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दुनिया मेरे आगे: बाजार में नैतिकता

बाजार ने संबंधों में खुलेपन के नाम पर लगातार जिस तरह की अपेक्षाओं को विकसित करने की कोशिश की है, उसमें पोर्न इंडस्ट्री या अश्लील फिल्मों के कारोबार ने प्रभावी भूमिका निभाई है।

Author June 11, 2019 2:04 AM
बाजार मानव जीवन की निजता में न घुसने पाए।

सन्नी कुमार

कोई संदेश अपने आप में कितना भी निर्दोष या बेहतरीन क्यों न हो, लेकिन संदिग्ध संदेशवाहक उसके औचित्य को संदेहास्पद बना ही देता है। मसलन, कोई हथियार सौदागर शांति के महत्त्व पर भले ही खूब अच्छी बातें कर लेता हो, मगर इस मामले में उसकी नैतिकता संदिग्ध ही रहेगी, क्योंकि उसका व्यापार ही शांति के विरोध में है। इसी प्रकार, जब बाजार की कोई एजेंसी स्त्री समानता जैसे ‘बोझ’ को अपने कंधे पर ढोने का दावा करती है तो स्वाभाविक रूप से उसकी नीयत पर शक होता है। जिसका अस्तित्व ही स्त्रियों के वस्तुकरण पर टिका है, वह आखिर क्यों इसके विरुद्ध काम करेगा! दरअसल, आजकल ‘कॉन्ट्रासेप्टिव’ बनाने वाली एक कंपनी ‘ऑर्गेज्म इनइक्वलिटी’ को लेकर अभियान चला रही है। हालांकि पश्चिमी देशों में काफी समय से इसे लेकर बात हो रही है। लेकिन ताजा अभियान का केंद्र जिनके हाथों में है, उसमें इसके उद्देश्य को लेकर कुछ संशय स्वाभाविक है। इस संदर्भ में बरबस एक प्रसंग याद आता है।
बीसवीं सदी के शुरुआती दशक में पश्चिमी दुनिया नारीवाद की पहली लहर महसूस कर रही थी।

इसी दौर में वहां ‘टॉर्च ऑफ फ्रीडम’ नाम से एक आंदोलन चला जो स्त्री-पुरुष समानता स्थापित करने के उद्देश्य से स्त्रियों में धूम्रपान को बढ़ावा देने की बात करता था। इस आंदोलन का मानना था कि ऐसा करने से उस ‘सामाजिक निषेध’ का प्रतिकार होगा जहां सिगरेट पीना पुरुषों के लिए ठीक, पर महिलाओं के लिए बुरा माना जाता था। स्त्रियां हाथ में जलती सिगरेट लेकर जुलूस निकालती थीं और इसे ‘अधिकारों की मशाल’ भी कहा गया। अब इस मशाल से स्त्रियों की दुनिया जगमगाई या उनका देह ही जली, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। मगर एक यह तथ्य उस समूचे आंदोलन को सवालों के घेरे में खड़ा करता है कि इस आंदोलन को हवा देने वाला एडवर्ड बर्नेस ऐसा किसी समानता को प्राप्त करने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि एक सिगरेट कंपनी की बिक्री बढ़ाने के लिए कर रहा था। इसका उद्देश्य समानता स्थापित करना नहीं था। इसी तरह, वर्तमान में जब बाजार की एजेंसी कोई दावा कर रही है तो उसे सही परिप्रेक्ष्य में देखना जरूरी हो जाता है।

दरअसल, समय के साथ बाजारवाद ने अपने हिसाब से मानव जीवन के मानक को निर्मित कर देने में काफी सफलता प्राप्त कर ली है। विषुवतीय प्रदेश के लोगों में गोरा होने को सुंदर होने का पर्याय माने जाने का सौंदर्यबोध विकसित करना हो या आमतौर पर ‘फिट’ होने के नाम पर स्वस्थ शरीर को एक विशेष आकार में ढली शारीरिक संरचना से प्रतिस्थापित कर देना हो, बाजारवाद की सफलता चारों ओर देखी जा सकती है। दिलचस्प है कि बाजारवाद अपने ऐसे हर कदम का औचित्य सिद्ध करने के लिए कोई न कोई नैतिक सहारा अवश्य लेता है। कभी यह सुंदरता, कभी स्वस्थ जीवन तो कभी रूढ़ियों के निषेध की ओट में यह अपना हित साधने की कोशिश करता है। इसी तरह, यौन विषयों से संबंधित अपने उत्पाद की बिक्री का औचित्य सिद्ध करने के लिए वह इसे लेकर प्रचारित भ्रांतियों को दूर करने का दावा करता है। यह ठीक है कि भारत जैसे देश में अभी भी यौन विषयों पर अपेक्षित सहजता नहीं है, लेकिन इसे ठीक करने का जिम्मा उन्हें नहीं दिया जाना चाहिए, जिनका उद्देश्य भ्रांतियों का शमन नहीं, उत्पाद बेचना हो या उसके लिए आधारशिला तैयार करनी हो।

जहां तक ‘ऑर्गेज्म इक्वलिटी’ की धारणा का सवाल है तो यह एक तरह से नितांत निजी मानवीय क्षणों में बाजार के प्रवेश कर जाने जैसा है। यहां इस अंतर को समझना होगा कि इन निजी क्षणों में दोनों जेंडर की समान भागीदारी एक अनिवार्य शर्त है, मगर इसे निर्धारित करने का नैतिक हक बाजार को दे देना एक बिल्कुल नए तरह की समस्या को जन्म देना है। हमें समझना होगा कि एक तरफ जहां सामाजिक रूढ़ियां यौन संबंध में सहमति से लेकर तमाम अन्य पक्षों में स्त्रियों को समानता से वंचित करती हैं तो दूसरी ओर बाजार यौनिक अनुभूति के कृत्रिम मानक बना कर शोषण के नए नियम बनाता है। समानता स्थापित करने के लिए दोनों के चेहरे पर पड़ा पर्दा हटाना होगा। बाजार ने संबंधों में खुलेपन के नाम पर लगातार जिस तरह की अपेक्षाओं को विकसित करने की कोशिश की है, उसमें पोर्न इंडस्ट्री या अश्लील फिल्मों के कारोबार ने प्रभावी भूमिका निभाई है। इसलिए बाजार की ऐसी हर कोशिश को काफी सावधानी से परखने की जरूरत है।

स्त्री-पुरुष के बीच समानता स्थापित करने का दावा करने वाले ऐसे आंदोलन दरअसल मूल प्रश्न तक कभी जाते ही नहीं। दरअसल, इसका सबसे उचित समाधान जीवन के विविध क्षेत्रों और मानसिक दृढ़ता के स्तर पर स्त्री-पुरुष समानता है, ताकि वे अपने हक में बेहतर निर्णय ले सकें, न कि किसी कंपनी का ऐसा मानक, जिसे पाने के लिए उसका उत्पाद खरीदना जरूरी हो जाए। बाजार मानव जीवन की निजता में न घुस पाए, इसके लिए समाज को अपनी भूमिका निभानी पड़ेगी। समाज अपनी भूमिका में जितना कमजोर होगा, बाजार को उतना ही मौका मिलेगा और उसका हस्तक्षेप उतना ही मजबूत होगा। समय के साथ यह नैतिक भी लगने लगेगा।

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