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दुनिया मेरे आगे: झगड़े की खुशबू

वाद-विवाद होने पर सबसे पहले अशांति पैदा होती है। शांति की कामना करने वाले थोड़े होते हैं और वहां खड़ा होने वाले तमाशे का मजा लेने वाले अधिक होते हैं।

Author नई दिल्ली | August 13, 2019 4:09 AM
सांकेतिक तस्वीर।

रमाशंकर श्रीवास्तव

वे चुप थे। मैंने पूछा कि क्या बात है… आज आप इतने उदास क्यों हैं! आप तो हमेशा खुशदिल रहते हैं तो उन्होंने कहा कि इस जिंदगी से ऊब गया हूं। जहां देखिए वहीं कोई न कोई झगड़ा-फसाद। न दफ्तर में राहत और न बाहर मुक्ति। घर आया तो मेरी पत्नी मायके जाने की तैयारी में थीं। पता चला कि उनके पिता जमीन-जायदाद के झगड़े में फंस गए हैं और उनकी तबीयत खराब है। उनके यह दुख जाहिर करने के बाद मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की, मगर उनकी मन:स्थिति नहीं बदली। मैंने अपने बारे में सोचा और याद किया कि कल शाम अगर मैं संयम नहीं बरतता तो मेरा झगड़ा बढ़ जाता। उनका कुत्ता सुबह-सुबह मेरे ही दरवाजे के सामने आकर अपने नित्यकर्म से मुक्ति पाता है। मैंने विरोध किया तो वे बोले कि वह पशु है, उसके मन का हाल मैं क्या बताऊं! यह सब चल रहा था कि आसपास के दो-चार लोग हमारी बातचीत सुनने आ गए। उन्हें शायद यह उम्मीद थी कि बात आगे बढ़ेगी। मगर मैंने प्रयास किया तो बात वहीं दब गई। सुनने की उम्मीद में आए लोग निराश होकर लौट गए।

जीवन में किन बातों पर लड़ाई-झगड़े खड़े हो जाएं, पता नहीं चलता। हम अपने बच्चों को समझाते हैं कि झगड़े मत किया करो, मगर जब स्वार्थ पर चोट पहुंचती है तो लड़ ही पड़ते हैं। ज्यादातर झगड़े का कारण स्वार्थ पर चोट ही है। इसमें अहं की भावना प्रबल होती है। कोई क्यों हमारी भावना को ठेस पहुंचाता है, बात बढ़ती है और झगड़ा हो जाता है? लड़ाई-झगड़ा दो पक्षों के बीच होता है और दर्शक पचासों आ खड़े होते हैं। दर्शकों में शायद ही ऐसे दो-चार मिलें जो चाहते हों कि झगड़ा किसी तरह खत्म हो और शांति कायम हो जाए।

वाद-विवाद होने पर सबसे पहले अशांति पैदा होती है। शांति की कामना करने वाले थोड़े होते हैं और वहां खड़ा होने वाले तमाशे का मजा लेने वाले अधिक होते हैं। हम कल्पना करने लगते हैं कि अमुक तो अमुक को परास्त कर देगा। उसकी क्या औकात, वह तो पहलवान है। गर्दन पर बस एक मुक्का मारा कि दूसरे सज्जन चित्त। इसी उठा-पटक में दुनिया के धंधे चल रहे हैं। भूखे शिशु के रुदन से लेकर छोटे-बड़े देशों की भूमि सीमा पर झगड़े-विवाद हमेशा रहते हैं। सीमाओं के विवाद सौ-सौ साल भी पुराने हो जाते हैं। पूरे राष्ट्र की बौद्धिक, राजनीतिक और आर्थिक ऊर्जा-संपदा खर्च होती चलती है और झगड़े खत्म नहीं होते।

आप टीवी के सामने समाचार जानने के लिए बैठे हैं, लेकिन देखते हैं कि उनमें क्षेत्र और दल विशेष के प्रतिनिधि योद्धा की तरह मुस्तैद हैं। तर्कों से लड़ाई-झगड़े इस कदर बढ़ते जाते हैं कि मुख्य मुद्दा पीछे छूट जाता है और आपके कान झनझनाने लगते हैं। दलीलों की उठा-पटक में जो सफल होता है उसकी कद्र अपनी पार्टी में बढ़ जाती है।

ये झगड़े फूलों की खुशबू की तरह हमारे जीवन में गमकते रहते हैं। जहाज, ट्रेन, बस, बाजार, दफ्तर, स्कूल जहां जाइए आपको इसकी खुशबू लुभाएगी। यह खुशबू जिज्ञासा पैदा करती है कि झगड़े की जड़ में क्या है। क्या जायज है और क्या नाजायज। इन्हीं के बीच कानून की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। झगड़े नहीं होते तो ये कोर्ट-कचहरी कैसे फूलते-फलते! जमीन-जायदाद, रुपए-पैसे, मकान, अपराध तरह-तरह के दावे सभी इन लड़ाई-झगड़ों के मूल में हैं। और कभी-कभी मुहल्ले की गलियों में नाली के लिए ताने-बाने। दुश्मनी सिर उठा लेती है।

ऐसे मोर्चे सफलतापूर्वक संभालने वाले सैकड़ों मिल जाएंगे। कुछ का पेशा है, झगड़ा पैदा करना और उसके फैसले में टांग अड़ाना। दूसरों की बेचैनी से वे अपनी वंशी चैन से बजाते हैं। हर गली-मुहल्ले में कुछ औरतें और मर्द ऐसी भूमिकाओं के लिए प्रसिद्ध होते हैं। उनकी दुर्भावनाओं, ईर्ष्या द्वेष-छल कपट का असर दूसरों पर पड़ता है। कुछ पेचीदा झगड़ों को सुलझाने के लिए दूर-दूर से सुलझे हुए लोग बुलाए जाते हैं। साधु-संत, महंथ, प्रवचनकर्ता सुबह-शाम इसी प्रयास में लगे रहते हैं कि मनुष्य का जीवन शांति से बीते। दूसरी ओर, शांति पर प्रवचन के दौरान ही कुछ लोग उसी जनता-जनार्दन में बैठे अशांति की योजनाएं बनाते रहते हैं।

जंगल, जल, खेल-मैदान और मनुष्य समाज में झगड़े की खुशबू फैली होती है। वास्तव में लड़ाई-झगड़ों से मुक्त समाज के निर्माण के लिए युगों से चिंतक-दार्शनिक प्रयास में लगे हैं। बड़े ग्रंथों के विचार उद्धृत किए जाते हैं। तब भी अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाती। हमें पुष्प गंध चाहिए जो जीवन-धारा बदल दे। जीने का सुख और आनंद प्रदान करे। जीवन बोझिल न बने और उस सुगंध के लिए लोग लालायित रहें। झगड़े हमारा कल्याण नहीं कर सकते। उस आदर्श स्थिति में जीने के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहें, तो लक्ष्य पाना कठिन नहीं है। हमें वह खुशबू चाहिए जो हमारी अपनी वास्तविकता की पहचान करा सके।

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