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दुनिया मेरे आगे: सौहार्द की सरहद

विद्यार्थियों के भीतर भी आलोचनात्मक विवेक क्यों पैदा नहीं हो पा रहा है! स्कूल या कॉलेज की कक्षाओं के पाठ्यक्रम में भी सोचने का कोना सांप्रदायिकता की चपेट में क्यों आ रहा है? हमारे बच्चे धर्म की पहचान और सांप्रदायिकता के दायरे में क्यों सिमट रहे हैं?

Author March 27, 2019 2:46 AM
सर्फ एक्सेल द्वारा होली पर लाए ‘रंग लाए संग’ में एक हिंदू लड़की और एक मुस्लिम लड़का।

विक्रम

एक विश्वविद्यालय में पढ़ाना शुरू करने के कुछ दिनों बाद मैं एक कक्षा में मध्यकालीन इतिहास पढ़ा रहा था। मेरी यह कोशिश होती है कि विषय को पढ़ाते हुए मैं विद्यार्थियों के मन में ज्यादा से ज्यादा सवाल उठा पाऊं और हर संभव स्तर से उन्हें ज्ञान के स्तर पर संतुष्ट कर सकूं। जिस कक्षा में विद्यार्थियों के भीतर जानने की इच्छा या सवाल गायब हो जाएं तो वे आमतौर पर श्रोता बन कर रह जाते हैं। लेकिन उस दिन स्नातक के एक छात्र के सवाल ने मुझे चिंतित कर दिया। उसने पूछा कि ‘सर, क्या आप मुसलमान हैं?’ मैं इस सवाल से असहज था, लेकिन मैंने ‘नहीं’ में उत्तर दिया और उससे पूछा कि यह सवाल क्यों पूछ रहे हो। उसने आश्चर्यजनक तरीके से कहा कि असल में आप क्लास में मुसलमानों के राज और काम के बारे में पढ़ा रहे हैं। मैं सिर्फ इतना कह सका कि यह मध्यकालीन इतिहास का पाठ है तो इस पाठ्यक्रम में जो शामिल है, हम सब वही पढ़ेंगे। मैंने अपने तरीके से जवाब तो दिया, लेकिन उस छात्र को समझाने में नाकाम रहा। यह सवाल कई दिनों तक मेरे मन में उमड़ता-घुमड़त़ा रहा। मैं सोचता रहा कि स्नातक स्तर की पढ़ाई करने वाले हमारे विद्यार्थियों के भीतर भी आलोचनात्मक विवेक क्यों पैदा नहीं हो पा रहा है! स्कूल या कॉलेज की कक्षाओं के पाठ्यक्रम में भी सोचने का कोना सांप्रदायिकता की चपेट में क्यों आ रहा है? हमारे बच्चे धर्म की पहचान और सांप्रदायिकता के दायरे में क्यों सिमट रहे हैं?

लेकिन इससे ज्यादा मैं यह सोच रहा था कि एक शिक्षक के रूप में मैं बच्चों के मन से इस संकीर्णता को निकाल पाने में असमर्थ क्यों रहा? मैं सोचता रहा, किताब के साथ भी, किताब के बाद भी, हजारों उदाहरणों से इतिहास बता रहा है कि प्राचीन, मध्य और आधुनिक काल में इस देश के शासकों की क्या भूमिकाएं रहीं। गंगा-जमुनी तहजीब की एकता की मिसाल अमीर खुसरों की रूबाइयां एक जमाने में घर-घर में मशहूर थीं। रसखान ने यह भी लिखा कि जब कभी उनका जन्म हो तो ब्रजभूमि पर ही हो। वीर अब्दुल हमीद के किस्से सेना के जवान सुनाते थकते नहीं हैं! गांव से लेकर शहर तक मंदिरों से लेकर ‘पीरों के मजारों’ पर हिंदू और मुसलमान बड़ी तादाद में दुआ के लिए कतार में खड़े होते हैं। ऐसे तमाम लोग हैं, जिनकी धार्मिक पहचानें देश की धर्मनिरपेक्ष शक्ल को पुख्ता करती हैं, लेकिन वे सभी देश के नाम पर कुर्बान हो गए।

