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दुनिया मेरे आगे: सौंदर्यीकरण की कीमत

अधिकतर राजनेताओं के लिए सौंदर्यीकरण का अर्थ विकास, यानी साफतौर पर इमारतें, सड़कें, पार्क बनवाने संबंधी गतिविधियां होता है।

Author Updated: September 19, 2019 4:01 AM
सांकेतिक तस्वीर।

संतोष उत्सुक

कुदरत द्वारा दिए अनेक खूबसूरत उपहारों को नायाब न समझते हुए हमने उन्हें मुफ्त में मिला सामान समझ लिया। प्रकृति की गोद में बसे गांव, पहले कस्बे हुए और फिर शहर होने लगे। इंसान भौतिकवादी होता गया। बस्तियों का नियोजन राजनीतिक और सामाजिक धरातल पर स्वार्थ, भ्रष्टाचार के साथ मनमाने तरीके से किया गया। वृक्ष, पशु-पक्षी, पहाड़, नदी, तालाब, नियम और अनुशासन- सब ताकते रह गए और कथित विकास का साम्राज्य स्थापित हो गया। कायदे से शिक्षा और समृद्ध होती आर्थिकी के साथ बसाहट में सौम्यता, आकर्षण और सुंदरता आनी चाहिए थी, लेकिन विकास के साथ कई तरह की बदसूरती आई। बदबू फैलाता उदाहरण असीमित कूड़ा कचरा है, जिसे निरंतर हटाया जा रहा है। वास्तव में काफी कुछ किया जाना बाकी है। सौंदर्यीकरण के नाम पर बनी सड़कों की बजरी आज भी कुछ देर की बरसात में बह जाती है। हजारों बार ऐसी खबरें फोटो सहित छपती हैं। मामला ‘ऊपर’ जाता है। कहने के लिए जांच की जाती है और अंतिम तौर पर सब कुछ ‘पहले की तरह’ चलने लगता है।

सरकारी शक्तियां चुनावी यज्ञ से ग्रहण की जाती हैं। अधिकतर राजनेताओं के लिए सौंदर्यीकरण का अर्थ विकास, यानी साफतौर पर इमारतें, सड़कें, पार्क बनवाने संबंधी गतिविधियां होता है। इस माध्यम से आर्थिक हलचल बढ़ती है और जिनका फायदा होना है, होता है। जहां थोड़ी-सी कलात्मक ‘लैंड स्केपिंग’ की जरूरत होती है, वहां ऊंची दीवारें उठा कर पार्क के नाम पर लाखों रुपए खर्च किए जाते हैं। इसमें यह देखना जरूरी नहीं होता कि कितने पेड़ फना हुए या मलबे में दबा दिए गए। कुछ जागरूक पत्रकार इस ‘सौंदर्यीकरण’ को अखबार की सुर्खियां बनाते हैं, लेकिन व्यवस्था के लोहे को कागज नहीं काटता।

सौंदर्यीकरण के नाम पर पार्क बनवा कर उद्घाटन करवाया जाता है, थोड़े दिनों बाद उसी पार्क में असामाजिक तत्त्वों की झाड़ियां फैलने लगती हैं। छोटे शहरों और कस्बों में महिलाओं के लिए एक भी सार्वजनिक शौचालय नहीं होता। जो होते भी हैं, वे सड़ांध से भरे होते हैं। यहां तक कि समुचित संख्या में पेशाबघर भी नहीं हैं। सड़क किनारे वृक्ष लगाएं या कार्यालयों में पौधे रखे जाएं, कुछ दिन बाद बिना देखभाल के उदास होते दिखते हैं। विदेशों की नकल करते हुए खूबसूरती बढ़ाने के लिए सीमेंट की इंटरलॉक टाइलें बिछाई जाती हैं, लेकिन सौंदर्यीकरण नहीं, बल्कि अनेक जगह सड़क का असमतलकरण हो रहा और इसकी वजह से सड़क पर पानी भर रहा है।

कुछ और पारंपरिक और आवश्यक कारण भी हैं। सौंदर्यीकरण तो बस निबटाना है। उभरती कॉलोनियों, नगर परिषद क्षेत्र में मनमाना निर्माण, दोपहियों की पार्किंग के कारण गलियों का बेहद तंग होना, टूटे रास्ते, पानी के पाइपों का जाल, मरीज निकलने के लिए भी अड़ोस-पड़ोस में रास्ता न छोड़ना, पुराने मकान का कचरा कहीं भी फेंकने जैसी गैर-नागरिक गतिविधियां सौंदर्यीकरण के नाम पर धब्बा हैं, लेकिन ‘फुर्सत है किसको रोने की दौर-ए-बहार में’।
सौंदर्यीकरण बढ़ाने के लिए कुछ रहनुमाओं की मूर्तियां स्थापित हो रही हैं, लेकिन ऐतिहासिक इमारतें, बाग, कला धरोहरों, प्राकृतिक जलस्रोतों में अब किसी के लिए सौंदर्य नहीं बचा। इसलिए इनकी देखभाल की जरूरत नहीं रही। राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान के अंतहीन विज्ञापनों के बावजूद कूड़ा-कचरा फैला है। नकली झरने, विशाल दरवाजे, बरसाती बनाने के नाम पर सौंदर्यीकरण किया जा रहा है।

लेकिन सच यह है कि अधिकतर नेताओं और अफसरों को कुदरत की अद्भुत रचनाओं से प्यार नहीं होता। वे पढ़े-लिखे होते हैं, लेकिन उनकी कलात्मक अभिरुचियां उतनी उपयोगी नहीं होती। उनके लिए गांव, कस्बे या शहर के सौंदर्यीकरण का अर्थ इमारत, सड़क या पार्क बनाना ही होता है, जहां से कुछ लोगों को आर्थिक फायदा हो। बेचारगी की वजह से वे विकास के नाम पर कुछ भी करते हुए उसे सौंदर्यीकरण ही समझते रहते हैं। उचित क्या है, यह उन्हें पता नहीं होता। खूबसूरत जगहों के साथ हमारा सुलूक गवाह है कि उनके सौंदर्य को हमने कितना संभाल कर रखा। अभी तो जो शहर स्मार्ट सिटी बनने की प्रक्रिया में हैं, उन्हें फिर से सौंदर्यीकरण के ढांचे में गलना है।

सुरुचिपूर्ण बदलावों और हरियाली से भरी कुदरती सुंदरता से ही हमारा परिवेश सौंदर्य की मिसाल बन सकता है, जिसमें ज्यादा पैसे की जरूरत नहीं, केवल सही दिशा की सोच चाहिए। लेकिन व्यवस्था ऐसी है कि जहां सामान की खरीद करनी हो, वहां खूब दिलचस्पी ली जाती है। जनता के चुने हुए छोटे से बड़े राजनीतिक नुमाइंदों, स्थानीय प्रशासन और सरकार को यह समझना बहुत जरूरी है कि सौंदर्यीकरण है क्या! आज की तारीख में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था का समुचित प्रबंधन, उपयुक्त जगहों पर पार्किंग, नागरिक सुरक्षा, आम लोगों के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं, सही मायनों में स्वच्छता, साफ-सुथरे शौचालय, सही जल प्रबंधन आदि जैसे कार्य ही सौंदर्यीकरण हैं। इस बारे सीखने या प्रेरित होने के लिए विदेश यात्रा करने की जरूरत नहीं, बल्कि समय-समय पर आत्मपरीक्षण और ईमानदार विश्लेषण ही सब कुछ सिखा सकता है। नागरिक सौंदर्यीकरण सिर्फ एक वस्तु नहीं है!

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