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दुनिया मेरे आगे: जड़ता की दीवारें

उच्च कही जाने वाली जाति से आने वाले लोग अधिकतर आरक्षण और आरक्षण की सुविधा पाने वालों से हद दर्जे की नफरत करते हैं। उन्हें ऐसा लगता है कि आरक्षण उनके हकों पर डाका है।

Author June 15, 2019 1:49 AM
जाट आरक्षण की मांग के दौरान की तस्वीर

हमारे आसपास मौजूद कई ऐसी बातें हकीकत की शक्ल में हमसे सवाल पूछ रही होती हैं और या तो हम उनकी आदतन अनदेखी करते हैं या फिर खुद को कठघरे में देख कर उसका जवाब तलाशने की जरूरत नहीं समझते हैं। हम सब बराबर हैं, इंसान हैं और हमें किसी भी तरह का भेदभाव नहीं करना चाहिए- यह कहते और सुनते हुए सालों और दशकों गुजर गए, लेकिन आज भी अक्सर ऐसी घटनाएं सामने आती हैं जो हमारे सामने परोसे गए उपदेश को मुंह चिढ़ा जाती हैं। जाति की बुनियाद पर खड़े पूर्वाग्रह एक ऐसी ही बीमारी है, जिनकी वजह से हमारे समाज को सभ्य होने के दर्जे में देखना मुमकिन नहीं हो पाता है।

जब पहली बार मेरा दुराग्रह आधारित घृणा से साक्षात्कार हुआ था, तब मैं बहुत छोटी थी। मेरी दादी ने मुझे साफ-सफाई करने वाली लड़की को दोपहर में रोटी देने को कहा था। वह लड़की मुझसे कुछ साल बड़ी रही होगी। मैंने रोटी ले गई और उसके हाथ में टंगी टोकरी में रख दी। तुरंत दादी की कड़क आवाज कानों में गूंजी कि ‘टोकरी को हाथ क्यों लगाया तूने!’ मैं एकदम सहम गई। मैंने उस लड़की की तरफ देखा। उसकी आंखों में एक अजीब-सी मायूसी थी। एक क्षण पहले जो चेहरा खिला-खिला था, वह बुझ गया था। दादी की आवाज फिर से गूंजी, मुझे हाथ धोने की नसीहत के साथ।

वह दिन और क्षण आज भी मेरी आंखों में अक्सर ज्यों का त्यों घूम जाता है। वे कातर आंखें, जैसे आज भी सवाल करती हैं कि ऐसा क्यों है! और मैं अमूर्तन में ही जैसे उसे दिलासा देती हूं कि नहीं, अब ऐसा नहीं होगा… हम सब बदल देंगे! अब हमारे दादा-दादी वाली पीढ़ी खत्म हो चुकी है। लेकिन क्या हमारे लाख चाहने के बावजूद इस कसौटी पर सचमुच कुछ बड़ा बदलाव हो पा रहा है? बेहद अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि हम उस ओर नहीं बढ़ सके हैं। आज भी ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं, जिसमें किसी खास जाति की किसी लड़की को जाति के आधार पर संचालित बर्ताव से मायूस होना पड़ता है और ऐसी हर मायूसी हमारे सभ्य होने और इंसानियत पर एक तीखा सवाल उठा कर गुजर जाती है। गांवों और दूरदराज के इलाकों की तो दूर, दिल्ली और मुंबई जैसे शहर भी इस रोग से बुरी तरह ग्रस्त हैं। कुछ समय पहले मुंबई के एक अस्पताल में अनुसूचित जनजाति की एक लड़की डॉक्टर पायल तड़वी की खुदकुशी ने उन सवालों को और गहरा किया है। खबरों के मुताबिक पायल को उसकी कुछ वरिष्ठ सहयोगियों ने जाति और आरक्षण को आधार बना कर लगातार अपमानित किया था।

कुछ लोगों को ऐसी बातों पर विश्वास करना मुश्किल होता है। साथ ही उच्च कही जाने वाली जाति से आने वाले लोग अधिकतर आरक्षण और आरक्षण की सुविधा पाने वालों से हद दर्जे की नफरत करते हैं। उन्हें ऐसा लगता है कि आरक्षण उनके हकों पर डाका है। मैं उनके बीच कई बार अप्रिय स्थिति में पड़ जाती हूं, क्योंकि मुझे लगता है कि आरक्षण वैसे समूहों का अधिकार है, जिन्हें महज जाति की वजह से अवसरों से वंचित किया गया था। मेरे इस विचार की वजह से कुछ लोगों ने मुझे आरक्षण प्राप्त समूह की पृष्ठभूमि से मान लिया था। लेकिन जब उन्हें पता चला कि मैं आरक्षण के दायरे से बाहर हूं, फिर भी आरक्षण पर मेरा रुख उनके उलट है, तब वे मुझसे भी नफरत करने लगे।

उन लोगों की नफरत और अपने प्रति उनकी आंखों में छलकती हिकारत को देख कर यह महसूस कर पाती हूं कि पायल तड़वी या उनके जैसी तमाम लड़कियों या दलित-वंचित जातियों की पृष्ठभूमि वालों के साथ जब भेदभाव और तिरस्कार का बर्ताव होता होगा तो उनके भीतर क्या-क्या और किस तरह टूटता होगा! अपने ही साथ वालों की नजर में धिक्कार सहना, खुद को हर रोज छोटा महसूस करना इतना आसान तो नहीं होता किसी के भी लिए। जब से यह समझ में आया कि जातियों का जहर कितना बुरा है, तभी से उनके लिए दर्द महसूस होता है जो इस जहर की मार झेलने के लिए मजबूर हैं।

एक व्यक्ति और उनकी बातों से मैं काफी प्रभावित हो गई थी तो एक अन्य व्यक्ति ने उनकी जाति के बारे में बता कर मेरे भीतर उनके प्रति उपेक्षा भरने की कोशिश की। लेकिन मैंने कहा कि इससे क्या फर्क पड़ता है! आरक्षण का विरोध करने वालों से कहती हूं कि सदियों से हमारे पूर्वजों ने कमजोर जातियों का शोषण किया है… और अब जाकर उन्हें बराबरी का मौका मिला है तो हमें सहृदयता दिखानी चाहिए। इसके बाद भी उनका रुख नहीं बदलता। वे संविधान में दर्ज अधिकारों का तो कुछ कर नहीं पाते, तब घृणा के हथियार का इस्तेमाल करते हैं। ऐसी घृणा, जिसे झेलना हर किसी के लिए मुमकिन नहीं है। मैंने भी तय किया है कि मैं हार नहीं मानूंगी। मैं लगातार इस उम्मीद में काम करती हूं कि जातियों के बंधन टूट जाएं, हम सब बस इंसान बन जाएं। शायद एक दिन जाति की दीवार पिघल जाए!

 

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