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दुनिया मेरे आगे: बच्चे बनाम राजनीति

बच्चे अपनी दिनचर्या में, आपस में खेलते हुए, समस्याओं को सुलझाने की प्रक्रिया में उपलब्ध और सीमित संसाधनों का बहुत तार्किक आबंटन और उपयोग करते हैं, मिलजुल कर निर्णय लेते हैं। उनकी यह प्रवृत्ति उन्हें उनकी प्रकृति में ही राजनीतिक सिद्ध करती है।

Author April 25, 2019 12:59 AM
राजस्थान स्थित झुंझुनू में एक कार्यक्रम के दौरान बच्चे को गिफ्ट भेंट करते हुए पीएम मोदी।

आलोक कुमार मिश्रा

देश में चुनावी मौसम चल रहा है। गली, नुक्कड़, चौपाल, बाजार, मीडिया, परिवार सभी जगह चुनाव पर चर्चा जोरों पर है। अपने पसंदीदा दलों, नेताओं, उनके कामों और भावी कार्यक्रमों पर लोग अपनी-अपनी बात रख रहे हैं। उदासीन या राजनीति में कम रुचि रखने वाले भी आजकल इससे अछूते नहीं। लेकिन पूरे परिदृश्य से बच्चे जिस तरह गायब हैं, वह चौंकाने वाला है। माना जाता है कि बच्चे कम उम्र, अनुभव, सहज-सरल समझ आदि के कारण राजनीति से कोई वास्ता नहीं रखते और यह बड़ों का क्षेत्र है। चुनावी राजनीति के सबसे महत्त्वपूर्ण खिलाड़ी राजनीतिक दल भी इस पर उदासीन दिखते हैं। अधिकतर दलों के एजेंडे में बच्चों का जिक्र लगभग न के बराबर है।

शायद ऐसा इसलिए है कि वे मतदाता नहीं हैं। चूंकि उनके पास वोट देने का अधिकार या बड़े स्तर पर प्रभावित करने की संगठित शक्ति नहीं है, इसलिए उन पर कोई बात करने की जरूरत भी नहीं महसूस की जाती है। पर क्या सच में राजनीति में बच्चों पर बात किए जाने की कोई जरूरत नहीं है? क्या बच्चे राजनीति में कोई रुचि नहीं रखते? उनके हित-अहित समाज और राजनीति के स्तर पर परिलक्षित नहीं होने चाहिए? दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक राष्ट्र-राज्य और बच्चों की आबादी वाला देश आखिर चुनावों में अपने बाल नागरिकों और भावी मतदाताओं को लेकर उदासीन या लापरवाह कैसे हो सकता है?
एक शिक्षक के रूप में बच्चे-बच्चियों और किशोर-किशोरियों के साथ काम करते हुए मैंने अनुभव किया है कि इनकी भी राजनीति को लेकर समझ और रुचि होती है। हालांकि इसकी तुलना वयस्कों से नहीं की जा सकती। वे देश के राजनीतिक दलों, नेताओं, सरकार के कामकाज और राजनीतिक मुद्दों पर आपस में बात करते हैं या सामाजिक और राजनीतिक विज्ञान की कक्षा में अपने विचार रखते हैं। उनकी बातों में कई बार बहुत गहराई होती है। वे भी हम बड़ों की तरह अपने परिवार, पड़ोस, मीडिया आदि से प्रभावित होते हैं। पर इस चुनावी फिजां में भी स्कूल सायास तरीके से बच्चों के साथ इस पर कोई सार्थक चर्चा नहीं कर रहे, बल्कि निरपेक्ष ही बने हुए हैं। क्या उन्हें इस जीवंत वातावरण से जोड़ कर एक वृहद् समझ की ओर उन्मुख नहीं किया जाना चाहिए?

आखिर लोकतांत्रिक शिक्षण-प्रशिक्षण को शिक्षा का प्रमुख अंग क्यों नहीं होना चाहिए? यों भी, स्कूल ‘हमारा प्रिय नेता’, ‘यदि मैं प्रधानमंत्री होता’ जैसे अन्य राजनीतिक निबंध वर्षों से बच्चों द्वारा लिखने, याद करने और सुनाने की उम्मीद करते रहे हैं। सामाजिक विज्ञान की कक्षाओं में मॉनीटर के चुनाव या छद्म मतदान के द्वारा भी यह काम किया जाता रहा है, पर ऐसा तब होता है जब पूर्वनिर्धारित समयबद्ध पाठ का कक्षा में अध्यापन हो रहा हो। कभी भी पढ़ाने या आज के समय से इसे जोड़ कर अभी प्रयोग कर पाने के लिए जरूरी लचीलेपन का अभाव बना हुआ है।

परिवार, स्कूल और समाज की तरह राजनीति भी बच्चों के सम्मानजनक और महत्त्वपूर्ण स्थान को लेकर उदासीन है। स्कूल, शिक्षा, खेल के मैदान, सही पोषण आदि जो बच्चों के जीवन में बहुत मायने रखते हैं, चुनावी वायदों से गायब हैं। किशोरियों के लिए माहवारी को लेकर जागरूकता, सेनेटरी पैड की सहज उपलब्धता, शारीरिक साफ-सफाई के महत्त्व जैसे मुद्दे तो वैसे भी हमारे समाज में सार्वजनिक चुप्पी का क्षेत्र रहे हैं और राजनीति में भी अनुपस्थित दिखाई देते हैं। सोचिए, अगर इन्हें राजनीति और चुनावी मुद्दों में जगह मिल पाती तो इन विषयों पर जो स्थिति आज है, क्या वही होती? शायद नहीं, क्योंकि तब सरकारों और प्रतिद्वंद्वी दलों के बीच इस पर बेहतर करने की होड़ होती। पर अभी तो राजनीतिक दलों की भाषा में भी किसी को बच्चा साबित करके उसे नीचा दिखाने, अपमानित करने और उपहास उड़ाने का चलन है। किसी भी दल के नेता को अपरिपक्व दर्शाने के लिए उसे बच्चा कह देना वास्तव में हमारे संभावनाशील और रचनात्मक बच्चों का अपमान है।

बच्चे अपनी दिनचर्या में, आपस में खेलते हुए, समस्याओं को सुलझाने की प्रक्रिया में उपलब्ध और सीमित संसाधनों का बहुत तार्किक आबंटन और उपयोग करते हैं, मिलजुल कर निर्णय लेते हैं। उनकी यह प्रवृत्ति उन्हें उनकी प्रकृति में ही राजनीतिक सिद्ध करती है। आज पूरी दुनिया में इसे महसूस करते हुए मतदान की उम्र घटाने पर चर्चा हो रही है। सूचना के स्रोतों तक उनकी उपलब्धता आज के समय जितनी कभी नहीं रही। ये उनकी समझ को बहुत प्रभावित कर रहे हैं। मेरी सात साल की बेटी टीवी पर नेताओं को देखते ही उनके नाम और पद का उच्चारण शुरू कर देती है। वह उन पर कुछ वैसी ही टिप्पणियां करती है, जैसा हमें घर में बातचीत करते हुए सुनती है। इससे सिद्ध होता है कि वह अपने परिवेश का गहरा अवलोकन ही नहीं करती, बल्कि उससे सीखती भी है। चुनावी और राजनीतिक परिदृश्य में बच्चों पर व्याप्त चुप्पी हैरान और परेशान करने वाली है। कहीं-कहीं छोटी-मोटी कोशिशें दिखती हैं, लेकिन लगता है कि अभी मुख्यधारा की राजनीति में बच्चों को स्थान पाने में समय लगेगा।

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