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दुनिया मेरे आगे: सिमटते अखाड़े

सत्तर और अस्सी के दशक तक पूर्वी उत्तर प्रदेश के अधिकतर गांव में अखाड़े होते थे। छोटे-बड़े सभी उम्र के कुश्ती के शौकीन लोग सुबह-शाम वहां इकट्ठा होते, व्यायाम करते, जोर-आजमाइश करते। हमारे बचपन में गांव के खलिहान से आगे कुछ जंगली पेड़ों के बाग थे, जिसे हम ‘बन’ (वन) कहते थे। वहीं एक अखाड़ा था।

Author December 19, 2018 3:54 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर (Source: Express Photo by Kamleshwar Singh)

सत्तर और अस्सी के दशक तक पूर्वी उत्तर प्रदेश के अधिकतर गांव में अखाड़े होते थे। छोटे-बड़े सभी उम्र के कुश्ती के शौकीन लोग सुबह-शाम वहां इकट्ठा होते, व्यायाम करते, जोर-आजमाइश करते। हमारे बचपन में गांव के खलिहान से आगे कुछ जंगली पेड़ों के बाग थे, जिसे हम ‘बन’ (वन) कहते थे। वहीं एक अखाड़ा था। बचपन में हम लोगों को दोपहर में भी ‘बन’ की तरफ से गुजरने में डर लगता था। हमारे गांव में हम सबके भइया के रूप में जाने वाले एक व्यक्ति अखाड़े के सरदार थे। अखाड़े का रखरखाव उनकी सरपरस्ती में चलता था। छोटा कद, लेकिन अधिक ‘जांगर’ वाले उन भइया को देख कर ज्यादातर बच्चे इधर-उधर छिप जाते थे, क्योंकि आते-जाते वे गांव के बच्चों को गर्दन से पकड़ते थे और उनका जोर-जांगर देखने लगते थे। बच्चे अपने को उनकी पकड़ से छुड़ाने के लिए विनती करने लगते थे। अखाड़े के एक कोने में बांस में लगा लाल लहराता झंडा ऐसा लगता था, जैसे धरती के साथ ही आकाश में भी अपने होने का उद्घोष कर रहा है। लंगोट पहन कर बच्चे कसरत करते, मिट्टी से तैयार अखाड़े में कुश्ती लड़ते और आते-जाते समय अखाड़े की मिट्टी को माथे पर लगा कर नमन करते। गांव के अधिकतर घरों में गाय-भैंस-बैल होते थे और बच्चों को एक गिलास दूध-माठा मिल जाता था।

पहले कुछ नट समुदाय के लोग हमारे गांव में कुश्ती सिखाने आते थे। बदले में उन्हें अनाज-पिसान या पैसे दिए जाते थे। लेकिन बाद में कुश्ती बंद हुई और उनका आना भी बंद हो गया। अब उनके परिवार के कुछ लोग ढोलक लेकर गांव-गांव में घूम के गाते हैं। शादी-विवाह के मौके पर खाना-बख्शीश लेने आते। कुछ साल पहले मैं गांव में था तो उनके परिवार का कोई आदमी ढोलक लेकर आया था। कुछ गाना गया। उनका गाया एक गाना- ‘हमरे देसवा का अइसन हाल हो गईल, एगो रोटी खातिर लइकवन में मार हो गईल’ मुझे भीतर तक छू गया था। हर साल नागपंचमी के दिन गांव में कुश्ती का रिवाज था। आसपास के जिलों में नौकरी करने वाले लोग भी नागपंचमी पर गांव आ जाते थे। वे कुश्ती लड़ते और देखते थे। पिताजी ने बताया था कि जब उन्होंने गोरखपुर में नौकरी शुरू की तो नागपंचमी पर गांव आए। गांव में ही पहलवान और बाद के दिनों में साधु के रूप में जाने वाले एक व्यक्ति ने पिताजी से कुश्ती लड़ने का प्रस्ताव रखा।

नौकरी में आने के बाद पिताजी की कुश्ती छूट चुकी थी तो उन्होंने मना कर दिया। लेकिन उस साधु के बार-बार कहने पर अखाड़े में उतर गए। उसे अपनी ताकत और दांव पर अति आत्मविश्वास था और पिताजी को अपनी हार बचाने की चिंता। थोड़ी देर अखाड़े में अपना बचाव करते-करते संयोग से पिताजी के हाथ में उस व्यक्ति का गट्टा (हथेली-कलाई) आ गया और उन्होंने दांव लगा के उसे पटखनी दे दी। बाजी तो हार-जीत में तय हुई, लेकिन आज के दौर की तरह उनके बीच किसी तरह का मनमुटाव नहीं हुआ। दोनों के बीच दोस्ती बनी रही। यह थोड़ा विचित्र हुआ कि पिताजी जिस मुकाबले में संयोग से जीत गए थे, उसमें हारने वाला व्यक्ति बाद के वर्षों में साधु बन गया था।

1990 के दशक से परिवारों में विभाजन, खेती का खस्ताहाल और नौकरी की जरूरत ने गांव में बहुत कुछ बदल दिया। गांव में शिक्षा का स्तर भी गिरा और खेती सबका पेट भरने में असमर्थ दिखने लगी। कुछ घरों में ताले लग गए। धीरे-धीरे हमारे आसपास के घरों में गाय-बैल-भैंस के खूंटे सूने होने लगे। बैलों की जगह गांव में ट्रैक्टर आने लगे। अखाड़ा पहले ही बंद हो चुका था। बढ़ती आबादी के चलते खलिहान भी अब वैसे नहीं रह गए और ‘बन’ अब निर्जन जंगल नहीं रहा। वहां घर बन गए। बहुमत में नौजवान खेती छोड़ कर छोटी-मोटी नौकरी की तलाश में कोलकाता, दिल्ली, मुंबई, बैंकॉक, सऊदी अरब या फिर मॉरीशस तक जाने लगे। इसी दौर में हमारे गांव के अखाड़े में तैयार हुए कई अच्छे पहलवान नौकरी करने लगे। उनमें से कई ने शहरों का रुख कर लिया और अब कई-कई साल के बाद कभी-कभार गांव में आते हैं।

आज हमारे गांव में बाजार के साथ-साथ, हर एक टोले में तीन-चार छोटी दुकानें खुल गई हैं। गांव में ‘मैगी’ हर दुकान पर मिल जाती है, दूध के लिए दूधियों का इंतजार करना पड़ता है। ज्यादातर घरों में मोटरसाइकिल है। गांव के बच्चों का वाट्सऐप और फेसबुक समूह है। अब गांव में कुश्ती कोई नहीं लड़ता है। गांव में जहां पहले अखाड़ा होता था, अब इयरफोन लगा कर युवक मोटरसाइकिल से धूल उड़ाते उधर से गुजर जाते हैं। अखाड़ा अब वहां नहीं है, लेकिन उसकी मिट्टी की खुशबू अभी भी अलग-अलग शहरों में गए लोगों की स्मृतियों में कायम है। अब सोचता हूं कि अगर उस अखाड़े के पहलवानों को वाजिब जगह मिली होती तो शायद वे भी दुनिया में देश का नाम रोशन कर सकते थे।

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