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दुनिया मेरे आगे: प्रबुद्ध भारत की ओर

दूसरी तरफ, वह जिस पूंजीपति के लिए अपना श्रम बेच रहा है, वह पूंजीपति इस देश की तीन-चौथाई से भी ज्यादा पूंजी को हथिया कर बैठा हुआ है। जिसे हम अमीरी और गरीबी की सरल विभाजक रेखा के भीतर विसंगतियां के रूप में पनपता हुआ देख रहे हैं, वह सामूहिक रूप से हमारी समझ से भी बहुत दूर है।

Author May 9, 2019 1:20 AM
भूमंडलीकृत समाज में अमीर और ज्यादा धनपति व गरीब और ज्यादा गरीब होते जा रहे हैं। (express photo)

शचींद्र आर्य

आज के समय में एक मौलिक सवाल यह है कि कोई भी देश कैसे बनता है! इसका मुझे एक जवाब सूझ रहा है और वह है- मेहनत से। कोई अन्य कारक अगर हो सकते हैं तो वे शर्तिया इसके बाद होंगे। हम खुद में ऐसे समाजों का संकुल हैं जो विभेदीकरण करके टिका हुआ है। जाति वह विभेद हममें उत्पन्न करती है। यह सिर्फ श्रम का विभाजन नहीं करती, बल्कि सामाजिक रूप से एक बहुत ही जटिल पदानुक्रम बनाती है, जिसे तोड़ा जाना सतह पर लगभग असंभव लगता है। जाति ने निर्धारित किया है कि कौन-कौन सी जातियां श्रम करेंगी और उनके श्रम पर कौन-सी जातियां सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पूंजी का निर्माण करेंगी। हम अपने चारों तरफ नजर घुमा कर देख सकते हैं कि जिनकी मेहनत पर भारत में पूंजीवाद फला-फूला और जिसने अपनी जड़ें मजबूत कीं, उनका शोषण और दमन अभी तक तक जारी है। यह कैसी विसंगति है कि जो श्रम कर रहा है, वह गंभीर बीमारियों से ग्रस्त है, उसके पास जीवनयापन की मूलभूत जरूरतों को पूरा करने के साधन भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हैं। दूसरी तरफ, वह जिस पूंजीपति के लिए अपना श्रम बेच रहा है, वह पूंजीपति इस देश की तीन-चौथाई से भी ज्यादा पूंजी को हथिया कर बैठा हुआ है। जिसे हम अमीरी और गरीबी की सरल विभाजक रेखा के भीतर विसंगतियां के रूप में पनपता हुआ देख रहे हैं, वह सामूहिक रूप से हमारी समझ से भी बहुत दूर है।

मैं यहां इस शोषण, पीड़ा और संघर्ष की कई शताब्दियों को याद रखते हुए उस मांग की तरफ आना चाहता हूं, जिसके लिए यह एकदम सही वक्त है। न्याय पर आधारित समाज की कल्पना करने और उसके लिए संघर्ष करने वाले सभी लोगों को निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग को मुख्यधारा का प्रश्न बनाने के लिए अपने प्रयास तेज करने होंगे। यह किसी से छिपा नहीं है कि सार्वजनिक क्षेत्र के ढांचे को कमजोर करने में खुद सरकारें किस तरह की भूमिका निभा रही हैं। जब तक यह सार्वजनिक चर्चा में शामिल नहीं होगा, इसके लिए जनमत बनाना मुश्किल बना रहेगा। इसके लिए सबको मिल कर प्रयास करने होंगे और सबसे पहले इसकी सैद्धांतिकी को तैयार करना होगा।

सबसे पहले हमें यह समझना चाहिए कि यह कोई भावुकता में उठाई गई मांग नहीं है। इसका सिर्फ एक अर्थ है। अगर कोई घराना भारतीय संसाधनों के बलबूते पर, जिनमें श्रम भी शामिल है, धनाढ्य और पूंजीपति बना है, तब उसकी पूंजी पर बतौर नागरिक आम जनता का भी उतना ही हक है। बेशक यह मांग उठने के साथ ही अगले पल इसे मान नहीं लिया जाएगा। जिन विशेषाधिकारों का वे पीढ़ी दर पीढ़ी उपभोग करते आए हैं, अचानक उन्हें कैसे छोड़ देंगे। इसलिए इस मसले पर होने वाली शुरुआत बहुत मुश्किल साबित होने वाली है। जो शोषक है, उसे यह समझा पाना बहुत मुश्किल होता है कि उसके लिए जो सुविधाएं बन कर आई हैं, उस पूरी प्रक्रिया में कौन-कौन किस रूप में शामिल था। जरूरी नहीं कि उन शामिल होने वालों की इसमें सहमति या मर्जी रही ही हो। दोनों ही स्थितियों में वह शोषण ही है। उसे कभी इतना मेहनताना नहीं मिलेगा कि उसकी सारी जरूरतें पूरी हो पाएं। वह ऐसे ही कुचक्र में अपनी जिंदगी गुजार देता है, जिसकी आहट भी उनके कानों तक नहीं पहुंचती है।

आप सामाजिक उत्तरदायित्व के नाम पर यह नहीं कर सकते कि सालों तक तंबाकू के उत्पादों का कारोबार करते रहें और एक दिन आपने उसके उपयोग से रोगी हुए लोगों के लिए कैंसर या टीबी के अस्पताल खोल दिए। हमें यह भी समझना होगा, जो बड़े-बड़े पूंजीपति अपनी सालाना आय को दान करके दुनिया के बड़े-बड़े लोकोपकारक, जनहितैषी, समाज सेवी, फिलेंथ्रेपिस्ट बनने की चाहत रखते हैं, उस पर सबसे पहला हक देश की आम जनता का ही है। इससे उनके द्वारा किया गया शोषण कम या खत्म नहीं हो जाएगा, न हम उनके शोषण और दमनकारी नीतियों के साझेदार हो जाएंगे। हम सिर्फ इस प्रक्रिया को पलटना चाहते हैं। जब राज्य खुद उनके लिए जमीन बनाने में व्यस्त हो और राजनीतिक समझौते करने में व्यस्त हों, तब हमें आगे आकर उसके ‘दोस्ताना पूंजीवाद’ से टक्कर लेनी होगी।

ऐसा भी नहीं है कि सैद्धांतिकी एक दिन में बन कर तैयार होने वाली चीज है। रास्ता बहुत लंबा और थकाऊ है। बीच में ही हम कहीं थक कर बैठ न जाएं इसके लिए एक नक्शा बना लेना चाहिए। इसके लिए जिन तर्कों, तथ्यों और कौशल की जरूरत है, हमें उन तक पहुंचना होगा। मेरी नजर में यह रास्ता आंबेडकर से होकर जाता है। जब तक हम शिक्षित नहीं होंगे, तब तक संगठित नहीं हो सकते और संगठित हुए बिना कोई भी संघर्ष हमें सफलता नहीं दिला सकता।

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