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दुनिया मेरे आगे: भय की परीक्षा

मेडिकल शिक्षा में तो हाल बहुत बुरा है। अगर किसी की जेब में एक करोड़ रुपए खर्च करने की ताकत है तो एक चिकित्सक मात्र तीन सौ नंबर लाकर भी चिकित्सक बन रहा है।

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अतुल चतुर्वेदी

इन दिनों देश के ज्यादातर हिस्से में परीक्षाएं चल रही हैं। परीक्षा को लेकर हमारे यहां एक विचित्र मानसिकता प्रचलित है। इसमें कुछ दोष हमारी शिक्षा प्रणाली का है तो कुछ हमारे समाज का भी। विद्यार्थी की भूमिका केंद्र में होनी चाहिए, लेकिन वह या तो परिधि पर है या हाशिये पर। उसको वह सब कुछ चुपचाप ग्रहण करना है जो देश के नीति-नियंता बनाते हैं या बड़े-बड़े शिक्षाविद् बंद कमरे में बैठ कर तय करते हैं। शिक्षा नीतियों के साथ खिलवाड़ करना कमोबेश हर नई सरकार का शगल रहा है। वे अपनी राजनीतिक विचारधारा के हिसाब से पाठ्यक्रम तय करती आई हैं। कभी ‘राग दरबारी’ में श्रीलाल शुक्ल ने व्यंग्य करते हुए लिखा था कि हमारे देश में शिक्षा व्यवस्था सड़क पर बैठी हुई कुतिया है, जिसे आते-जाते हर राजनेता अपने प्रयोग की लात टिका जाता है। देश में दशकों से यही हो रहा है। परीक्षा पढ़े हुए को जांचने का एक सोपान मात्र है, लेकिन स्कूली जीवन से ही अध्यापक और स्कूलों का व्यावसायिक वातावरण उसमें अनजाने एक भय का संचार कर देता है। एक किस्म का ‘फोबिया’ बच्चे के दिमाग में बना दिया जाता है।

दरअसल, भय को बेचना आसान है। उससे शिक्षा की दुकानें तथाकथित स्कूल, कोचिंग आदि बेहतर चलते हैं। परीक्षा के दिन आते ही घरों में कर्फ्यू-सी स्थिति हो जाती है। संवाद बंद हो जाते हैं, सहज जीवन गायब हो जाता है। मेहमान बोझ लगने लगते हैं। बच्चे को एक कैदी की तरह बरता जाता है। उसकी दिनचर्या पर कड़ी नजर रखी जाती है। उसके खेलने-खाने और दोस्तों के साथ संवाद तक पर टोका-टोकी होती रहती है। ऐसी स्थिति में एक सामान्य बच्चा कैसे परीक्षा में उत्कृष्ट या सहज प्रदर्शन कर सकता है! इन्हीं तनावों के चलते विद्यार्थी परीक्षाओं में अपना वह प्रदर्शन भी नहीं दोहरा पाते जो सामान्यत: वे कक्षाओं में दे रहे होते हैं। मैं ऐसे कई विद्यार्थियों को जानता हूं जो कक्षाओं की जांच परीक्षा में अच्छा करते हैं, नियमित गृहकार्य भी करते हैं, लेकिन मुख्य परीक्षा में उनके हाथ-पांव फूल जाते हैं।

हमने अपनी परीक्षा प्रणाली को रट्टू बना दिया है। करीब तीन घंटे के प्रश्न-पत्र में उससे हम पच्चीस से तीस प्रश्नों के उत्तर की उम्मीद रखते हैं और उसी पर उसकी वार्षिक योग्यता का निर्धारण कर दिया जाता है। कुछ वर्ष पहले तक जेईई मुख्य तक की परीक्षा में बारहवी के अंकों का प्रतिशत तक जोड़ा जा रहा था, भले ही प्रतियोगी परीक्षा में उसके नंबर कितने भी अच्छे आए हों। आज भी सत्रों के नंबरों का प्रतिशत मात्र दस के लगभग ही है। वह भी कुछ राज्यों के बोर्ड में। सीबीएसई इसे बारहवीं के स्तर पर स्वीकार नहीं कर सकी है। प्रायोगिक परीक्षाएं अनिवार्य हैं कुछ विषयों में, लेकिन उनके प्रतिशत का भार कम होना चाहिए। परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से उनसे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है और अभिभावक की जेब काटी जाती है।

मुश्किल यह भी है कि हमारे देश में नियोक्ता भी डिग्री को ही महत्त्व देते हैं, न कि प्रायोगिक ज्ञान को। उच्च शिक्षा के संस्थान महज धन उगाही के केंद्र बन गए हैं। कम प्रतिशत के छात्र-छात्राएं वहां पैसे की ताकत पर प्रवेश ले लेते हैं और विषय ज्ञान में सिफर ही रह जाते हैं। मेडिकल शिक्षा में तो हाल बहुत बुरा है। अगर किसी की जेब में एक करोड़ रुपए खर्च करने की ताकत है तो एक चिकित्सक मात्र तीन सौ नंबर लाकर भी चिकित्सक बन रहा है। इस तरह के चिकित्सक और इंजीनियर हमारे देश का क्या उद्धार करेंगे? सही मायने में शिक्षा और रोजगार को लेकर गहन और व्यापक विमर्श की जरूरत है, लेकिन शिक्षा पर महज तीन या चार प्रतिशत खर्च करने वाली सरकारें क्या सार्थक कदम उठा पाएंगी, यह सोचना सहज संभव है। आज भी देश को लगभग पंद्रह सौ विश्वविद्यालयों की आवश्यकता है। दस लाख के करीब प्रारंभिक कक्षाओं के ऐसे शिक्षक चाहिए, जिनमें अध्ययन और अध्यापन के प्रति निरंतर लगाव हो, ज्ञान की पिपासा हो, न कि रोजगार की तलाश में आए हुए मजबूरन शरणार्थी।

संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था पर जब विचार होगा तो परीक्षा प्रणाली भी इसके दायरे में आएगी और कुछ नया रचनात्मक हो सकेगा, जो एक संपूर्ण शिक्षित नागरिक का निर्माण कर सकेगा। परीक्षा में बहुविकल्पी प्रश्न पूछे जाएं, प्रोजेक्ट रिपोर्ट आदि पर रस्मअदायगी न की जाए, तभी कुछ बेहतर परिणाम दिखाई देंगे। परीक्षा को माता-पिता अंकों के खेल में पड़ कर प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनाएं। हमारे औद्योगिक संस्थान और सार्वजनिक उपक्रम ज्ञान का परीक्षण करें, न कि उसके अंकों से धारणा बनाएं। तभी तस्वीर का पहलू बदल सकता है और परीक्षा का भय जो तारी है, कुछ हल्का हो सकता है। वरना मेरे ‘कोचिंग शहर’ कोटा की तरह विद्यार्थी आत्महत्या करते रहेंगे और उनके सपने टूटते रहेंगे। सीबीएसई और दूसरे बोर्ड को भी काउंसलर की नियुक्ति स्कूलों में अनिवार्य करनी चाहिए। परीक्षा को ज्ञान परखने का माध्यम मात्र समझा जाए, न कि श्रेष्ठता की अंधी दौड़।

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