थी। युद्ध को ही केंद्र में रख कर रची गई कुछ फिल्मों में से ‘बॉर्डर’ जेपी दत्ता की सर्वाधिक सफल फिल्म मानी जाती है। इस फिल्म के प्रदर्शन के साथ एक कड़वी याद भी जुड़ी हुई है। 1997 में गरमी के दिनों में दिल्ली के ‘उपहार थिएटर’ में इस फिल्म के प्रदर्शन के दौरान आग लग जाने की वजह से उनसठ दर्शक जान गंवा बैठे थे।

बहरहाल, सिनेमा के पर्दे से हकीकत पर नजर डालें तो रक्षा मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और पाकिस्तान के बीच अगर युद्ध हुआ तो यह विश्व युद्ध का रूप ले लेगा। वे इस बात पर भी जोर देते हैं कि दोनों देश युद्ध को अंतिम विकल्प के रूप में ही चुनना पसंद करेंगे। कुछ समय पहले पुलवामा में सीआरपीएफ के जवानों पर हमले के बाद दोनों देशों की सीमाओं पर जिस तरह की हलचल रही, उससे यह आशंका गहराने लगी थी कि कहीं यह रास्ता युद्ध की तरफ तो नहीं चला जाएगा! मगर स्थितियां बदलीं और बहुत सारे लोगों ने राहत की सांस ली। यों तो भारत और पाकिस्तान के बीच जबानी जंग अक्सर होती रहती है। लेकिन जबानी जंग से आगे अगर युद्ध होता है तो उसके परिणामों का आकलन कर लिया जाना चाहिए। यह पहला ऐसा युद्ध होगा जो सिर्फ सरहद पर नहीं लड़ा जाएगा। देश की सीमाओं से दूर बसे शहरी क्षेत्र इसकी जद में होंगे। नतीजतन, जान-माल के नुकसान का सिर्फ अंदाजा लगाया जा सकता है। यह भी तय है कि हथियारों के ढेर पर बैठे दोनों ही देश अपने सामान्य नागरिकों की हानि स्वीकार नहीं करेंगे।

दुनिया भर का इतिहास युद्ध के रक्तरंजित किस्सों से भरा हुआ है। इन किस्सों की कहानियां साहित्य का भी महत्त्वपूर्ण अंग बन चुकी हैं। बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में ही दुनिया ने पहला विश्व युद्ध देख लिया था। द्वितीय विश्व युद्ध के अंत ने दुनिया को परमाणु बम के प्रभावों से अवगत कराया। लेकिन इतिहास की यही त्रासदी है कि कोई उससे सबक नहीं लेता है। इन युद्धों को केंद्र में रख कर यूरोप और अमेरिका में बहुत अच्छी फिल्में बनी हैं। अकेले हॉलीवुड ने इस विषय पर कई कालजयी फिल्में बनाई हैं। उल्लेखनीय फिल्मों में ‘द ब्रिजेस आॅन रिवर क्वाई’ (1957), ‘द गन्स आॅफ नवरोन’ (1961), ‘द लांगेस्ट डे’ (1962), ‘द ग्रेट एस्केप’ (1963), ‘द पियानिस्ट’ (2002) और ‘हर्ट लॉकर’ (2008 ) जैसी फिल्में युद्ध की विभीषिका और उसके कारण आम नागरिक की शारीरिक और मानसिक यंत्रणा का सटीक चित्रण करती हैं। सन 2001 में ‘लगान’ को परास्त कर आॅस्कर जीतने वाली ‘नो मेंस लैंड’ युद्ध के दौरान सैनिकों की मानसिकता और सरकारों की संवेदनहीनता बगैर लाग-लपेट के उजागर कर देती है।

फ्रेंच भाषा के शब्द ‘देजा वू’ का मतलब है भविष्य को वर्तमान में देख लेना या महसूस कर लेना। मनोविज्ञान के इस भाव को लेकर अमेरिकी टीवी चैनल सीबीएस ने 1958 में विज्ञान फंतासी लेखक रॉड सेरलिंग की कहानियों पर आधारित धारावाहिक ‘द टाइम एलिमेंट’ प्रसारित किया था। कहानी के नायक को आभास हो जाता है कि अगले दिन अमेरिकी नौसेना के बंदरगाह ‘पर्ल हार्बर’ पर जापानी विमान हमला करने वाले हैं। वह सबको सचेत करने की कोशिश करता है, लेकिन कोई उसकी बात पर विश्वास नहीं करता। अगले दिन वाकई हमला होता है और वह भी उस हमले में मारा जाता है। पर्ल हार्बर हादसे के जख्म ने ही अमेरिका को जापान पर परमाणु बम गिराने के लिए मजबूर किया था। यह ऐसा युद्ध था, जिसके निशान मानव जाति के शरीर और उसकी आत्मा दोनों पर नजर आते हैं।

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