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दुनिया मेरे आगे: संस्कृति बनाम बच्चे

दरअसल, पश्चिमी देशों में बच्चों के अधिकारों और उनकी निजता को लेकर अतिवादी समझ काम करती दिखती है।

Author Published on: October 21, 2019 2:08 AM
दरअसल, पश्चिमी देशों में बच्चों के अधिकारों और उनकी निजता को लेकर अतिवादी समझ काम करती दिखती है।

आलोक कुमार मिश्रा

हाल में मैंने एक खबर पढ़ कर मां को सुनाई तो हैरानी और आश्चर्य से उसका मुंह खुला रह गया। खबर के मुताबिक स्पेन में अदालत ने एक व्यक्ति को दो साल की कैद और दो लाख से अधिक का जुर्माना भरने की सजा सुनाई है। उसका जुर्म यह था कि उसने अपने बेटे का खत खोल कर पढ़ लिया था, जिसे उसकी मौसी ने भेजा था। माना गया कि यह बच्चे की निजता के अधिकार का उल्लंघन है। मेरी मां का कहना था कि ‘भला इसमें क्या बड़ी बात थी! अपने बच्चे के नाम आए खत को मां-बाप क्यों नहीं पढ़ सकते? वह भी जब बच्चा दस वर्ष, छोटी और अपरिपक्व आयु का हो। माता-पिता को अपने बच्चों से जुड़ी बातें जानने और उनके अच्छे-बुरे के बारे में सोचने का हक तो है ही।’

वास्तव में मां की यह टिप्पणी हमारे अपने समाज और संस्कृति की समझ को दर्शा रही थी। मुझे याद है कि कुछ वर्ष पहले भी इससे मिलती-जुलती खबर ने हम भारतीयों को काफी उद्वेलित किया था। तब नार्वे में एक भारतीय दंपत्ति से उनकी बेटी को इसलिए अलग कर दिया गया था कि उन पर आरोप था कि वे अपनी बच्ची को अपने हाथों से खाना खिलाते हैं, साथ ही बिस्तर पर सुलाते हैं जो कि वहां के कानून के अनुसार क्रूरता थी।

बच्चों के अधिकारों से जुड़ी ये खबरें हमें अटपटी इसलिए लगीं कि हम एक बिल्कुल अलग सांस्कृतिक धरातल पर खड़े होकर इन्हें पढ़ और देख-सुन रहे थे। लेकिन नार्वे की घटना यह बताती है कि वहां हमारे तौर-तरीके भी नापसंद किए गए। दरअसल, पश्चिमी देशों में बच्चों के अधिकारों और उनकी निजता को लेकर अतिवादी समझ काम करती दिखती है। लोकतांत्रिक अधिकारों के नाम पर बच्चों को बड़ों द्वारा अच्छे-बुरे की सीख देने, आपस में भावनात्मक रूप से जुड़ कर सीखने-सिखाने के अवसरों को कुंद कर दिया जाता है। जबकि बच्चों को उनकी शारीरिक-मानसिक परिपक्वता प्राप्त करने में बड़ों के सान्निध्य और सहयोग की जरूरत होती है।

इस प्रक्रिया में कुछ गलतियां हो सकती हैं, जिन्हें एहसास होने पर सुधारा जा सकता है। पर निजता के कठोर कानून इसकी छूट नहीं देते। ऐसी कठोरता के कारण अभिभावक भी बच्चों को गलत करने पर रोकने-टोकने या उन पर नजर रखने से बचते होंगे। शायद अमेरिका जैसे देशों में कभी-कभी बच्चों द्वारा स्कूलों में बेरोकटोक बंदूक ले जाने, आवेश में आकर गोली चला देने जैसी घटनाएं इसलिए भी दिखती हैं।

पश्चिमी समाजों की तरह यहां अलगाव, विखंडन और अकेलेपन की समस्या उतनी गंभीर नहीं है और बच्चों या अभिभावकों के बीच इस तरह का कठोर अधिकार विभाजन नहीं दिखता है तो इसके नकारात्मक पक्ष भी हैं। पश्चिमी समाजों में व्याप्त अति लोकतांत्रिकता के मुकाबले हमारे समाजों में बच्चों को निर्भर-निरीह बना कर रखने और उन पर अभिभावकों का संपूर्ण अधिकार मानने-समझने की चरम स्थिति है। यह बच्चों को एक स्वायत्त और सचेत नागरिक के रूप में विकसित और बड़े होने में बाधा पहुंचाती है। एक ऐसा नागरिक जो समाज में अपनी जिम्मेदारियों और अधिकारों के प्रति सजग होते हुए दूसरों की भिन्नताओं और जीवन दृष्टि के प्रति सम्मान की भावना रखे। लेकिन जब समाजीकरण की प्रक्रिया में ही नियंत्रित रखने और छोटे-बड़े के बीच गैर बराबरी की इतनी सशक्त उपस्थिति हो तो भला बड़े होने पर लोकतांत्रिक चेतना से युक्त व्यक्तित्व कैसे विकसित होगा।

हाल ही में जब हमारे देश की एक राज्य सरकार ने सुरक्षा के नाम पर स्कूली कक्षाओं के अंदर कैमरे लगाने की नीति पर अमल करने की बात कही तो इसका कई आधारों पर समर्थन या विरोध किया गया। पर तर्क देने वालों में अधिकतर प्रशासनिक दृष्टिकोण या शिक्षकों के नजरिए से ही अपनी बात कह रहे थे। इनमें से बहुत कम ने बच्चों की निजता के उल्लंघन का मुद्दा उठाया। हमारे जैसे सामंती मनोवृत्ति वाले समाजों में जहां बच्चों को वैसे ही अधिकार विहीन, निर्भर और पूरी तरह अपरिपक्व समझा जाता है, उन पर हमेशा नजर बनाए रखने को अच्छे अभिभावक होने की निशानी माना जाता हो, वहां कैमरे नियंत्रण का हथियार ही बनेंगे।

कहने का आशय यही है कि बच्चों और उनके जीवन को लेकर प्रचलित पश्चिमी और भारतीय समाजों की समझ दो विपरीत चरम को दिखाते हैं। संतुलित और सम्यक बचपन के लिए जहां पश्चिमी समाजों से हमें बच्चों को एक नागरिक के रूप में देखे जाने, उनकी निजता और अधिकार को सम्मान दिए जाने की सीख लेनी होगी, वहीं ऐसा करते हुए अभिभावकों की उचित जिम्मेदारी, मार्गदर्शन, देखभाल करने की प्रेमपूर्ण प्रवृत्ति और अभिव्यक्ति को महत्त्व देना होगा। ऐसा करके हम अकेलेपन, विखंडन और अलगाव की समस्या को दूर कर पाएंगे और साथ ही निर्भर बनाए रखने, नियंत्रण और वर्चस्व की मनोवृत्ति पैदा करने वाले समाजीकरण के चक्र का खात्मा भी कर पाएंगे।

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