ताज़ा खबर
 

दायित्व का दामन

बिजली की कमी, शुद्ध पेयजल की समस्या, गंदगी के कारण बीमारियों के खतरे, बेतरतीब ट्रैफिक के कारण आवागमन में कठिनाई आदि। हमारा यह अनुभव है कि बिजली, पानी, सफाई, अनुशासन जैसी बुनियादी सुविधाओं के मामले में भी हमारे व्यवहार आमतौर पर उत्तरदायित्व से भरे हुए नहीं होते।

Author February 19, 2019 3:25 AM
दायित्व का दामन

मोनिका अग्रवाल

जन्म से मृत्यु तक प्रयोगधर्मा और संघर्षशील जिंदगी! समय के झंझावातों में आगे, उतार-चढ़ाव के लहरों पर झूमती, किसी बाज की तरह पंख फैलाए… आकाश की ऊंचाइयों को छूती-सी, मंजिल की तलाश में जूझती जिंदगी! और इसको निर्वहन करते हुए मनुष्य हर पड़ाव पर उत्तरदायित्व निभाता चला है! इसी से मानव सभ्यता आगे बढ़ी है। एक ही व्यक्ति अपने जीवन में अनेक प्रकार के उत्तरदायित्व को निभाता चलता है। कभी पुत्र या पुत्री, पिता या माता, पति या पत्नी, भ्राता और भागिनी, नागरिक या फिर कभी कर्मचारी आदि। उत्तरदायित्व थोपा नहीं जा सकता। जो व्यक्ति उत्तरदायित्व को स्वीकार कर लेता है, वह सक्रिय होकर होकर खुद ही निर्धारित लक्ष्य की ओर बढ़ जाता है। फिर कठिनाइयां भी आएं तो वह घबराता नहीं। ऐसा जब हो जाए तब हम कह सकते हैं कि यही ध्येय की पराकाष्ठा है। ऐसे ही लोगों के लिए राष्ट्रकवि दिनकर ने लिखा है- ‘जहां कहीं है शांति जगत में, जहां कहीं उजाला/ वहां खड़ा है, कोई अंतिम मोल चुकाने वाला’।

हमारे आसपास, हर पल, हर जगह, ऐसी घटनाएं होती रहती हैं जो हमसे कुछ विशिष्ट भूमिका की मांग करती हैं। ऐसे लोग, जिनमें अंतर्चेतना की धारा अनवरत प्रवाहित होती है, वे निराशापूर्ण बातों पर ध्यान नहीं देते हैं। उन्हें तो बस आगे बढ़ कर कुछ नया करना होता है। कुछ नए उत्तरदायित्व के साथ एक नई दिशा तय करनी होती है। कल किसने क्या कहा, कल क्या हुआ, इस पर सोचने का समय कहां होता है उनके पास? कहा जाता है कि ‘जिम्मेदारी किसकी? जो समझे उसकी!’ और ‘जो बोले सो कुंडी खोले’! छोटी-सी लगने वाली बातें बड़ी महत्त्वपूर्ण होती हैं। अनेक छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज करने का नतीजा कभी-कभी अनेक अन्य प्रकार के अपराध में और कभी-कभी तो जीवन और सभ्यता के अंत के रूप में भी होता है। ‘सब चलता है… मुझे क्या फर्क पड़ता है…!’ या ‘मेरे पहले भी संस्था चल रही थी, मेरे बाद में भी संस्था चलती रहेगी…’, ‘मैंने सबका ठेका ले रखा है क्या?’, ‘अरे चल यार… कोई न कोई तो देख ही लेगा’ या फिर ‘अब उनको क्या करना..’ आदि।

ऐसे कई जुमले हैं जो हमें प्रतिदिन अपने आसपास सुनाई पड़ जाते हैं। ये जुमले अनायास ही कही गई बातें नहीं, बल्कि किसी व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व का आईना भी होती हैं। फिर दफ्तरों में तो मजाक के तौर पर ‘बने रहो पगला… काम करे अगला’, ‘मत लो टेंशन, नहीं तो फैमिली पाएगी पेंशन’, ‘काम से डरो नहीं, काम को कभी करो नहीं’ या ‘काम करो या न करो, काम की फिक्र जरूर करो’ जैसी बातें आपस की हल्की बातचीत में सुनने को मिल जाती हैं।

दरअसल, ऐसे जुमलों ने सत्यानाश कर दिया उत्तरदायित्व की भावना का और हम कई सालों में भी वह नहीं कर पाए जो आबादी, क्षेत्रफल और संसाधन के मामले में हमसे सौ गुना कम में भी नहीं टिकने वाले कई देशों ने कुछ ही वर्षों में कर दिया। हम ऐसी तमाम बातों की ओर ध्यान नहीं देते जो हमारे दैनिक जीवन में समस्याएं पैदा करती हैं। बिजली की कमी, शुद्ध पेयजल की समस्या, गंदगी के कारण बीमारियों के खतरे, बेतरतीब ट्रैफिक के कारण आवागमन में कठिनाई आदि। हमारा यह अनुभव है कि बिजली, पानी, सफाई, अनुशासन जैसी बुनियादी सुविधाओं के मामले में भी हमारे व्यवहार आमतौर पर उत्तरदायित्व से भरे हुए नहीं होते। कहीं नल खुला है तो हम आगे बढ़ कर उसे बंद करने की जहमत नहीं उठाते। कहीं निरर्थक बल्ब और पंखे चालू हैं, हम उन्हें बंद करने की पहलकदमी नहीं करते। कहीं न कहीं किसी फिजूलखर्ची की कीमत हमारे घरों में हमारे अपने ही भोगने के लिए बाध्य होते हैं।

उत्तरदायित्व की अनुभूति हमें स्वत: स्फूर्त चेतना से प्रेरित करती है। कितना अच्छा हो अगर हम अपनी सीट से हटते वक्त अपने कंप्यूटर के मॉनिटर को ऑफ या बंद कर दें, अपनी सीट के ऊपर का पंखा बंद कर दें, कहीं कोई नल बेकार चलता दिखाई दे तो हाथ बढ़ा कर उसे बंद कर दें, अगर वाश बेसिन में कोई व्यक्ति पान-सुपारी मुंह से उगलता दिखाई दे तो उसे टोक दें और रोकें, हम सड़कों पर अपनी गाड़ी को जहां-तहां खड़ी नहीं करें। ये सब सोचने की बातें हैं और इस तरह से सोचना भी उत्तरदायित्व की भावना से ही विकसित होता है। उत्तरदायित्व अगर दूसरों के प्रति नहीं तो अपने परिवार, समाज, संस्थान, देश, मानवता, प्रकृति के अंश के रूप में अपने प्रति। हम चाहें तो अपने भीतर आसपास के लोगों को इस तरह के उत्तरदायित्वों के प्रति जागरूक कर सकते हैं। अन्यथा यथास्थितिवाद का शिकार होकर मवाद भरे घाव की तरह बजबजाते हुए भविष्य के रास्ते पर सुप्त चेतना, निश्चेष्ट, निस्तेज, संज्ञाशून्य व्यक्ति की तरह बढ़ना पड़ता है। सोचना हमें है कि हम कौन-सा विकल्प चुनें!

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

X