अकादमिक जगत में सांप्रदायिकता की पहचान और उसे दूर करने वाले पाठ से किताबें भरी पड़ी हैं। नित नए-नए शोध हो रहे हैं, लेकिन बच्चों को सांप्रदायिकता की चपेट से नहीं बचाया जा पा रहा है। आपसी एकता को स्थापित करने के लिए तमाम कहानियां, चलचित्र और धारावाहिकों का प्रसारण भी किया जाता रहा है, लेकिन दंगे होते रहे हैं। इंसान हिंदू और मुसलमान के तराजू में तौल दिया जाता है। सवाल उठता है कि फिर तमाम शिक्षण संस्थानों से लेकर विश्वविद्यालयों तक का उद्देश्य क्या है? तमान विचारकों, इतिहासकारों ने एक सुर में कहा है कि विश्वविद्यालय में धार्मिक सहिष्णुता, धर्मनिरपेक्षता, जातिविहीन, भेदभावविहीन, शोध, मौलिक ज्ञान का उद्देश्य होना चाहिए। यहां तक कि हमारी सरकारें भी नारा देती हैं कि कूड़ा, गरीबी, भ्रष्टाचार, जातिवाद, आतंकवाद और सांप्रदायिकता को उखाड़ कर फेंक दिया जाए। लेकिन ये नारे भी आज के दिन बेमानी साबित हो रहे हैं।

आखिर आज हमारे विश्वविद्यालय और शिक्षक कहां पर जाकर नाकाम हो रहे हैं? मेरा मानना है कि आज दोनों पर ही सवालिया निशान है। मुझे लगता है कि एक तरफ विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम दोषपूर्ण हैं तो दूसरी ओर शिक्षकों की जमात में भी कम कमियां नहीं हैं। इतिहास की कुछ पाठय-पुस्तकें पढ़ते समय ऐसा लगता है कि सांप्रदायिकता की आग के गोले चल रहे हैं। कुछ भारतीय इतिहासकार मुसलिम शासकों को दोषी ठहराते हैं तो कुछ पाकिस्तानी इतिहासकार भारतीय शासकों को दोषी ठहराते हैं। शोध को ठीक ढंग से न पढ़ाए जाने के कारण अबोध विद्यार्थी एक बार उस दलदल में धंस जाते हैं तो जीवन भर उसमें से निकल नहीं पाते हैं। यह भयंकर ज्ञान अपनी आने वाली पीढ़ी दर-पीढ़ी को किस्से कहानियों के माध्यम से स्थानांतरण करते रहते हैं।

कायदे से कहें तो कुछ शिक्षक भी अपने समाजीकरण या हेजेमनी की वजह से शिक्षा में सांप्रदायिकता के तत्त्व के साथ शिक्षा देने को बध्य होते हैं या फिर कहीं पर जान-बूझ कर इस ज्ञान को आगे बढ़ाते हैं। कई शिक्षक तो शोध भी इस तरह कराते हैं जैसे कि मारपीट की एनिमेशन फिल्में बनाई जा रही हों। कई बार ऐसा लगता है कि मनुष्य बस एक डाटाबैंंक होकर रह गया है। नाम, जाति, धर्म, लिंग, देश और राष्ट्रीयता- इसके सिवा कुछ नहीं। अब यह भी लिखना शायद बेमानी हो चुका है कि ‘न हिंदू बनेगा, न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा’। ऐसे में जब चारों ओर तनाव हो, बंदूकें तनी हों, हम सबकी जिम्मेदारी बनती है कि वह इंसान रहे, न कि हिंदू या मुसलमान। अगर ऐसा नहीं हो पा रहा है तो एक शिक्षक के नाते मैं मानता हूं कि यह देश से पहले एक शिक्षक की नाकामी है।

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