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दुनिया मेरे आगे: सौंदर्यीकरण और रोटी

फुटपाथ वाली साग-सब्जी की दुकानों द्वारा बिखराया कचरा और प्लास्टिक थैलियां अचानक अंतर्ध्यान हो गई हैं।

Author Published on: September 4, 2019 1:22 AM
अचानक इन सूनी सड़कों के बाद लेबर-चौक चौराहा आ गया

अरुणेंद्र नाथ वर्मा

पिछले दिनों हमारे शहर का रंगोरूप अचानक निखर गया। बरसात की फुहारों का जादू मात्र होता तो सिर्फ सड़कें धुली-धुली लग रही होतीं। पर असल में जादू शहर के प्राधिकरण का है जिसकी बदौलत सड़कें पहले से दोगुनी चौड़ी लग रही हैं। जिन फुटपाथों पर कल तक फल-सब्जियों की रेहड़ियों और पान-बीड़ी-गुटके की गुमटियों की भरमार से पैदल चलना दूभर था, आज वे खाली थीं। फुटपाथ वाली साग-सब्जी की दुकानों द्वारा बिखराया कचरा और प्लास्टिक थैलियां अचानक अंतर्ध्यान हो गई हैं। किसने घुमा दी यह जादू की छड़ी? किसने शहर के छोटे-छोटे पटरी वाले दुकानदारों को अचानक जिम्मेदार नागरिक बना दिया! जरूर वे अब प्राधिकरण द्वारा निर्मित अधिकृत दुकानों में चले गए होंगे। अपनी वातानुकूलित कार की पिछली सीट पर बैठ कर मैं अखबार में खोया ही रह जाता यदि सड़कों पर बिखरा हुआ सूनापन मुझे पहले बहुत सुंदर, फिर कुछ अजीब और अंत में भयावह न लगने लगा होता।

अचानक इन सूनी सड़कों के बाद लेबर-चौक चौराहा आ गया। रियल एस्टेट सेक्टर का गुब्बारा फूटने के बाद से दिहाड़ी मजदूरों की जमात इस चौराहे पर दिखने लगी थी। उस गुब्बारे के फूटने की आवाज अब उन लाखों लोगों की उच्छवास में डूब चुकी है जो नीले आसमान के नीचे एक छत की कामना में जीवन भर की कमाई गंवा कर बैंकों के कर्जदार बन गए हैं। लाखों अधबने गगनचुंबी रिहायशी अपार्टमेंटों में पसरा सन्नाटा अब लेबर चौक में जमा भारी भीड़ के बीच गूंज रहा था।

अचानक मेरी नजर एक परिचित चेहरे पर पड़ी। वह दो साल पहले स्थानीय गोल्फ क्लब में मेरा कैडी था। एक दिन उसने बड़े उत्साह से बताया था कि उसे मानेसर में एक कार बनाने वाले कारखाने में नौकरी मिल गई। बिना कोई कौशल अर्जित किए दसवीं तक की पढ़ाई का नतीजा थी यह अकुशल श्रमिक की नौकरी। फिर भी वह बहुत उत्साहित था। आज उसे इस लेबर चौक पर देख कर आश्चर्य हुआ। पूछने पर उसने अपनी कहानी बयां कर दी। छह महीने पहले कारखाने ने मंदी की चपेट में आकर छंटनी कर दी थी। लेकिन नोएडा के एक पुराने साथी ने उसे एक एक्सपोर्ट यूनिट में काम दिला दिया था। जल्दी ही वह यूनिट भी मंदी की चपेट में आ गई। बेकारी के दिनों में ही सारी बचत गांव भेजनी पड़ गई थी जहां पिता बारिश में ध्वस्त घर की मरम्मत के लिए सहायता की गुहार लगाए हुए थे।

पिछले दिनों अखबारों और टीवी चैनलों की सुर्खियों ने सभी का ध्यान जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाने पर केंद्रित कर रखा था। देश की आजादी का अखंडता से नाता जुड़ते देख कर सबके मन में देशभक्ति की लहर दौड़ गई थी। इस जोशोखरोश के बीच देश की डावांडोल आर्थिक स्थिति से केवल वे रूबरू हो पा रहे थे जिनके ऊपर मंदी का कहर सबसे पहले बरपा हुआ था। मेरे जैसों के लिए तो महंगी गाड़ियों का घर से निकलते ही भयंकर जाम में फंस जाना देश की जबर्दस्त तरक्की का जीता जागता प्रमाण था।

धीरे-धीरे आर्थिक मंदी का भी जिक्र होने लगा जिस पर मेरा ध्यान नहीं गया था। यह जरूर सोचा था कि पार्किंग की तंगी और जाम से निपटने के लिए निजी कार की अपेक्षा ओला-ऊबर जैसी टैक्सी सेवाएं अधिक सुविधाजनक होंगी। तब कहां सोचा था कि कुछ महीनों के अंदर ही आॅटोमोबाइल क्षेत्र के साढ़े तीन लाख कामगारों पर सेवा समाप्ति की गाज गिरेगी और इस सुनामी को रोका न गया तो दस लाख से भी अधिक नौकरियां दम तोड़ देंगी। आॅटोमोबाइल सेक्टर के साथ-साथ बड़े कारखानों को कल-पुर्जे, स्टील और पेंट आदि माल मुहैया कराने वाले छोटे से लेकर भारी उद्योग भी मंदी की चपेट में आएंगे।

देश की भारी भरकम समस्याओं से ध्यान हटा कर मैंने उससे पूछा ‘तो अब? क्या दिहाड़ी मजदूरी के अलावा और कोई उपाय नहीं?’ वह कातर होकर बोला-‘था न साहेब। कर्जलेकर एक फलों की रेहड़ी लगाई थी। पिछले हफ्ते कमेटी वाले उसे जब्त करके ले गए।’ मैं स्तब्ध हूं। आर्थिक मंदी से लड़ते उद्योगों को सरकार शायद रिजर्व बैंक से एक लाख छिहत्तर हजार करोड़ की थैली पाने के बाद राहत दे सकेगी।

लेकिन हमारे प्राधिकरण ने जिन सात सौ दुकानों को बनवाने की घोषणा की और उन्हें आबंटित करने के पहले ही उससे सौ गुना से भी अधिक बेसहारा गरीबों को फुटपाथों से हटा दिया, उन तक यह राहत कब पहुंचेगी! मेरी धुंधलाती आंखों के सामने अखबार में छपी मोबाइल और चेन आदि झटकने की खबरें और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बेकसूर सैन्य बलों पर बम फेंकते आतंकियों की तस्वीरें नाच रही हैं। मैं सोच रहा हूं फुटपाथों और सड़कों की सुंदरता ज्यादा जरूरी थी या इन जैसों के लिए रोटी।

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