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दुनिया मेरे आगे: चंदा मामा के घर

मनुष्य और चांद को लेकर और भी ढेर सारे कहानी-किस्से हैं। इतना स्पष्ट है कि चांद विभिन्न रूपों में हमारे बीच मामा बन कर ही रहता आया है। लोक जीवन में स्त्री का इतना प्यारा हो गया चांद कि उसने उसे भाई ही बना लिया।

Author Published on: September 7, 2019 4:39 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

मृदुला सिन्हा

इस युग के वैज्ञानिकों ने कमाल के साथ धमाल भी कर रखा है। अचंभित करने वाले आविष्कार के साथ ग्रह-नक्षत्रों पर भी जाने के यंत्र और यान विकसित किए जा रहे हैं। सेना के लिए उपयोग में आने वाले हथियार हों या खेती की ऊपज बढ़ाने वाले उपकरण, जीवन के हर क्षेत्र में सुविधाएं लाने में वैज्ञानिकों की वाहवाही हो रही है। जल, थल और नम में इनके द्वारा आविष्कृत न जाने कितने उपकरण घूम रहे हैं। मानव जीवन को सुख-सुविधाओं से संपन्न बनाने के लिए वैज्ञानिक अनवरत कड़ी मेहनत करते हैं। चंद्रयान-2 भी इसी उद्देश्य से बनाया है। इस साल 22 जून को रवाना हुआ चंद्रयान ऐसी-वैसी जगह पर नहीं, बल्कि चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव पर उतरने गया है। इसका मकसद चांद के दक्षिणी ध्रुव को टटोलना है। लैंडर विक्रम पता लगाएगा कि चांद पर भूकम्प आता है या नहीं। सबसे बड़ी बात तो यह कि अब चांद के दक्षिण ध्रुव पर भारत का तिरंगा लहराएगा।

भारत की लोक संस्कृति में चांद को मामा कहा जाता है। हम सब जानते हैं कि बचपन में मामा के घर जाने के लिए हम कितने लालायित रहते थे। मन में यह भी विश्वास रहता था कि मामा के घर जाएंगे तो नाना-नानी और मामा-मामी से ढेर सारे उपहार मिलेंगे। ऐसा ही आज होता भी है। आगे भी होता रहेगा। इस चंद्रयान-2 के आकाश में चांद की ओर उड़ान भरने के पूर्व वैज्ञानिकों ने ऐसे यंत्रों को उसमें भरा है जिससे चांद पर उतरकर वहां की प्राकृतिक स्थितियों के चित्र लिए जाएंगे। वहां क्या-क्या पाया जाता है, इसकी जानकारी हमारे लिए उपयोगी होगी। पृथ्वी पर के प्राकृतिक संसाधनों का हम भरपूर उपयोग कर रहे हैं। इसके बावजूद जल, थल और नभ पर इतने संसाधन हैं जिनकी खोज अभी बाकी है। ऐसे संसाधनों का उपयोग मानवता के कल्याण के लिए होगा।

भारतीय समाज की यह विशेषता है कि ग्रह-नक्षत्रों को भी रिश्ते-नाते में बांध लिया जाता है। इनका मानवीकरण हो जाता है। इसलिए वे भी हमारे स्नेह भाजक ही रहते हैं। मेरे मन में यह प्रश्न उठता था कि समाज में लोग चंद्रमा को ‘मामा’ क्यों कहते हैं? अनुभव यह भी कि हर पीढ़ी के वे मामा ही हैं। जैसे दादा, पिता और बेटा सभी के मामा। भारतीय समाज में सब सनातन ही है। चंदा मामा भी सनातन।

भाद्र मास की शुक्ल चतुर्थी को दिन भर उपवास रख कर सायंकाल चांद को आंगन में खीर-पूड़ी और फल-फूल से अर्घ देने का व्रत होता है। उस शाम फल हाथ में लेकर ही चांद देखा जाता है। चतुर्थी का चांद कलंकी कहलाता है। हाथ में फल लिए बिना चांद देख लेने पर उस व्यक्ति को किसी का कुछ चुराना पड़ता है। या फिर पत्थर का टुकड़ा छत पर फेंका जाता है। जब 1961 में अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रांग और एडविन एल्ड्रिन चांद पर उतरे थे तो बिहार में चतुर्थी व्रत करने से लोग कतराने लगे थे। क्योंकि वे लोग चांद को भगवान मानते थे। उस चांद पर अमेरिकी लोगों ने अपने पांव रख दिए, तो भला वे कैसे अर्घ्य देते। लेकिन सबने पूजा की और श्रद्धापूर्वक करते आए हैं।

मनुष्य और चांद को लेकर और भी ढेर सारे कहानी-किस्से हैं। इतना स्पष्ट है कि चांद विभिन्न रूपों में हमारे बीच मामा बन कर ही रहता आया है। लोक जीवन में स्त्री का इतना प्यारा हो गया चांद कि उसने उसे भाई ही बना लिया। प्रेमी द्वारा प्रेमिका के मुख को चांद का टुकड़ा समझ लेना क्षणिक एहसास हो सकता है। लेकिन किसी महिला का भाई तो बहन के दिल में हमेशा एक ही भाव और रस में पगता रहता है। निश्चय ही अपने रोते हुए लाल को आंगन में खड़े होकर आकाश में उगे चांद को दिखा कर किसी मां ने कहा होगा-‘देखो-देखो चंदा मामा’! मुन्ना चमकते चांद का गोला देख कर चुप हो गया होगा। अपने लाड़ले को दूध-भात खिलाते हुए भी चांद को दिखाया होगा। और इस तरह चांद सनातन मामा बन गया।

वैज्ञानिकों की दृष्टि में चांद का यह रूप नहीं आया होगा। लेकिन चंद्रयान को चांद पर भेजने का उद्देश्य यही रहा है, मामा के घर से कुछ ले आना। कुछ लोग तो चांद पर घर बनाने और वहीं जाकर विवाह करने की भी योजना बनाने लगे हैं। लोक संस्कृति में भांजे-भांजी के विवाह पर मामा को बहन के घर ही आने का रिवाज है। बहुत सारी रस्में मामा के हाथों ही संपन्न पूरी कराई जाती हैं। चंदा मामा पृथ्वी पर आएं या नहीं, पृथ्वी के लोग तो वहां जाने के लिए उतावले अवश्य हो रहे हैं। भारतीय वैज्ञानिकों की यह बड़ी उपलब्धि ही नहीं, स्तुत्य है जिससे भारत मां का भाल ऊंचा हुआ है।
(लेखिका गोवा की राज्यपाल हैं)

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